चीन की सरकार इस हफ्ते अपनी सालाना संसद में एक नया कानून पास करने जा रही है, जिसे 'जातीय एकता और प्रगति' का नाम दिया गया है। सरकार का कहना है कि इससे देश में एकजुटता बढ़ेगी और विकास तेज होगा लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ता और जानकार इसे अल्पसंख्यकों की आजादी छीनने वाला कदम बता रहे हैं। साथ ही विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि 'जातीय एकता' के नाम पर लाए जा रहे नए कानून वास्तव में रेयर अर्थ खनिजों के खनन हेतु अल्पसंख्यक समुदायों की जमीन और अधिकारों को नियंत्रित करने का एक गुप्त जरिया हैं।
इस नए कानून के तहत अब क्षेत्रीय भाषाओं के मुकाबले 'मेंडरिन' (चीनी भाषा) को ज्यादा बढ़ावा दिया जाएगा। साथ ही, अलग-अलग जातियों के बीच शादियों को प्रोत्साहित करने और बच्चों को कम उम्र से ही कम्युनिस्ट पार्टी की विचारधारा सिखाने पर जोर दिया जाएगा। विशेषज्ञों का कहना है कि यह राष्ट्रपति शी जिनपिंग की उस नीति का हिस्सा है, जिसमें वो धर्म और संस्कृति को पूरी तरह चीनी सांचे में ढालना चाहते हैं।
यह भी पढ़ें: पाकिस्तान पर भी हो रहा युद्ध का असर, पेट्रोल में कटौती, घटी सैलरी, WFH लागू
नीति का प्रत्यक्ष प्रभाव
पहचान और भाषा पर असर: नए नियमों के बाद अब तिब्बती, उइगर और मंगोलियाई जैसे समुदायों के स्कूलों और यूनिवर्सिटी में उनकी मातृभाषा का महत्व कम हो जाएगा। उन्हें मजबूरन चीनी भाषा में पढ़ाई करनी होगी। जानकारों का कहना है कि यह इन समुदायों को पूरी तरह 'हन' संस्कृति में मिलाने की एक सोची-समझी कोशिश है।
रीति-रिवाजों पर लगाम: शी जिनपिंग सरकार धर्मों के 'चीनीकरण' पर जोर दे रही है। इसके तहत तिब्बत के मठों और शिनजियांग की मस्जिदों पर कड़ा नियंत्रण रखा जा रहा है। 18 साल से कम उम्र के बच्चों के बौद्ध ग्रंथों को पढ़ने या धार्मिक शिक्षा लेने पर पाबंदी लगाई जा रही है।
शादियों को बढ़ावा: कानून में यह भी प्रावधान है कि कोई भी संगठन या व्यक्ति अलग-अलग जाति के लोगों के बीच होने वाली शादियों को नहीं रोक सकेगा। उदाहरण के तौर पर, यदि कोई हन पुरुष किसी अल्पसंख्यक महिला से शादी करता है तो धार्मिक गुरु या रिश्तेदार उस पर दबाव नहीं बना पाएंगे। इसे भी सांस्कृतिक मिलावट के एक तरीके के रूप में देखा जा रहा है।
संसाधनों पर नियंत्रण
इन सब के अलावा मानवाधिकार संगठनों को यह भी मानना है कि यह कानून अल्पसंख्यक क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के जमीनों पर कब्जा करने का एक कानूनी तरीका है। चीन में हन समुदाय की आबादी 90% से ज्यादा है लेकिन तिब्बती, उइगर और मंगोलियाई समुदायों के पास जमीन का बड़ा हिस्सा है जो खनिज और खेती के संसाधनों से भरपूर है।
चीन के इनर मंगोलिया में दुनिया के सबसे बड़े रेयर अर्थ भंडार हैं, जिनका उपयोग हाई-टेक और रक्षा उद्योगों में होता है। शिनजियांग (उइगर क्षेत्र) और तिब्बत में भी खनिज, तेल और प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार हैं। तिब्बत और इनर मंगोलिया चीन के लिए महत्वपूर्ण बफर जोन के रूप में कार्य करते हैं, जो मुख्य चीनी आबादी और पड़ोसी देशों के बीच एक प्राकृतिक रक्षा की तरह हैं।
इन पर नियंत्रण करना एक बहुत बड़े संसाधन श्रोत पर सरकारी कंट्रोल को बढ़ावा देगा जिससे दुनिया में चीन का प्रभुत्व और आसानी से बढ़ाएगा। जानकारों का मानना है कि इन इलाकों पर पकड़ मजबूत करने और विद्रोह की किसी भी संभावना को खत्म करने के लिए सरकार यह सख्त कानून ला रही है।
विरोध की आवाजें
विदेशी मानवाधिकार संगठनों और निर्वासित समुदायों ने इस कानून पर गहरी चिंता जताई है। उनका कहना है कि यह कानून सिर्फ एक कागजी दस्तावेज नहीं है बल्कि यह उन नीतियों को कानूनी रूप दे देगा जिनसे अल्पसंख्यकों के अस्तित्व को मिटाया जा रहा है।
दुनिया भर में 'ग्रीन ट्रांजिशन' की होड़ मची है। इलेक्ट्रिक वाहनों से लेकर स्मार्टफोन तक, सब कुछ रेयर अर्थ खनिजों पर टिका है। इन खनिजों का सबसे बड़ा भंडार अक्सर उन स्वायत्त क्षेत्रों में है जहां अल्पसंख्यक आबादी रहती है।
'जातीय एकता' के नाम पर सरकारें सांस्कृतिक और सामाजिक एकीकरण का तर्क देकर इन क्षेत्रों में बाहरी आबादी और सैन्य हस्तक्षेप को बढ़ा देती हैं, जिससे संसाधनों का दोहन आसान हो जाता है।