यमन के हूती विद्रोहियों के साथ सऊदी अरब भीषण संघर्ष में उलझ गया है। यमन के सरकारी बलों के साथ मिलकर सऊदी सेना हूती विद्रोहियों के ठिकानों पर बमबारी कर रही है, लेकिन हूती पहले से भी मजबूत शक्ति बनकर उभरे हैं। सऊदी अरब के कई रणनीतिक ठिकाने और शहर विद्रोहियों की रेंज में है। लाल सागर में बढ़ती घेरेबंदी ने भी सऊदी अरब को परेशान कर रखा है।
क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिकी राष्ट्रपति
डोनाल्ड ट्रंप
से हूती विद्रोहियों के खिलाफ सैन्य सहायता मांगी। हालांकि अमेरिका ने सीधे दखल देने से मना कर दिया। सऊदी अरब और हूती विद्रोहियों के बीच जंग दूसरे हफ्ते में प्रवेश कर चुकी है। ऐसे में आइये जानते हैं कि रियाद के समर्थन में अभी तक कौन-कौन देश सामने आए हैं?
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इजरायल: हूती विद्रोहियों के खिलाफ सऊदी अरब को सैन्य मदद की पेशकश करने वाला इजरायल पहला देश है। रियाद ने इजरायल की पेशकश पर सार्वजनिक तौर पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। मगर इजरायली न्यूज वेबसाइट द जेरूसलम पोस्ट ने क्षेत्रीय राजनयिक के हवाले से बताया कि इजरायल विद्रोहियों के खिलाफ सऊदी अरब को खुफिया जानकारी भेज रहा है। सऊदी अरब और इजरायल के बीच अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने मध्यस्थता की। रिपोर्ट के मुताबिक सेंटकाम के मध्यम से रियाद ने तेल अवीव से सहायता मांगी थी। इजरायल इसके लिए पहले से ही तैनात था।
इजरायल और सऊदी अरब के बीच राजनयिक संबंध नहीं हैं। बावजूद इसके इजरायल ने सऊदी अरब की आत्मरक्षा में मदद की। हूती विद्रोहियों के ठिकानों की सटीक जानकारी दी। बुनियादी ढांचे और शिपिंग को सुरक्षित बनाने में सहायता पहुंचाई।
अमेरिका: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सैन्य दखल देने से मना किया लेकिन खुफिया मदद पहुंचा रहा है। सेंटकॉम प्रमुख एडमिरल ब्रैड कूपर ने हाल ही में दो बार रियाद का दौरा किया। यहां क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान समेत अन्य अधिकारियों के साथ मुलाकात की। सैन्य अधिकारियों के साथ समन्वय बैठकों में हिस्सा लिया। सेंटकॉम हूती विद्रोहियों के खिलाफ सऊदी अरब को सटीक खुफिया जानकारी भेज रहा है।
यमन: हूती विद्रोहियों के खिलाफ यमन के भीतर भी जंग छिड़ी है। यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार की सेना अलग-अलग मोर्चों पर हूती विद्रोहियों से जंग लड़ रही है। इन बलों को सऊदी अरब का समर्थन हासिल है। अब तक की जंग में 500 से अधिक सरकारी सेना के जवानों की जान जा चुकी है। इस सैन्य गठबंधन का उद्देश्य हूती विद्रोहियों को हटाकर संप्रभु यमन की स्थापना करना है।
ब्रिटेन: अमेरिका के बाद सऊदी अरब ने ब्रिटेन से सीधी सैन्य मदद मांगी। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी अरब ने ब्रिटेन से सीधे हस्तक्षेप का अनुरोध किया, ताकि बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य से हूती विद्रोहियों को हटाया जा सके और ईंधन व बुनियादी ढांचे की रक्षा की जा सके। बदले में ब्रिटिश प्रधानमंत्री एंडी बर्नहैम सऊदी अरब की सहायता की बात कही है। उन्होंने ब्रिटिश सैन्य सलाहकारों को भेजने की मंजूरी दी। हालांकि सीधे सैन्य दखल का कोई एलान नहीं किया।
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क्या पाकिस्तान और तुर्की से नहीं मांगी मदद?
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी अरब ने मिस्र समेत अपने अन्य पड़ोसी देशों से भी बातचीत की। उनसे क्षेत्रीय समर्थन की मांग की। अब सवाल उठता है कि सऊदी अरब ने मक्का रक्षा समझौते के तहत पाकिस्तान और तुर्की से सहायता क्यों नहीं मांगी? क्योंकि पाकिस्तान और तुर्की के अधिकारियों का दावा है कि अभी तक सऊदी अरब ने मक्का समझौते के तहत किसी भी मदद का अनुरोध नहीं किया।
पाकिस्तान और तुर्की का यह दावा लोगों के गले नहीं उतर रहा है। इसकी वजह यह है कि सऊदी अरब ने इजरायल और मिस्र जैसे देशों से सहायता मांग ली तो रक्षा समझौते के तहत इन देशों से सहायता क्यों नहीं मांगी? क्या तुर्की और पाकिस्तान मनगढ़ंत कहानी बनाने में जुटे हैं, क्योंकि पिछले एक सप्ताह से मक्का समझौते पर सवाल उठने लगे हैं।
मक्का समझौते से भी पहले पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच 2025 में सामरिक पारस्परिक रक्षा समझौते हुआ था। इसमें भी एक देश पर हमला दूसरे देश पर हमला मानने वाला प्रावधान है। समझौते के तहत करीब 8000 पाकिस्तानी सैनिक, दर्जनों लड़ाकू विमान और पाकिस्तानी एयर डिफेंस सिस्टम सऊदी अरब में तैनात हैं। बावजूद इसके पाकिस्तान सैन्य मदद क्यों नहीं कर रहा? यही सबसे बड़ा सवाल है।