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क्या है ‘3 by 35’ पहल, जिसकी वकालत कर रहा है WHO?

दुनिया के कई देशों में हानिकारक उत्पाद आसानी से उपलब्ध हैं, जिससे मोटापा, डायबिटीज जैसी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। WHO ने एक नई पहल '3 by 35' के तहत देशों से टैक्स में बदलाव करने की अपील की है।  

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प्रतीकात्मक तस्वीर, AI Sora

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दुनिया के कई देशों में मोटापा, डायबिटीज, कैंसर और दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। इसके पीछे कई कारण हैं, जिनमें लोगों की खान-पान की आदतें और इन पर नियंत्रण से जुड़े सरकारी नियम प्रमुख हैं। कई देशों में स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह चीजों पर सख्त नियम या पर्याप्त टैक्स नहीं लगाया गया है। कम टैक्स होने के कारण ये उत्पाद सस्ते रहते हैं और लोग इनका ज्यादा इस्तेमाल करने लगते हैं। इसका सबसे अधिक असर बच्चों और युवाओं पर पड़ रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक नई रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि कमजोर टैक्स नीतियों की वजह से सेहत को नुकसान पहुंचाने वाली चीजें आसानी से मिल रही हैं। इसके परिणामस्वरूप ऐसी बीमारियों का बोझ हेल्थ सिस्टम पर लगातार बढ़ रहा है, जिन्हें समय रहते रोका जा सकता है और रोका जाना भी चाहिए।


WHO के डायरेक्टर-जनरल डॉ. टेड्रोस एडनोम घेब्रेयसस ने कहा, 'हेल्थ टैक्स बिमारियों से बचाव और बेहतर सेहत के लिए हमारे सबसे असरदार औजारों में से एक हैं। तंबाकू, स्वीट ड्रिंक्स और शराब पर टैक्स बढ़ाकर सरकारें न सिर्फ इनके सेवन को कम कर सकती हैं बल्कि जरूरी स्वास्थ्य सेवाओं के लिए संसाधन भी जुटा सकती हैं।'

 

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'3 by 35' पहल

WHO की '3 by 35' पहल एक रणनीतिक स्वास्थ्य एजेंडा है, जिसे विशेष रूप से जीवनशैली से जुड़ी बिमारियों से निपटने के लिए तैयार किया गया है। यह पहल इस विचार पर आधारित है कि यदि हानिकारक उत्पादों जैसे तंबाकू, शराब और अत्यधिक चीनी वाले डिंक्स पर टैक्स में भारी वृद्धि की जाए, तो न केवल उनकी खपत कम होगी बल्कि इससे मिलने वाले राजस्व का उपयोग सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए किया जा सकेगा।


दुनिया में फेफड़ों के कैंसर और सांस से जुड़ी कई गंभीर बीमारियों का सबसे बड़ा कारण तंबाकू है। तंबाकू पर टैक्स बढ़ाने का मुख्य उद्देश्य युवाओं और कम आय वर्ग के लोगों तक इसकी आसान पहुंच को कम करना है। इसी तरह, लीवर की बीमारियों और क्राइम को घटाने के लिए शराब पर अधिक टैक्स लगाने की बात कही गई है। इसके अलावा सोडा, एनर्जी ड्रिंक और डिब्बाबंद जूस को भी टैक्स के दायरे में लाने की सिफारिश की गई है, क्योंकि ये मोटापा और टाइप-2 डायबिटीज जैसी वैश्विक समस्याओं के लिए जिम्मेदार माने जाते हैं।

समाज पर पड़ने वाला प्रभाव

इन उत्पादों को सस्ता करने या इन पर टैक्स कम लगाने का फायदा मुख्य रूप से कंपनियों को मिल रहा है, जबकि इसकी बड़ी कीमत समाज को चुकानी पड़ रही है। WHO के अनुसार, इन चीजों के उत्पादन और बिक्री का बाजार अरबों डॉलर का है। कंपनियां तो इससे भारी मुनाफा कमा रही हैं लेकिन सरकारों को इनसे मिलने वाला हेल्थ टैक्स बहुत सीमित है। इसका नतीजा यह होता है कि समाज को लंबे समय तक बीमारियों और आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ता है।

 

रिपोर्ट में बताया गया है कि 116 देश स्वीट ड्रिंक्स पर टैक्स लगाते हैं लेकिन यह टैक्स केवल सोडा तक ही सीमित है। 100 प्रतिशत फलों का रस, दूध से बने मीठे ड्रिंक और रेडी-टू-ड्रिंक कॉफी या चाय जैसे हाई-शुगर उत्पाद अब भी टैक्स के दायरे से बाहर हैं। वहीं, 97 प्रतिशत देशों में एनर्जी ड्रिंक्स पर टैक्स तो लगाया जाता है लेकिन 2023 के बाद से इसमें किसी तरह की बढ़ोतरी नहीं हुई है। इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि 185 देशों में 1990 के बाद से इनकी खपत में लगभग 16 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

 

शराब के मामले में 167 देश टैक्स लगाते हैं, जबकि 12 देशों में शराब पूरी तरह प्रतिबंधित है। इसके बावजूद, 2022 के बाद से अधिकांश देशों में शराब या तो और सस्ती हुई है या फिर उसके दामों में कोई बदलाव नहीं किया गया है।

 

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2035 का लक्ष्य क्यों? 

WHO ने 2035 तक का समय इसलिए निर्धारित किया है ताकि देशों को अपने टैक्स ढांचे में बदलाव करने और कंपनी को नए मानकों के अनुरूप ढलने का पर्याप्त समय मिल सके। साथ ही, यह 2030 के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के अगले चरण के रूप में देखा जा रहा है। इस पहल के जरूरी फायदे:

  • उपभोग कम होने से अस्पतालों पर बीमारियों का बोझ कम होगा।
  • इन उत्पादों से मिलने वाले अतिरिक्त टैक्स का उपयोग सरकारें स्वास्थ्य बीमा और बुनियादी ढांचे के लिए कर सकती हैं।
  • बीमारियों के इलाज पर होने वाले भारी खर्च और उत्पादकता में होने वाली हानि को रोका जा सकेगा।

इस पहल को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जिसमें मजबूत शराब और तंबाकू लॉबी का विरोध और यह चिंता शामिल है कि हाई टैक्स से अवैध बाजार को बढ़ावा मिल सकता है। हालांकि 2022 के गैलप सर्वे में अधिकांश लोगों ने शराब और मीठे पेय पदार्थों पर ज्यादा टैक्स का समर्थन किया था जिसको देखते हुए WHO ने नई ‘3 बाय 35’ पहल को बढ़ावा देने के लिए देशों से अपील की है। इस मामले में WHO का मानना है कि कड़े कानूनों और इस पहल के प्रभावी तरीके से लागू करने से एक स्वस्थ वैश्विक समाज का निर्माण संभव है।


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