मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर बांग्लादेश के अगले राष्ट्रपति होंगे। 35 साल बाद बुधवार को आयोजित प्रत्यक्ष चुनाव में आलमगीर को जीत मिली। उन्हें बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने अपना प्रत्याशी बनाया था। उनका मुकाबला सेवानिवृत्त कर्नल ओली अहमद से था। ओली अहमद को जमात-ए-इस्लामी समेत कुल 11 दलों का समर्थन प्राप्त था।
आलमगीर के पक्ष में 255 वोट पड़े। वहीं ओली अहमद को महज 88 वोट मिले। 167 मतों के अंतर से आलमगीर ने राष्ट्रपति का चुनाव जीता। आइये जानते हैं कि मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर के बारे में, उनका भारत से क्या कनेक्शन है?
मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर की सियासत की शुरुआत छात्र राजनीति से हुई थी। बीएनपी में आने से पहले आलमगीर ने 1960 के दशक में वामपंथी छात्र संगठन पूर्वी पाकिस्तान छात्र संघ ज्वाइन किया। 1969 में पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के खिलाफ विद्रोह में हिस्सा लिया और जेल तक की हवा खाई। बीएनपी ज्वाइन करने के बाद आलमगीर का सियासी सितारा हमेशा बुलंद रहा।
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1971 में पाकिस्तान से टूटकर बांग्लादेश अलग देश बना। एक साल बाद 1972 में मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने सिविल सेवा परीक्षा पास की और शिक्षा कैडर के तहत ढाका कॉलेज में प्रवक्ता बने। इसके बाद आलमगीर का करियर बुलंदियों छूता रहा। वे न केवल निरीक्षण एवं लेखापरीक्षा निदेशालय में डिप्टी डायरेक्टर बने, बल्कि बांग्लादेश के डिप्टी पीएम एसए बारी के निजी सचिव की भी जिम्मेदारी निभाई।
प्रभावशाली सियासी खानदान से रिश्ता
मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर का ताल्लुक बांग्लादेश के एक प्रभावशाली सियासी खानदान से है। उनके पिता रुहुल अमीन ठाकुरगांव से न केवल कई बार सांसद बने, बल्कि बांग्लादेश के कृषि मंत्री रहे। चाचा मिर्जा गुलाम हाफिज बांग्लादेश की दूसरी संसद के अध्यक्ष बने। इसके अलावा कानून, संसदीय मामले, न्याय और भूमि जैसे अहम मंत्रालयों की जिम्मेदारी निभाई थी। आलमगीर के छोटे भाई मिर्जा फैसल अमीन ठाकुरगांव नगरपालिका के अध्यक्ष रह चुके हैं। मौजूदा समय में बीएनपी के जिला अध्यक्ष हैं।
नौकरी छोड़कर सियासत में रखा कदम
आलमगीर ने अपने सक्रिय सियासी सफर की शुरुआत 1986 में उस वक्त किया, जब उन्होंने सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया था। 26 जनवरी 1948 को ठाकुरगांव में जन्मे आलमगीर ने अपने जीवन का पहला चुनाव 1988 में अपनी जन्मभूमि ठाकुरगांव नगरपालिका से बतौर निर्दलीय उम्मीदवार लड़ा था। पहले ही प्रयास में वे नगरपालिका के अध्यक्ष बने।
मंत्री से बीएनपी के महासचिव तक
आलमगीर ने 1990 में बीएनपी ज्वाइन की। दो साल बाद 1992 में उन्हें ठाकुरगांव बीएनपी जिलाध्यक्ष बनाया गया। 2001 में बीएनपी ने पहली बार ठाकुरगांव-1 सीट से आलमगीर को संसदीय चुनाव में उतारा। चुनाव जीतने के बाद उन्हें कृषि, नागरिक उड्डयन और पर्यटन मंत्री की जिम्मेदारी मिली। 2008 के संसदीय चुनाव में मिली हार के बावजूद बीएनपी में आलमगीर का कद कभी नहीं घटा। साल 2016 में उन्हें पार्टी का महासचिव बनाया गया। वे पिछले 10 साल से इस पद पर काबिज है।
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क्या है भारत कनेक्शन?
आलमगीर के पास ढाका विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एमए की डिग्री है। उनकी पत्नी आरा बेगम ढाका की एक बीमा कंपनी में नौकरी करती हैं। आरा बेगम कलकत्ता विश्वविद्यालय से पढ़ी हैं। दोनों दो बेटियों के माता-पिता हैं। एक बेटी मिर्जा शमारूह ढाका विश्वविद्यालय में पढ़ती हैं, जबकि दूसरी बेटी मिर्जा सफारुह एक स्कूल शिक्षक हैं। 1971 में बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम के दौरान आलमगीर ने कुछ समय की खातिर भारत में शरण ली थी। उनके एक चाचा विंग कमांडर एसआर मिर्जा मुजीबनगर की निर्वासित सरकार का हिस्सा थे।