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अमेरिका के अरबों डॉलर के हथियार लेकिन ईरान के ड्रोन के आगे क्यों मुश्किल?

जॉर्डन में अमेरिका के 500 मिलियन डॉलर के रडार को ईरान ने तबाह कर दिया। इससे यह बात साफ हो गई है कि फिलहाल होने वाले युद्ध में अब बेहद महंगे हथियार ही महाशक्तियों की सबसे बड़ी कमजोरी बन रहे हैं। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर, Photo Credit- Social Media

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जॉर्डन के मुवफ्फक साल्टी एयर बेस पर हाल ही में हुआ एक हमला वैश्विक सैन्य रणनीति के लिए बहुत बड़ा अलर्ट बनकर सामने आया है। वहां तैनात अमेरिका का लगभग 500 मिलियन डॉलर यानी करीब 4,100 करोड़ रुपये की कीमत वाला AN/TPY-2 रडार ड्रोन हमले में तबाह हो गया। यह रडार अमेरिका के सबसे एडवांस 'थाड' (THAAD) मिसाइल डिफेंस सिस्टम की आंख था। इसका काम दूर से आती मिसाइलों को पहचानना और एयर डिफेंस को अलर्ट करना था।

 

हैरानी की बात यह है कि इस बहुमूल्य रडार को निशाना बनाने के लिए ईरान ने कोई बहुत महंगा हथियार नहीं बल्कि महज कुछ हजार डॉलर का सस्ता ड्रोन इस्तेमाल किया। इस एक घटना ने साबित कर दिया है कि आधुनिक युद्ध का गणित बदल चुका है। एक मामूली लागत के ड्रोन से हमलावर देश बड़ी महाशक्ति का करोड़ों डॉलर का नुकसान करा रहे हैं।

 

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सस्ते ड्रोन बनाम महंगे मिसाइल

अमेरिकी सेना के पास ऐसे कुल 13 रडार ही मौजूद थे। रडार के नष्ट होने से भले ही पूरा THAAD सिस्टम खत्म न हुआ हो लेकिन उसकी सटीक ट्रैकिंग और खतरे को भांपने की क्षमता बहुत हद तक घट गई है। इस रडार की भरपाई करना अमेरिका के लिए कोई आसान काम नहीं है। इसमें बेहद एडवांस इलेक्ट्रॉनिक्स, कूलिंग यूनिट्स, खास सॉफ्टवेयर और एंटीना सिस्टम एक साथ काम करते हैं।

 

आज के युद्ध में सबसे बड़ा खेल लागत का बन गया है। ईरान और उसके सहयोगी इसी आर्थिक अंतर का फायदा उठा रहे हैं। यदि कोई देश $20,000 के एक ड्रोन को गिराने के लिए बार-बार $3.7 मिलियन या $12.7 मिलियन की मिसाइलें दागेगा तो उसका रक्षा बजट बहुत तेजी से खत्म होने लगेगा। हालांकि, हर ड्रोन को रोकने के लिए मिसाइलें ही नहीं बल्कि काउंटर-ड्रोन गन या जैमिंग का भी सहारा लिया जाता है लेकिन आपात स्थिति में महंगी मिसाइलें दागना मजबूरी बन जाता है।

 

ईरान की रणनीति से एक नया पैटर्न उभरा है। सीधे जेट विमानों या मिसाइल लॉन्चरों पर हमला करने के बजाय, उसने सबसे पहले रक्षा नेटवर्क के 'सेंसर' यानी रडार को निशाना बनाया। जब मिसाइल डिफेंस सिस्टम को समय पर खतरे की सूचना ही नहीं मिलेगी तो उसकी मिसाइलें कितनी भी ताकतवर क्यों न हों, वे बेकार साबित हो जाती हैं।

भविष्य में देखने को मिलेंगे 5 बड़े बदलाव

इस घटना के बाद पूरी दुनिया की सेनाएं अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर होंगी। जैसे लेजर हथियारों, इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग और गन-बेस्ड डिफेंस पर ज्यादा ध्यान दिया जाएगा। एक ही भारी-भरकम रडार पर निर्भर रहने के बजाय कई छोटे और मूवेबल रडार तैनात किए जाएंगे। साथ ही अपने सभी कीमती हथियारों और रडार को एक जगह इकट्ठा रखने के बजाय अलग-अलग बेस पर बांटकर रखा जाएगा। असली रडार को बचाने के लिए डिकॉय यानी नकली रडार और मजबूत बंकरों का इस्तेमाल बढ़ेगा। नुकसान होने पर तुरंत नए हथियार और उपकरण बनाने की क्षमता विकसित की जाएगी।

भारत के लिए क्या हैं बड़े सबक?

पाकिस्तान और चीन की सीमाओं पर भारत को भी ड्रोन और मिसाइलों के समूह का खतरा हमेशा बना रहता है। भारत ने इस दिशा में स्वदेशी स्तर पर कई कदम उठाए हैं। जैसे कई खतरों को एक साथ रोकने वाली आकाश मिसाइल सिस्टम, सेना और वायुसेना के एयर डिफेंस को जोड़ने वाला IACCS नेटवर्क और बहुस्तरीय सुरक्षा देने वाला IADWS (इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस वेपन सिस्टम)।

 

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फिर भी, जॉर्डन की घटना के बाद भारतीय डिफेंस सिस्टम के सामने 5 अहम सवाल खड़े होते हैं-

  • क्या हमारा एयर डिफेंस एक साथ आने वाले सैकड़ों सस्ते ड्रोनों के हमले को झेलने के लिए तैयार है? 
  • अगर मुख्य रडार नष्ट हो जाए तो क्या हमारे पास बैकअप सेंसर नेटवर्क तुरंत उपलब्ध है?
  • क्या हम महंगी मिसाइलों के बजाय लेजर या जैमिंग जैसे सस्ते विकल्पों पर तेजी से काम कर रहे हैं?
  • युद्ध के दौरान उपकरण नष्ट होने पर उन्हें कितनी जल्दी बदला या ठीक किया जा सकता है?
  • क्या हमारे सीमावर्ती सैन्य ठिकाने और गोला-बारूद डिपो पर्याप्त रूप से सुरक्षित और अलग-अलग जगहों पर बिखरे हुए हैं?

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