ईरान से दुश्मनी और अमेरिका भी छोड़ रहा साथ, नए संकट में फंसे खाड़ी देश
अमेरिका और खाड़ी देशों के बीच मतभेद बढ़ते जा रहे हैं। न चाहते हुए इन देशों को युद्ध में घसीटा गया। अब युद्ध में शामिल होने का दबाव बनाया जा रहा है।

डोनाल्ड ट्रंप। (Photo Credit: PTI)
अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जंग में सबसे बड़ी कीमत खाड़ी देशों को उठाना पड़ रहा है। ईरानी हमलों के खिलाफ अमेरिका इन देशों की मदद भी नहीं कर रहा है। दूसरी तरफ अपने नागरिकों, अधिकारियों और सैनिकों को वहां से हटा रहा है। खाड़ी देशों में इस बात की बहस होने लगी है कि अगर अमेरिका संकट में रक्षा ही नहीं कर सकता है तो उसे सैन्य ठिकाना बनाने की अनुमति देने का औचित्य ही क्या है?
युद्ध शुरू होने के पहले सभी खाड़ी देशों ने ईरान पर हमला न करने का दबाव अमेरिका पर बनाया। मगर ट्रंप प्रशासन ने किसी की न सुनी। खाड़ी देशों को लगता है कि वह न तो युद्ध में शामिल हैं और न ही उसका समर्थन करते हैं। बावजूद उन्हें युद्ध में न केवल घसीटा गया, बल्कि सबसे अधिक कीमत भी चुकानी पड़ रही है।
अमेरिका ने संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कुवैत, कतर, बहरीन और जॉर्डन में कई सैन्य अड्डे स्थापित किए। इससे इन देशों में एक सुरक्षा की भावना पैदा हुई। ऊर्चा समेत अन्य क्षेत्रों में भारी निवेश से अमेरिका खाड़ी क्षेत्र का सबसे बड़ा सुरक्षा गारंटर बन गया। हालांकि मौजूद युद्ध ने खाड़ी देशों की इस धारणा को तोड़कर रख दिया। वहीं अमेरिका की सिक्योरिटी गारंटर वाली इमेज भी ध्वस्त हो गई।
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खाड़ी देशों में इंटरसेप्टर की भारी कमी
खाड़ी देश ड्रोन और मिसाइल इंटरसेप्टर की भारी कमी से जूझने में जुटे हैं। ईरान से जंग के एक सप्ताह के भीतर ही खाड़ी के देशों ने अमेरिका से और इंटरसेप्टर की मांग की थी। मगर ठोस जवाब देने के बजाय अमेरिका टालमटोल करने में जुटा है। बुधवार को सीबीएस की रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ। मौजूदा समय में इंटरसेप्टर की इतनी कमी हो गई है कि खाड़ी देशों को यह तय करना पड़ेगा कि उसे कौन सी मिसाइल मार गिरानी है या नहीं।
सीधे युद्ध से क्यों बच रहे खाड़ी के देश
हजारों मिसाइल और ड्रोन हमलों के बावजूद खाड़ी के देश ईरान के साथ सीधे युद्ध से बच रहे हैं। इसके पीछे एक वजह यह है कि अगर युद्ध में कूदा गया तो क्या अमेरिका उनकी रक्षा में आएगा। युद्ध की स्थिति में ईरान ने सीधे हमला किया तो खाड़ी देशों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है, क्योंकि अभी ईरान अधिकांश हमलों में अमेरिकी संपत्ति को ही निशाना बना रहा है। इन देशों की अर्थव्यवस्था एनर्जी के निर्यात पर टिकी है। ईरान ने इस सेक्टर को निशाना बनाया तो तबाही आनी तय है।
पीछे क्यों हट रहा ट्रंप प्रशासन?
अमेरिका अब किसी भी हाल में खाड़ी देशों को युद्ध में घसीटना चाहता है। इसकी वजह यह है कि उसे वैसे नतीजे नहीं मिले हैं, जिसकी उसने युद्ध शुरू करने से पहले आशा की थी। ईरान के हमलों में तीन जहाज को खोना पड़ा। कई रडार और एयर डिफेंस सिस्टम की तबाही हुई। हजारों सैनिकों और मध्य पूर्व से अधिकारियों को हटाना पड़ा। दूतावास वीरान हो गए। सऊदी अरब में सीआईए का स्टेशन नष्ट हो चुका है। 10 हजार से अधिक स्थानों पर हमले के बावजूद ईरान हथियार डालने को तैयार नहीं है। होर्मुज पर अमेरिका का नियंत्रण नहीं है। कौन सा जहाज स्ट्रेट को पार करेगा, यह ईरान तय कर रहा है। यही कारण है कि अब अमेरिका चाहता है कि खाड़ी के अन्य देश भी उसके साथ युद्ध में कूदे।
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कैसे खाड़ी देशों पर दबाव बना रहा अमेरिका?
9 मार्च को अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने सऊदी अरब पर खूब भड़ास निकाली। दरअसल, सऊदी अरब ईरान पर हमला करने को तैयार नहीं है। यही बात ग्राहम को अच्छी नहीं लग रही। उन्होंने अन्य खाड़ी देशों को भी सीधे धमकी दी और कहा कि अगर ईरान के खिलाफ जंग में खाड़ी देश शामिल नहीं होते हैं तो उन्हें परिणाम भुगतने होंगे। अपने पोस्ट में ग्राहम ने पूछा कि क्या अमेरिका को सऊदी अरब जैसे देश के साथ रक्षा समझौता करना चाहिए, जो आपसी हित के युद्ध में शामिल होने को तैयार नहीं है।
लिंडसे ग्राहम ने अपने एक बयान में कहा था कि उम्मीद है कि खाड़ी सहयोग परिषद के देश जंग में अधिक सक्रिय तौर पर हिस्सा लेंगे, क्योंकि यह लड़ाई उनके घर के बिल्कुल करीब है। अगर आप अभी अपनी सेना का इस्तेमाल करने को तैयार नहीं हैं, तो कब करेंगे? आशा है कि यह स्थिति जल्द ही बदलेगी। अगर ऐसा नहीं हुआ तो इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे।
ईरान के हमले से अमेरिकी के सहयोगी कितने प्रभावित
ईरान के हमलों के बावजूद सऊदी अरब समेत तमाम खाड़ी देशों ने अमेरिका को बेस के इस्तेमाल की मंजूरी नहीं दी। संयुक्त राष्ट्र में यूएई के राजदूत ने कहा कि हमलों के बावजूद उनका देश ईरान पर हमला नहीं करेगा। अभी तक अधिकांश खाड़ी देश रक्षात्मक भूमिका में है, जबकि अमेरिका चाहता है कि यह देश भी उसके साथ जंग में हिस्सा लें।
11 मार्च तक ईरान ने संयुक्त अरब अमीरात पर 241 बैलिस्टिक मिसाइल और 1,385 ड्रोनों से हमला किया। युद्ध के पहले दो दिन में कुवैत पर 97 बैलिस्टिक मिसाइलों और 283 ड्रोनों को निष्क्रिय किया गया। वहीं 11 मार्च तक बहरीन पर 106 मिसाइलों और 177 ड्रोनों को रोका है। सऊदी अरब भी मिसाइल और ड्रोन हमलों की चपेट में है। मगर अभी तक खाड़ी देशों ने धैर्य का परिचय दिया। वहीं अमेरिका से उम्मीद के मुताबिक सुरक्षा नहीं मिलने से इन देशों के नेताओं में नाराजगी है।
अब तक 40 हजार से अधिक उड़ानों को रद्द करना पड़ा है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से ऊर्जा का निर्यात ठप है। व्यापार के अलावा पर्यटन सेक्टर भी प्रभावित है। भारी नुकसान के बावजूद यह देश अब भी तटस्थ हैं। इसकी एक वजह यह भी कि शायद उन्हें अब अमेरिका की सुरक्षा गारंटी पर पहले जैसा भरोसा नहीं रहा।
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