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ना रोड, ना रेलवे, ना सेना, इतना अनोखा क्यों है ग्रीनलैंड? पढ़िए इसकी कहानी

ग्रीनलैंड एक ऐसा देश है जो इन दिनों डोनाल्ड ट्रंप के निशाने पर है। कभी इस देश को खरीदने का ऑफर देने वाले ट्रंप अब इस पर कब्जे की बात कह रहे हैं।

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ग्रीनलैंड, Photo Credit: Social Media

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बीते कई दिनों से एक देश खूब चर्चा में है। अक्सर तमाम बहसों और बहस करने वाले देशों से काफी दूर बसा ग्रीनलैंड देश इन दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निशाने पर है। डोनाल्ड ट्रंप खुलेआम यह कह चुके हैं कि वह ग्रीनलैंड पर कब्जा कर लेंगे। एक वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के अपहरण के बाद से ट्रंप की इस धमकी को बेहद गंभीरता से लिया जा रहा है और ग्रीनलैंड के साथ-साथ उसके साथी भी इससे चिंतित हैं। ग्रीनलैंड पर कब्जे के पीछे डोनाल्ड ट्रंप का तर्क है कि अगर अमेरिका ऐसा नहीं करता है तो चीन या रूस इस पर कब्जा कर लेंगे। ट्रंप के इस कदम को रेयर अर्थ मिनरल्स के लिए मची होड़ से जोड़कर भी देखा जा रहा है।

 

अब अचानक हुए ट्रंप के इस एलान से हमेशा शांत रहने वाले इस बर्फीले देश में खलबली मची हुई है। बिना सेना के चल रहे इस देश की चिंता बढ़ गई है। रोचक बात यह है कि कहने को तो ग्रीनलैंड स्वायत्त देश है लेकिन वह अपने संसाधनों के लिए डेनमार्क पर निर्भर है और उसे डेनमार्क का अर्ध स्वायत्त देश भी कहा जाता है। ऐसी कई और चीजें हैं जो इस देश को अनोखा बनाती हैं और शायद यही वजह है कि कई देशों की नजरें दुनिया के सबसे बड़े द्वीपीय देश पर टिकी हुई हैं। आइए इसके बारे में विस्तार से जानते हैं:-

कहां है ग्रीनलैंड?

 

अगर दुनिया के नक्शे पर देखा जाए तो सबसे ऊपर की ओर बाईं तरफ जो सफेद रंग में देश दिखेगा वही है ग्रीनलैंड। सफेद रंग के देश का नाम ग्रीनलैंड क्यों है, इसका जवाब आगे देंगे। यह वही देश है कि जिसका उत्तरी छोर खत्म होते-होते नॉर्थ पोल यानी उत्तरी ध्रुव आ जाता है या यूं कहें कि नॉर्थ पोल में जिस देश का सबसे ज्यादा हिस्सा आता है, वह ग्रीन लैंड ही है। जैसे भारत के एक तरफ अरब सागर है और दूसरी तरफ बंगाल की खाड़ी उसी तरह ग्रीनलैंड के एक तरफ बैफिन की खाड़ी है और दूसरी तरफ डेनमार्क स्ट्रेट। इसी डेनमार्क स्ट्रेट को पार करेंगे तो एक और द्वीपीय देश आइसलैंड आ जाता है। यह एक ऐसा देश है जो समुद्र के बीच में है लेकिन इसके कुछ तटीय इलाकों में ही इंसान रहते हैं। बाकी सब में सिर्फ बर्फ जमी रहती है।

 

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देश की राजधानी का नाम नूक (NuuK) है। अगर क्षेत्रफल के हिसाब से देखा जाए तो यह देश दुनिया में 12वें नंबर पर है। कुल क्षेत्रफल 2,166,086 वर्ग किलोमीटर है। यानी ईरान, सऊदी अरब, मेक्सिको, मिस्र और पाकिस्तान जैसे देश ग्रीनलैंड के आगे काफी छोटे हैं। हालांकि, इतने बड़े देश में लगभग 56000 हजार लोग रहते हैं। इसकी तुलना अगर भारत से करें तो इतनी जनसंख्या सिर्फ दो लोकसभा क्षेत्रों में होती है। भारत के कई जिलों की जनसंख्या इससे ज्यादा होगा। दिल्ली की मेट्रो में हर दिन 60 से 70 लाख लोग सफर करते हैं। यानी जनसंख्या के लिहाज से यह देश बहुत छोटा है।

कैसे चलता है यह देश?

 

रोचक बात है कि इतने बड़े देश में ना तो कोई रेलवे नेटवर्क है और ना ही ऐसी सड़के हैं जो एक शहर से दूसरे शहर को जोड़ें। जो सड़कें हैं भी वे एक शहर से शुरू होती हैं और उसी शहर में खत्म हो जाती हैं। इसकी बड़ी वजह है कि बर्फ इतनी ज्यादा है कि ये चीजें बनाना ही संभव नहीं है। ऐसे में सबसे आसान साधन डॉग स्लेज यानी कुत्ते वाली गाड़ियां हैं। इसके अलावा, नाव, हेलिकॉप्टर या फिर प्लेन से ही एक जगह से दूसरी जगह जाया जा सकता है।

 

कारोबार की बात करें तो देश में सबसे ज्यादा मछली पकड़ने का काम होता है। देश की अर्थव्यवस्था ऐसी है कि मछली छोड़कर बाकी हर दूसरी चीज दूसरे देशों से ही आती है। हर इलाके के लिए व्हेल, सील और मछलियों के शिकार की सीमा तय की जाती है जिससे किसी खास क्षेत्र के लोग ज्यादा मछलियां न पकड़ें। इसके साथ ही, यह भी शर्त है कि व्हेल और सील का शिकार करने वाले लोग या तो उसे खा सकते हैं या स्थानीय स्तर पर ही बेच सकते हैं। इसका निर्यात नहीं किया जा सकता है। 

 

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देश की थोड़ी बहुत कमाई टूरिजम से भी होती है और बाकी की आर्थिक मदद डेनमार्क करता है। देश की सिर्फ 1 प्रतिशत जमीन पर ही खेती संभव है, ऐसे में कुछ सब्जियां ही यहां उगाई जा सकती हैं। कुछ लोग भेड़, पोलर बियर, रेंडियर आदि भी पालते हैं और इनका इस्तेमाल मांस के लिए करते हैं। बीते कुछ समय में तेजी से बर्फ पिघलने और जमीन के नीचे महंगे खनिज मिलने के चलते ग्रीनलैंड की इकॉनमी को रफ्तार मिली है और इसी के चलते यह देश दुनिया की नजर में भी आ रहा है।

 

आबादी का सिस्टम ऐसे समझिए कि एक तिहाई लोग राजधानी नूक में ही रहते हैं। यहां के कैफे, कल्चरल सेंटर और नेशनल म्यूजियम आकर्षण का केंद्र हैं। हर साल 25 मई से 25 जुलाई तक यानी 2 महीने तक यहां सूरज ही नहीं डूबता है। यानी दिन के साथ-साथ रात में भी सूरज दिखता रहता है। इस घटना को 'मिड नाइट सन' कहा जाता है।

ग्रीनलैंड की खासियत

 

ग्रीनलैंड की 80 पर्सेंट जमीन हमेशा बर्फ से ढकी रहती है। यानी सर्दी हो गर्मी, इधर बर्फ ही रहेगा। माना जाता है कि करोड़ों साल पहले यह देश सच में हरा-भरा ही रहा होगा लेकिन अब लगभग 2 मील मोटी बर्फ जम चुकी है। ग्रीनलैंड के लोगों को बाहरी दुनिया के लोग एस्किमो कहते हैं लेकिन यहां के लोग इससे सहज नहीं हैं। वे खुद के लिए इनुइट (Inuit) शब्द को ज्यादा मुफीद पाते हैं। यहां इसी इनुइट की आबादी लगभग 88 प्रतिशत है। 

 

इनुइट यानी ऐसे लोग जो या तो डेनमार्क मूल के हैं या पूरी तरह से ग्रीनलैंड के हैं। इन्हीं लोगों को कलालिट (Kalaallit) भी कहते हैं। स्थानीय भाषा में इसका अर्थ हुआ ग्रीनलैंड के लोग। यहां के लोग मुख्य रूप से डैनिश या ग्रीनलैंडिक भाषा ही बोलते हैं। अब नए जमाने के लोग अंग्रेजी भी सीखने और बोलने लगे हैं। 

ग्रीनलैंड का इतिहास

 

साल 982 में नॉर्वे के एरिक द रेड ने इस देश की खोज की। 1721 में यह देश डेनमार्क की कॉलोनी बन गया। 1940 में दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी ने डेनमार्क पर ही कब्जा कर लिया। इस तरह ग्रीनलैंड भी जर्मनी के कब्जे में आ गया। 1941 से 1945 के बीच अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर कब्जा कर लिया और जर्मनी से इसकी रक्षा की।

 

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1950 में डेनमार्क इस बात पर राजी हो गया कि अमेरिका फिर से थुले एयर बेस का इस्तेमाल कर सकता है। 1953  में ग्रीनलैंड किंगडम ऑफ डेनमार्क का हिस्सा बन गया। 1979 में ग्रीनलैंड में एक रेफरेंडम हुआ और देश के लोगों ने तय किया कि अब अपना शासन खुद चलाएंगे। 2008 में एक और रेफरेंडम हुआ और ग्रीनलैंड के लोगों ने अपनी शक्ति में और इजाफा कर लिया। 

 

2013 में ग्रीनलैंड ने यूरेनियम जैसे रेडियोऐक्टिव तत्वों के खनन पर लगी रोक पर लगा बैन हटाया और यहीं से इस देश की किस्मत पलटने लगी। रेयर अर्थ मिनरल का निर्यात बढ़ने लगा और कई देशों की नजर इस छोटे से देश की ओर मुड़ गई। 2021 में इसी देश ने तेल और गैस के खनन/उत्पादन पर रोक लगा दी। 2024 में डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को खरीदने का ऑफर दे डाला था। इसके बाद डेनमार्क ने ग्रीनलैंड के डिफेंस सेक्टर पर खर्च बढ़ा दिया।

 

 

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