दुनिया को 'हेल्दी कैरियर' समझाने वाली 'टाइफाइड मैरी' कौन थीं?
यह कहानी उस महिला की है जिसकी वजह से हेल्थ की दुनिया में 'हेल्दी कैरियर' होने का मतलब समझ आया। नाम था मैरी मैलन लेकिन दुनिया उसे आज भी 'टाइफाइड मैरी' के नाम से जानती है।

टाइफाइड मैरी। AI एडिटेड इमेज। Photo Credit: Mary_Mallon/Wikipedia
आयरलैंड में 1869 में जन्मी मैरी मैलन 1884 के आसपास अमेरिका के न्यूयॉर्क पहुंची। मैरी को खाना बनाने का बहुत शौक था। जल्द ही उसने न्यूयॉर्क के बड़े-बड़े और अमीर परिवारों के घरों में कुक के रूप में काम करना शुरू कर दिया। मैरी खुद एक बात से अनजान थी कि उसके शरीर में एक ऐसा जानलेवा बैक्टीरिया पल रहा था जो खुद उसे कोई नुकसान नहीं पहुंचाता था लेकिन दूसरों की जान ले लेता था। वह बैक्टीरिया सालमोनेला टाइफी था जो टाइफाइड की बीमारी फैलाता है।
साल 1906 की बात है। न्यूयॉर्क के एक अमीर बैंकर चार्ल्स हेनरी वॉरेन ने समर सीजन बिताने के लिए लॉन्ग आईलैंड के ऑयस्टर बे में एक घर किराए पर लिया। उन्होंने अपने परिवार के लिए खाना पकाने की जिम्मेदारी मैरी मैलन को सौंपी। सब कुछ ठीक चल रहा था लेकिन अचानक 27 अगस्त से 3 सितंबर के बीच उस घर में मौजूद 11 में से 6 लोग गंभीर रूप से बीमार हो गए। उन्हें तेज बुखार था, जिसे टाइफाइड कहा जाता हैं।
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उस जमाने में टाइफाइड एक खौफनाक बीमारी मानी जाती थी, जिससे 10% मरीजों की मौत हो जाती थी। सबसे अजीब बात यह थी कि टाइफाइड ज्यादातर गंदी बस्तियों में रहने वाले गरीबों को होता था, फिर इतने साफ-सुथरे अमीर परिवार में यह बीमारी कैसे पहुंची? हेनरी वॉरेन ने इसको सुलझाने के लिए जॉर्ज सोबर नाम के एक सेनेटरी इंजीनियर को जांच का जिम्मा सौंपा।
इतिहास का पहला 'हेल्दी कैरियर'
जॉर्ज सोबर ने 15 जून 1907 को अपनी रिपोर्ट 'JAMA' (जर्नल ऑफ द अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन) में प्रकाशित की। शुरुआत में सोबर को लगा कि शायद समुद्र से मिलने वाली मछलियां या सीप इस बीमारी की वजह हैं। जल्द ही उन्हें समझ आ गया कि सीप वजह नहीं थे क्योंकि बीमार हुए सभी लोगों ने सीप नहीं खाए थे।
फिर सोबर का ध्यान मैरी मैलन पर गया। जब सोबर ने मैरी के पिछले रिकॉर्ड्स की छानबीन की तो पता चला कि इससे पहले वह 8 घरों में कुक का काम कर चुकी थीं। उनमें से 7 परिवारों के लोग टाइफाइड का शिकार हुए थे! कुल मिलाकर 22 लोग बीमार पड़े थे और कुछ की मौत भी हो चुकी थी।
सोबर समझ गए कि मैरी खुद बीमार नहीं दिखती लेकिन उसके शरीर के अंदर टाइफाइड का बैक्टीरिया मौजूद है जो उसके हाथों और बनाए गए खाने के जरिए दूसरों में फैल रहा है। अमेरिका के इतिहास में सोबर ने पहली बार एक 'हेल्दी कैरियर' की पहचान की थी।
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हिरासत और पहला क्वारंटाइन
मार्च 1907 में सोबर ने मैरी का पीछा किया कि वह टेस्ट के लिए अपना सैंपल दें। लेकिन शुरुआत में उन्होंने यह कहकर साफ इनकार कर दिया कि वह पूरी तरह से स्वस्थ हैं और वह सैंपल नहीं देंगी। उन्होंने वहां से अपना काम छोड़ दिया। बाद में पुलिस की मदद से उन्हें हिरासत में लेकर जबरन उनके सैंपल लिए गए। रिपोर्ट पॉजिटिव आई। मैरी के स्टूल में सालमोनेला टाइफी के अनगिनत बैक्टीरिया पाए गए। न्यूयॉर्क शहर में उस साल करीब 3,000 लोग टाइफाइड से पीड़ित थे जिसका बड़ा कारण मैरी को माना गया।
चूंकि उस समय न तो टाइफाइड का टीका बना था और न ही कोई एंटीबायोटिक दवा, इसलिए प्रशासन के पास मैरी को अलग करने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। मैरी को न्यूयॉर्क के 'नॉर्थ ब्रदर आईलैंड' के 'रिवर्स-साइड अस्पताल' में एक अलग कॉटेज में क्वारंटाइन कर दिया गया।
हेल्दी कैरियर का मतलब कैसे पता चला?
1909 में मैरी ने स्वास्थ्य विभाग के खिलाफ कोर्ट में मुकदमा कर दिया। दो साल के क्वारंटाइन के दौरान उसके 163 में से 120 सैंपल पॉजिटिव आए थे। डॉक्टरों ने उसे कभी प्यार से यह नहीं समझाया कि 'कैरियर' होने का क्या मतलब होता है। उन्होंने मैरी को गॉल बलैडर की सर्जरी कराने की सलाह दी। इससे बैक्टीरिया खत्म हो सकते थे लेकिन मैरी ने इसके लिए साफ मना कर दिया। उसे कई दवाएं दी गईं लेकिन कोई असर नहीं हुआ। 1910 में स्वास्थ्य विभाग के नए कमिश्नर ने मैरी को एक शर्त पर रिहा कर दिया कि वह अब कभी किसी के घर में खाना नहीं बनाएगी। लेकिन मैरी ने इस शर्त को नहीं माना। बाहर निकलते ही वह फिर से गायब हो गई और अपना नाम बदलकर 'मैरी ब्राउन' रख लिया।
'टाइफाइड मैरी' की वापसी
मैरी मैनहट्टन के 'स्लोएन मैटरनिटी हॉस्पिटल' में कुक के तौर पर काम करने लगी। महज तीन महीनों के अंदर उसने अस्पताल के डॉक्टरों, नर्सों और स्टाफ समेत कम से कम 25 लोगों को संक्रमित कर दिया। इनमें से 2 लोगों की मौत हो गई। अब तक न्यूज पेपर और मैगेजिन में मैरी को 'टाइफाइड मैरी' का नाम दे दिया गया था। जब पुलिस को दोबारा उसका पता चला तो उसे फिर से गिरफ्तार कर लिया गया और वापस नॉर्थ ब्रदर आईलैंड भेज दिया गया। इस बार उनकी गिरफ्तारी हमेशा के लिए थी।
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1938 में मैरी मैलन की मौत
मैरी ने अपनी जिंदगी के कुल 26 साल उस सुनसान टापू पर अकेले बिताए। 1932 में एक डिलीवरी करने वाले ने मैरी को उसके बंगले के फर्श पर पड़ा देखा। उसे लकवा मार गया था। उसके बाद के आखिरी 6 साल वह अस्पताल के बिस्तर पर ही पड़ी रही। नवंबर 1938 में मैरी मैलन की मौत हो गई। उसकी मौत के बाद उसके शरीर का पोस्टमार्टम किया गया, जिससे पता चला कि उसके गॉल ब्लैडर की पथरी में टाइफाइड के बैक्टीरिया जिंदा थे।
हालांकि कुछ का मानना है कि नैतिक विवादों से बचने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने पोस्टमार्टम की बात की अफवाह फैलाई थी और असल में कोई पोस्टमार्टम हुआ ही नहीं था। मैरी के जाने के बाद न्यूयॉर्क के अधिकारियों ने लगभग 400 से अधिक अन्य 'हेल्दी कैरियर' की पहचान की लेकिन उनमें से किसी को भी मैरी की तरह जबरन कैद नहीं किया गया। व्यक्तिगत आजादी और पब्लिक हेल्थ के बीच की जंग में मैरी मैलन एक मोहरा बनकर रह गई। जो महिला सिर्फ एक अच्छी कुक बनकर रहना चाहती थी, जिद्दी कानून और उसकी अपनी नासमझी ने उसे इतिहास के पन्नों में 'टाइफाइड मैरी' के नाम से हमेशा के लिए मशहूर कर दिया।
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