फ्रांस की सड़कों पर इन दिनों छात्रों का हिंसक प्रदर्शन हो रहा है। छात्र सरकार से शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि टीचरों की बहाली की जाए और साथ ही बुनियादी ढांचों में सुधार हो। लोगों का कहना है कि देश भर के हाई स्कूलों की स्थिति इतनी बिगड़ गई कि बच्चे बुनियादी सुविधाओं से वंचित है लेकिन इन सब के बीच यह भी समझना होगा कि अगर सरकार इन सारी मांगो को मान लेती है तो उन पर कितना दबाव पड़ेगा। साथ ही क्या सरकार इन सब मांगो को पूरा करने की स्थिति में हैं?
छात्र संघ का दावा है कि देश के आधे से अधिक हाई स्कूल या तो पूरी तरह से बंद रहे हैं या वहां काम पूरी तरह से ठप कर दिया गया। छात्रों की मांग है कि टीचरों की तुरंत बहाली की जाए। साथ ही पुरानी होती स्कूल इमारतों की जल्द मरम्मत की मांग कर रहे हैं।
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अब तक क्या हुआ?
पहले जान लेते हैं कि इस हिंसक आंदोलन में कितना ज्यादा नुकसान हुआ है। अब तक कम से कम 215 बच्चे और 85 स्कूल स्टाफ घायल हुए हैं। इसके अलावा 700 से अधिक पुलिसकर्मियों को भी चोटें आई हैं। उत्तरी फ्रांस में पुलिस ग्रेनेड की चपेट में आने से 15 साल के एक छात्र ने अपना हाथ का निचला हिस्सा गंवा दिया। इस घटना के बाद प्रदर्शनकारियों का गुस्सा और बढ़ गया। प्रदर्शन की शुरुआत से लेकर अब तक 6,100 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है, जिनमें से अधिकतर नाबालिग हैं। सरकार का कहना है कि बाहरी तत्वों ने इस छात्र आंदोलन का गलत फायदा उठाकर इसे हिंसा में बदल दिया है। वहीं विपक्षी दल और अधिकार समूह पुलिस पर नाबालिगों के खिलाफ अत्यधिक बल प्रयोग करने का आरोप लगा रहे हैं।
क्या सरकार के पास बजट है?
फ्रांस में करीब 400 से अधिक हाई स्कूलों का ठप होना और हजारों लोगों का विरोध प्रदर्शन अब केवल कानून व्यवस्था की चुनौती नहीं रहा। सवाल यह उठ रहा है कि जो लोग मांग कर रहे हैं, क्या फ्रांसीसी सरकार के पास उनकी मांगें पूरी करने के लिए पैसे बचे हैं? फ्रांस की सरकारी ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक, टीचर की कमी के कारण सरकारी मिडिल स्कूलों में करीब 10% पढ़ाई के घंटे बिना शिक्षक के बीत जाते हैं। पिछले एक साल में 2 करोड़ घंटे की कक्षाएं शिक्षकों के न होने से रद्द हुईं। सरकार ने हाल ही में हजारों टीचर के पोस्ट निकाले लेकिन कम वेतन और कठिन परिस्थितियों के कारण युवा इस पेशे में नहीं आ रहे हैं। शिक्षकों के वेतन को महंगाई के अनुपात में बढ़ाने और रिक्त पदों को भरने के लिए सरकार को सालाना कम से कम लगभग 32000 से 55000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त आवंटन चाहिए।
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फ्रांस के कई शहरों में स्कूलों की हालत बेहद खराब है। कई पुरानी इमारतों में हीटिंग सिस्टम ठप हैं। साथ ही छतें टपक रही हैं और क्लासरूम में जरूरत से ज्यादा बच्चे ठूंसे गए हैं। इन सब को बेहतर स्थिति में लाने के लिए लगभग €12 से €15 अरब यूरो यानी लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपये की जरूरत है। प्रशासन के पास इस बुनियादी ढांचे को सुधारने के लिए धन का भारी अभाव है। फ्रांस का सार्वजनिक कर्ज रिकॉर्ड जीडीपी के 119% को पार कर चुका है और बजट घाटा 5.4% पर है। सरकार देश का कर्ज घटाने के लिए €54 अरब यूरो यानी 5.88 लाख करोड़ की कटौती लाने की तैयारी में है।
विडंबना यह है कि फ्रांस को अगले सालों में अपने कर्ज का ब्याज चुकाने के लिए जितना पैसा खर्च करना है (लगभग €74 अरब यूरो यानी 8.06 लाख करोड़ रुपये), वह उसके कुल शिक्षा बजट (€65.5 अरब यूरो यानी 7.13 लाख करोड़ रुपये) से भी ज्यादा है। सड़कों पर उतरे छात्रों और शिक्षकों की मांगें जायज हैं। उन्हें बेहतर क्लासरूम और पर्याप्त शिक्षक चाहिए। लेकिन फ्रांस सरकार की स्थिति यह है कि उसकी जेब खाली है। अगर सरकार शिक्षा बजट में कटौती करती है तो देश का भविष्य दांव पर लगता है। साथ ही अगर वह मांगें पूरी करने के लिए और उधार लेती है तो फ्रांस का आर्थिक ढांचा ढहने की कगार पर पहुंच जाएगा। यह कहना गलत नहीं होगा कि फ्रांस में सड़कों पर दिख रहा गुस्सा वास्तव में एक ढहती हुई कल्याणकारी राज्य व्यवस्था की सच्चाई है।