आर्थिक घेरेबंदी, दोस्तों पर हमला; ट्रंप की दादागीरी के आगे पुतिन क्यों चुप?
अमेरिका ने 2011 से अब तक रूस के कई साथियों को छीन लिया है। मगर पुतिन चुप हैं। इससे रूस की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहा है। 2011 में लीबिया में मुअम्मर गद्दाफी, 2014 में यूक्रेन के विक्टर यानुकोविच, 2024 में सीरिया में बशर अल-असद, 2026 में वेनेजुएला में निकोलस मादुरो और अब अली खामेनेई निशाने पर हैं।

व्लादिमीर पुतिन और डोनाल्ड ट्रंप। (AI Generated Image)
2024 में सीरिया से बशर अल असद का पतन, 2026 में वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और अब ईरान पर अमेरिकी हमले की धमकी के बावजूद रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन चुप हैं। अमेरिका लगातार रूस के सहयोगियों को निशाना बना रहा है। उसके तेल टैंकरों को जब्त कर रहा है। मगर रूस से वैसी प्रतिक्रिया नहीं आई, जैसा दुनिया सोचकर बैठी थी।
1962 में सोवियत संघ ने अमेरिका के खिलाफ क्यूबा में अपनी मिसाइलें तैनात कर दी थी। अब क्यूबा को लगातार ट्रंप से धमकियां मिल रही हैं, लेकिन रूस ने चुप्पी साध रखी है। 1971 में अमेरिकी धमकियों के खिलाफ रूस ने खुलकर भारत का साथ दिया था। मगर मौजूदा परिदृश्य में अमेरिका के खिलाफ रूस उतना आक्रामक नहीं है, जितना पहले दिखता था। आइये समझते हैं कि अमेरिकी 'दादागीरी' के खिलाफ पुतिन ने चुप्पी क्यों साध रखी है?
अमेरिका के आक्रामकता पर चुप्पी के कारण रूस मध्य पूर्व, लैटिन अमेरिका और अफ्रीका तक अपने प्रभाव को खो रहा है। 2024 में सीरिया में बशर अल असद का पतन हुआ। उस वक्त रूस ने असद को शरण देने के अलावा कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, जबकि असद रूस के बेहद अहम सहयोगी थी। वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो भी रूस और चीन के करीबी थे। मगर अमेरिका उन्हें उनकी राजधानी से उठा ले गया। इस मामले में भी रूस की प्रतिक्रिया सिर्फ बयानबाजी तक सीमित रही।
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रूस के सबसे अहम सहयोगियों में शामिल ईरान को अमेरिका रोजाना नई धमकी दे रहा है। किसी भी वक्त अमेरिकी सेना हमला कर सकती है। इन गंभीर धमकियों के बावजूद रूस ने अभी तक ईरान के समर्थन में कोई ठोस कदम नहीं उठाया।
कीव पोस्ट के मुताबिक मध्य पूर्व के एक अनुभवी विशेषज्ञ मार्क कैट्ज ने कहा, 'ईरान के विरोध प्रदर्शनों पर पुतिन आश्चर्यजनक तौर पर चुप हैं। वे ईरान में अपने सहयोगी की रक्षा के लिए कुछ खास नहीं कर रहे हैं। सीरिया में बशर अल असद के पतन के बाद भी रूसी ने अपनी पकड़ बना रखी है। इस पर कैट्ज ने कहना है कि इससे इस बात का संकेत मिलता है कि रूस अपने हितों को प्राथमिकता देता है। अगर नेतृत्व बदलता है तो मॉस्को सत्ता में आने वाले किसी भी व्यक्ति के साथ काम करेगा। यह उन साझेदारों के लिए चिंताजनक है, जो रूस से सुरक्षा की उम्मीद करते हैं।'
वेनेजुएला पर हमले के बाद अमेरिका ने एक रूसी तेल टैंकर को जब्त किया। इस मामले में भी रूस ने सिर्फ राजनयिक बयानबाजी की। माना जा रहा है कि रूस की चुप्पी का नतीजा यह हो सकता है कि भविष्य में अमेरिकी और रूसी तेल टैंकरों को निशाना बना सकता है। अटलांटिक काउंसिल के लैटिन अमेरिका सेंटर के ज्योफ रैमसे ने भी तेल टैंकरों मामले में मॉस्को की प्रतिक्रिया को राजनयिक बताया। इसमें संवाद का आह्वान किया गया लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
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अमेरिकी आक्रामकता के खिलाफ क्यों चुप पुतिन?
यूक्रेन युद्ध: विश्वेषकों का मानना है कि रूस काफी हद तक यूक्रेन युद्ध पर उलझा है। वह वहां अपने लक्ष्यों को हासिल करना चाहता है। यही कारण है कि पुतिन दुनिया के अन्य हिस्सों में सीधे तौर पर उलझना नहीं चाहते हैं, जबकि अमेरिका उन पर यूक्रेन में शांति का दबाव बना रहा है। अमेरिकी आक्रामकता के खिलाफ पुतिन की चुप्पी के पीछे एक वजह यह भी है कि वह ट्रंप के साथ उलझना नहीं चाहते हैं। इसी वजह से वह सार्वजनिक प्रतिक्रिया देने से बच रहे हैं। हालांकि पुतिन के सब्र की एक सीमा है। अब यह देखना होगा कि सब्र की यह सीमा कब तक पार नहीं होती।
सीमित विकल्प: अमेरिका के खिलाफ रूस के पास बेहद सीमित विकल्प हैं। रूस रेयर अर्थ जैसे हथियार से अमेरिका को जवाब देने की ताकत रखता है। लेकिन पुतिन के पास ऐसे विकल्प नहीं है। अगर अमेरिका के खिलाफ रूस को कुछ करना है तो सिर्फ सैन्य हस्तक्षेप, परमाणु धमकी और राजनयिक विकल्प ही है। अभी रूस राजनयिक विकल्प का इस्तेमाल कर रहा है।
नई व्यवस्था: डोनाल्ड ट्रंप सैन्य ताकत की दम पर एक नई ताकत की वैश्विक व्यवस्था बनाने में जुटे हैं। वह 'जिसकी लाठी, उसी की भैंस' के तहत दुनिया को चलाना चाहते हैं। रूस उनकी इस रणनीति को अवसर के तौर पर देख रहा है। यही कारण है कि अपने साथियों को खोने के बावजूद मॉस्को चुप है, ताकि नई व्यवस्था में अमेरिका को मात दी जा सके। मौजूदा समय में रूस इसे अपने सहयोगियों से भी अधिक महत्वपूर्ण मान रहा है।
सीमित संसाधन: विश्लेषकों का मानना है कि रूस के पास संसाधन काफी सीमित है। आर्थिक स्थिति भी उतनी मजबूत नहीं है। अमेरिकी प्रतिबंध और तेल के खिलाफ लामबंदी से मॉस्को को और चोट लगी है। यही कारण है कि आज वजह दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सैन्य हस्तक्षेप की स्थिति में नहीं है। दूसरी तरफ वह अमेरिका के साथ संतुलन बनाकर चलना चाहता है, ताकि इसका इस्तेमाल प्रतिबंधों के बदले रियायत हासिल करने में किया जा सके।
साहेल में क्यों विश्वास खो रहा रूस?
अफ्रीका के साहेल क्षेत्र में रूस की पकड़ कमजोर हो रही है। वहीं कई नरसंहार में रूसी वैगनर समूह के शामिल होने के बाद अविश्वास और बढ़ा। साहेल इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेसी एंड गवर्नेंस के कार्यकारी निदेशक मौसा कोंडो का कहना है कि रूस ने यहां अपने कई वादों को पूरा नहीं किया। इस वजह से भी रूस यहां अपनी विश्वासनीयता खो रहा है।
कैसे रूस को घेर रहा अमेरिका?
अमेरिका रूस को चौतरफा घेरने की रणनीति पर काम कर रहा है। एक तरफ उसको यूक्रेन युद्ध में उलझा रखा है। दूसरी तरफ एक-एक करके उसे साथियों को सीरिया से वेनेजुएला और ईरान तक निपटा रहा है। अमेरिका की रूस को आर्थिक तौर पर भी घेरने की रणनीति है। इसी के तहत ट्रंप प्रशासन ने भारत पर 25 फीसद अतिरिक्त टैरिफ लगाया, ताकि तेल से होने वाली रूस की कमाई को सीमित किया जा सके। पिछले साल ट्रंप ने रूस की करीब 30 कंपनियों पर प्रतिबंध भी लगाया। अब खबर है कि इन कंपनियों की संपत्तियों को जब्त करने की कार्रवाई की जा रही है। अब ट्रंप प्रशासन एक नया बिल ला रहा है। इसमें रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 500 फीसद टैरिफ लगाने का प्रावधान है।
कब तक चुप्पी साधेंगे पुतिन?
द न्यू स्कूल में अंतरराष्ट्रीय मामलों की प्रोफेसर नीना एल ख्रुश्चेवा का कहना है कि पुतिन को कमजोरी का कोई भी रूप पसंद नहीं है। न ही वे अमेरिका के साथ तनाव बढ़ाना चाहते हैं। इस कारण वे चुप हैं। मगर उनके दबाव में रहने की भी एक सीमा है। सवाल यह है कि क्या ट्रंप प्रशासन उन सीमाओं को जानने के लिए दृढ़ संकल्पित होगा। हाल ही में पुतिन ने कहा था कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। मुझे नहीं लगता कि कोई इससे असहमत होगा। लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष तेज हो रहे हैं और नए गंभीर तनाव के बिंदु उभर रहे हैं। हालांकि पुतिन ने अपने संबोधन में ईरान और वेनेजुएला का जिक्र तक नहीं किया।
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