यमन के हूती विद्रोहियों के खिलाफ मिस्र जंग में कूद सकता है। राष्ट्रपति अब्देल फत्ताह अल-सिसी रियाद सेना भेजने के पक्ष में है। अगले हफ्ते मिस्र की संसद में वोटिंग होगी। इससे तय होगा कि मिस्र की सेना हूती विद्रोहियों के खिलाफ जंग में उतरेगी या नहीं। मगर उससे पहले मिस्र के सांसदों को एक बड़ी जंग में उलझने का खतरा सताने लगा है।
राष्ट्रपति अल-सिसी ने पहली बार शनिवार को संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग की। रविवार को विशेष सत्र बुलाया गया। हालांकि वोटिंग को 26 अक्टूबर तक टाल दिया गया। अब सोमवार को संसद में वोटिंग होने की उम्मीद है।
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सेना भेजने के खिलाफ क्यों विपक्ष?
मिस्र की विपक्षी पर्टियां सेना भेजने के प्रस्ताव के विरोध में हैं। उनका तर्क है कि इससे मिस्र न केवल जंग में उलझेगा, बल्कि उसे सुरक्षा और आर्थिक कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ सकता है। विपक्षी गठबंधन सिविल डेमोक्रेटिक मूवमेंट का कहना है कि काहिरा को मध्यस्थता करने पर जोर देना चाहिए। इजिप्शियन सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ने अपने सांसदों को वोटिंग से दूर रहने का व्हिप जारी किया। वफद पार्टी ने सेना भेजने का समर्थन किया है, लेकिन उसके सांसद मोहम्मद अब्देल-अलीम दाऊद ने वोटिंग में हिस्सा न लेने की बात कही।
संसद में कितने बहुमत की जरूरत?
राष्ट्रपति सेना को सऊदी अरब भेजना चाहते हैं, लेकिन मिस्र में सबकुछ राष्ट्रपति के मन से नहीं होता है। विदेश में छिड़ी किसी भी जंग में सेना को भेजने से पहले संसद की मंजूरी जरूरी होती है। यह संवैधानिक बाध्यता है। मतलब इससे बचा नहीं जा सकता है। प्रक्रिया के तहत राष्ट्रपति को सबसे पहले राष्ट्रीय रक्षा परिषद से सलाह लेनी होती है। इसके बाद संसद में दो-तिहाई बहुमत हासिल करना होगा। अगर यह बहुमत नहीं मिलता है तो राष्ट्रपति चाहकर भी अपनी सेना सऊदी अरब नहीं भेज पाएंगे।
मिस्र की संसद का गणित किसके पक्ष में?
हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स मिस्र की संसद का निचला और मुख्य विधायी सदन है। इसमें कुल 596 सदस्य होते हैं। दो-तिहाई बहुमत के लिए 398 सदस्यों की जरूरत होगी। निचले सदन में राष्ट्रपति अल-सिसी का दबदबा है। उन्हें वफद, अदल और रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी का समर्थन मिला है। निचले सदन में अभी कुल 568 निर्वाचित सीटे हैं। इनमें से 53 पर विपक्षी दलों और 105 पर निर्दलियों का कब्जा है। मतलब साफ है कि विपक्ष के विरोध के बावजूद सेना भेजने वाला प्रस्ताव आराम से पास हो सकता है।
कैसे होगी मिस्र की सैन्य सहायता?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि सऊदी अरब को मिस्र किस प्रकार की सैन्य सहायता देगा? इसका जवाब खुद राष्ट्रपति अल-सिसी ने दिया। उन्होंने बताया कि सऊदी अरब में मिस्र का मिशन रक्षात्मक होगा। रियाद के मदद मांगने पर भी सेना को भेजा जाएगा। उन्होंने साफ कर दिया कि मिस्र अपने बचाव और सुरक्षा में सऊदी अरब के कहने पर ही कोई कदम उठाएगा।
राष्ट्रपति के एलान के बाद मिस्र के विदेश मंत्री बद्र अब्देलती और खुफिया प्रमुख हसन रशद बुधवार को सऊदी अरब पहुंचे। दोनों ने राजधानी रियाद में क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से मुलाकात की और उन्हें राष्ट्रपति अल-सिसी का एक पत्र सौंपा। पत्र में लिखा है कि मिस्र की सेना सऊदी अरब को उसकी सीमाओं की रक्षा में मदद करेगी। यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ हमले हिस्सा नहीं लेगी।
सऊदी अरब से मिस्र के कौन से हित जुड़े?
सऊदी अरब मौजूदा समय में मिस्र का सबसे अहम आर्थिक और रणनीतिक सहयोगी है। मिस्र की ऊर्जा सुरक्षा भी काफी हद तक सऊदी अरब पर टिकी है। इसके अलावा रियाद सेंट्रल बैंक डिपॉजिट और आर्थिक संकट से उबरने में भी मदद पहुंचाता है। इस कारण हूती विद्रोहियों के खिलाफ रियाद का समर्थन करना काहिरा के लिए रणनीतिक व नैतिक जिम्मेदारी है।
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दूसरी वजह यह है कि लाल सागर में हूती विद्रोहियों के दखल के कारण समुद्री व्यापार पर बुरा असर पड़ा है। स्वेज नहर से होने वाला व्यापार धीमा पड़ गया है। इससे मिस्र के सामने बड़ा आर्थिक जोखिम पैदा हो गया, क्योंकि मिस्र की जीडीपी का लगभग 2% हिस्सा नहर से ही आता है। हूती विद्रोहियों के हमले के कारण कमाई में लगभग 60 फीसद तक की कमी देखी गई है।
क्या जंग में उलझ जाएगा मिस्र?
मिस्र के पास क्षेत्र की सबसे बड़ी सेना में से एक है। संसद से मंजूरी के बाद अगर मिस्र की सेना रियाद पहुंचती है तो एक बड़ी जंग में उलझने का खतरा है। आज हूती विद्रोहियों के पास मिस्र तक मार करने वाले हथियार उपलब्ध हैं। इजरायल पर दर्जनों मिसाइल और ड्रोन से हमला करके हूती विद्रोही अपनी कबीलियत साबित भी कर चुके हैं। इस बीच हूती विद्रोहियों ने मिस्र को खुली चेतावनी भी दी। हूतियों ने मिस्र की संसद से प्रस्ताव को रद्द करने का अनुरोध किया और कहा कि अगर मिस्र इस रास्ते पर चलता है तो यह उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा और घरेलू स्थिरता के लिए एक बड़ा खतरा बनेगा।