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बढ़ती गर्मी तय कर रही कि बेटी होगा या बेटा, रिसर्च में किया गया बड़ा दावा

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक नई रिसर्च के अनुसार, 20 डिग्री से ज्यादा तापमान होने पर लड़कों के जन्म की दर में कमी देखी गई है, जो भविष्य में जनसंख्या के संतुलन को बिगाड़ सकता है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर, AI Sora

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पहले हमें लगता था कि बढ़ता तापमान केवल खेती या ग्लेशियरों के लिए खतरा है लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया की एक बड़ी आबादी में जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या पर भी इसका असर पड़ रहा  है। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की हालिया रिसर्च में कई ऐसे दावे किए गए हैं जिसमें यह बात सामने आई है कि ज्यादा गर्मी का सीधा असर इस बात पर पड़ रहा है कि कितने लड़के और कितनी लड़कियां जन्म ले रही हैं।

 

यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड ने भारत और अफ्रीका के 33 देशों में हुए करीब 50 लाख जन्मों के डेटा का बारीकी से अध्ययन किया। इस रिसर्च के नतीजे बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन का असर अब महिलाओं के गर्भाशय तक पहुंच गया है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिंगानुपात को प्रभावित कर सकता है।

 

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क्यों कम हो रहे हैं लड़कों के जन्म?

इस हालिया रिसर्च में सबसे हैरान कर देने वाली बात सामने आई कि जब तापमान 20 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जाता है तो लड़कों के जन्म लेने की दर में गिरावट आने लगती है।

 

वैज्ञानिकों का मानना है कि ज्यादा गर्मी प्रेग्नेंट महिला के शरीर पर शारीरिक दबाव बढ़ाती है। इससे फीटस के जीवित रहने की क्षमता प्रभावित होती है, जिसका असर जन्म के समय लड़का-लड़की के अनुपात पर दिखता है।

भारत पर असर

भारत के मामले में यह प्रभाव गर्भावस्था की दूसरी तिमाही के दौरान सबसे ज्यादा देखा गया। खासकर उन महिलाओं में जो अधिक उम्र की हैं या जिनके पहले से कोई बच्चा नहीं है। ऐसी स्थिति में जब बहुत ज्यादा गर्मी पड़ती है, तो लोगों की स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच कम हो सकती है। 

 

साथ ही, लिंग चयन से जुड़ी प्रक्रियाएं भी कुछ समय के लिए कम हो सकती हैं। इस वजह से थोड़े समय के लिए लड़के-लड़कियों के अनुपात में जो असंतुलन है, वह थोड़ा कम हो सकता है।

सामाजिक और आर्थिक असमानता का खतरा

यह रिपोर्ट चेतावनी देती है कि गर्मी की मार हर किसी पर एक जैसी नहीं पड़ती। ग्रामीण इलाकों में रहने वाली महिलाएं, कम पढ़ी-लिखीं और वे परिवार जिनके पास सुख-सुविधाओं के साधन कम हैं, इस बदलाव की चपेट में सबसे ज्यादा आ रहे हैं।

 

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इसमें शामिल मुख्य शोधकर्ता,  डॉ. अब्देल घानी ने कहा

तापमान सिर्फ सेहत का मुद्दा नहीं है बल्कि यह तय कर रहा है कि कौन जन्म लेगा और कौन नहीं। यह जनसंख्या के प्राकृतिक संतुलन को हमेशा के लिए बदल सकता है।

क्या होगा भविष्य पर असर?

अगर समय रहते बढ़ती गर्मी और मां के हेल्थ पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह संकट केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहेगा। यह समाज में नई तरह की लैंगिक और सामाजिक असमानता पैदा कर सकता है। यह रिसर्च साफ करती है कि जलवायु परिवर्तन अब हमारी आने वाली पीढ़ियों की बनावट और सामाजिक स्थिरता के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है।


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