मौत की सजा देने के लिए आमतौर पर फांसी दी जाती है। कुछ देशों में जहरीला इंजेक्शन देकर या फिर गैस के चेंबर में बंद करके भी मौत की सजा दी जाती है। अब अमेरिका में एक शख्स को मौत की सजा देने के लिए उसे गोली मारी जाएगी। 13 लोगों की हत्या के दोषी मेजर निदाल मलिक हसन नाम के इस शख्स को 3 दिसंबर 2026 को गोली मारी जाएगी। अमेरिका के इतिहास में 65 साल के बाद ऐसा होगा कि सेना किसी शख्स को मौत की सजा देगी। निदाल मलिक को 2009 में टेक्सास में हुई गोलीबारी के मामले में दोषी करार दिया गया है।
अमेरिकी सेना के कार्यवाहक सेना सचिव एडम टेल ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा कि सेना के मेजर रहे निदाल मलिक हसन को फोर्ट हूड में गोली मारकर मौत की सजा दी जाएगी। अमेरिकी रक्षा विभाग के मुख्यालय पेंटागन के प्रवक्ता सीन पार्नेल ने सोमवार को कहा था कि राष्ट्रपति
डोनाल्ड ट्रंप
ने निदाल मलिक को दी गई मौत की सजा को मंजूरी दे दी है। बता दें कि अमेरिकी सेना ने 1961 के बाद से किसी को भी मौत की सजा नहीं दी है।
क्या है 2009 का टेक्सास शूटआउट केस?
5 नवंबर 2009 का दिन था। तब आर्मी में मेजर के पद पर रहा निदाल मलिक मनोवैज्ञानिक के तौर प काम करता था। वह फोर्ट हूड में बने एक आर्मी बेस की बिल्डिंग में लेजर वाली पिस्टल लेकर घुसा और अंधाधुंध फायरिंग कर दी। इस फायरिंग में एक गर्भवती सैनिक समेत कुल 13 लोगों की मौत हुई। 10 मिनट की इस गोलीबारी में 32 लोग घायल भी हुए थे। इस हमले में निदाल मलिक को भी गोलियां मारी गईं और उसके कमर के नीचे के हिस्से को लकवा मार गया।
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पहले उसका कोर्ट मार्शल किया गया और सेना से बाहर निकाल दिया गया। कोर्ट में सुनवाई जब से शुरू हुई तब से ही आर्मी की ओर से निदाल मलिक को मौत की सजा देने की मांग की गई। निदाल मलिक ने सुनवाई के दौरान खुद ही अपना पक्ष रखा और हमले की बात स्वीकार की।
इस कांड के बारे में निदाल मलिक हसन ने कहा था कि उसने सैनिकों को अफगानिस्तान जाने और अपने साथी मुसलमानों को मारने से रोकने के प्रयास में ऐसा किया था। उसने मुकदमे के दौरान अपना बचाव करने की कोई कोशिश नहीं की।
उसने यह हमला उस वक्त किया था जब कुछ ही हफ्तों में उसे भी अफगानिस्तान में तैनात किया जाने वाला था और वह वहां जाना नहीं चाहता था। जांच में सामने आया कि वह यमनी-अमेरिकी स्कॉलर अनवर-अल-अवलाकी के संपर्क में था। अनवर पर आरोप थे कि उसके ताल्लुक अलकायदा से थे।
इतनी देरी क्यों हुई?
दरअसल, अमेरिका में मौत की सजा बहुत कम ही दी जाती है। बता दें कि निदाल मलिक पर 'वर्कप्लेस वायलेंस' का आरोप लगा क्योंकि वहां के मिलिट्री जस्टिस कोड में 'आतंकवाद' से जुड़ी धाराएं ही नहीं हैं। इस केस में सेना की ओर से कई अपील की गईं जिनके चलते केस खिंचता रहा। 2020 में अमेरिकी सेना की अदालत ने मौत की सजा बरकरार रखी। 2023 में US कोर्ट ऑफ अपील्स ने भी इसे बरकरार रखा। मार्च 2025 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक समीक्षा के लिए दायर होने वाली अनिवार्य याचिका को खारिज कर दिया। आखिर में जब मौत की सजा पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के फैसला लेने की बारी आई तो उन्होंने इसे मंजूरी दे दी।
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अभी भी निदाल की ओर से अगर याचिका दायर कर दी जाए तो यह केस और आगे बढ़ सकता है। हालांकि, निदाल ने अभी तक खुद का बचाव नहीं किया है इसलिए माना जा रहा है कि अब उसे मौत की सजा देने में देरी नहीं होगी। फिलहाल, वह कंसास में स्थित फोर्ट लीवेनवर्थ की जेल में बंद है।
बता दें कि अमेरिकी सैन्य न्याय व्यवस्था में मृत्युदंड बेहद दुर्लभ है और मौत की सजा पर अमल उससे भी अधिक दुर्लभ है। सैन्य व्यवस्था में आखिरी बार मौत की सजा प्राइवेट जॉन बेनेट को दी गई थी। उसे 11 वर्षीय लड़की से दुष्कर्म के मामले में 1961 में फांसी दी गई थी।
कैसे मारी जाएगी गोली?
सजा पर अमल लाने वाले दिन दोषी को एक खास चेंबर में ले जाया जाता है। वहां रखी एक कुर्सी पर उसे बिठाया जाता है और बांध दिया जाता है। उसके सीने पर एक निशाना लगाया जाता है ताकि गोली सीधे वहीं मारी जा सके। इस सजा का नाम फायरिंग स्क्वाड है क्योंकि इसमें गोली मारने वाला शख्स कोई एक नहीं होता है। इसमें 3 से 5 लोग होते हैं जो राइफल लेकर खड़े होते हैं और सभी साथ खड़े होते हैं। एक और प्रथा है कि इनमें से किसी एक की राइफल में गोली ही नहीं होती है।
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यह तरीका अपनाने की वजह है कि गोली चलाने वाले लोगों के मन में यह संदेह हमेशा बना रहे कि आखिर उस शख्स की मौत किसकी गोली से हुई। हालांकि, इसको लेकर भी कई बार सवाल उठते रहे हैं। इस तरह से गोली मारने के बाद एक मेडिकल टीम जांच करती है कि जिसे गोली मारी गई उसकी मौत हुई या नहीं। मौत हो जाने के बाद सजा पूरी मानी जाती है। अगर शख्स फिर भी जिंदा बच जाए तब दूसकी प्रक्रिया शुरू की जाती है।