प्रदुषण के संबंध में कई रिसर्च सामने आते रहते हैं। रिसर्च में पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में बताया जाता है। ऐसा ही एक रिसर्च सामने आया है जिसमें बताया गया है कि बढ़ता प्रदुषण अब केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है बल्कि यह सीधे हमारे शरीर के अंदरूनी सिस्टम पर हमला कर रहा है। इसके अनुसार, हवा में CO2 बढ़ने की वजह से खून में बाइकार्बोनेट का स्तर बढ़ रहा है, जो शरीर के लिए एक खतरनाक संकेत है।
यह बदलाव विशेष रूप से बच्चों और युवाओं के लिए चिंताजनक है। चूंकि उनका शरीर अभी विकसित हो रहा है, इसलिए आने वाले दशकों में उन्हें लंबे समय तक इसी के साथ रहना पड़ता है, जिसका बुरा असर उनके अंगों के विकास पर पड़ सकता है।
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रिसर्च में क्या आया सामने?
इस स्टडी में तीन मुख्य बातें निकलकर सामने आईं है। पिछले 20 सालों में खून में बाइकार्बोनेट का स्तर करीब 7% बढ़ गया है। यह ठीक उसी रफ्तार से बढ़ा है जिस रफ्तार से दुनिया में CO2 बढ़ा है। जहां बाइकार्बोनेट बढ़ा है, वहीं खून में जरूरी मिनरल्स जैसे कैल्शियम में 2% की कमी और फास्फोरस में 7% की कमी का स्तर गिरा है।
जब शरीर CO2 की अधिकता को संभालने की कोशिश करता है, तो हड्डियां इसे सोखने लगती हैं। इससे हड्डियां गलने लगती हैं और शरीर से जरूरी पोषक तत्व बाहर निकल जाते हैं।
शरीर पर पड़ने वाले गंभीर प्रभाव
रिसर्च में कहा गया है कि हमारे शरीर का विकास कम CO2 वाले वातावरण में हुआ है, इसलिए हमारा सिस्टम अचानक बढ़ रहे इस बदलाव को झेलने के लिए तैयार नहीं है। इसके कुछ बड़े खतरे हैं, जैसे पर्यावरण में CO2 बढ़ने से सीखने की क्षमता कम हो सकती है, घबराहट बढ़ सकती है और पैनिक अटैक आने का खतरा रहता है।
खून के pH लेवल में बदलाव से दिल की धड़कनें बिगड़ सकती हैं और आर्ट्रीज व किडनी में कैल्सीफिकेशन की समस्या हो सकती है। कैल्शियम की कमी से शरीर में सुन्नपन, मांसपेशियों में ऐंठन और भ्रम की स्थिति तक पैदा हो सकती है।
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भविष्य की डरावनी तस्वीर
अगर CO2 इसी रफ्तार से बढ़ती रही, तो ऐसा अनुमान है कि, साल 2076 तक खून में बाइकार्बोनेट की सुरक्षित सीमा खत्म हो जाएगी। साल 2085 से 2099 के बीच कैल्शियम और फास्फोरस का स्तर इतना गिर जाएगा कि यह बीमारियों का रूप ले लेगा।
हमें भले ही यह समय काफी लंबा लग रहा हो लेकिन पिछले समय के मुताबिक यह बहुत जल्दी पार कर गया। इसे देख कर ऐसा लग रहा है कि हम ऐसे दौर में आ चुके हैं जहां हमारा शरीर प्रदूषण के साथ तालमेल बिठाने के लिए मजबूर है। अगर समय रहते इसे कम नहीं किया गया तो दुनिया के लिए बड़ा और गंभीर स्वास्थ्य संकट बन जाएगा।