स्ट्रोक एक न्यूरोलॉजिकल बीमारी है जिसमें मस्तिष्क के किसी हिस्से में रक्त की आपूर्ति बाधित हो जाती या मस्तिष्क की कोई रक्तवाहिका फट जाती है। Indian Council of Medical Research-led National Stroke Registry Programme की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 14% लोग स्ट्रोक से गुजर चुके हैं जिनकी उम्र 45 साल से कम है।
2025 की एक रिपोर्ट के मुताबिक 1.5 मिलियन लोग स्ट्रोक का शिकार हो चुके हैं। हर साल 29 अक्टूबर को वर्ल्ड स्ट्रोक दिवस मनाया जाता है। इस दिन मुख्य रूप से लोगों को स्ट्रोक के बारे में जागरूक किया जाता है। इस गंभीर बीमारी के लक्षण क्या है और इससे बचने का तरीका क्या है? इसके बारे में हमने एम्स न्यूरोसाइंस सेंटर के प्रमुख डॉक्टर शैलेश बी. गायकवाड़ से बात की।
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स्ट्रोक के प्रकार
स्ट्रोक दो प्रकार का होता है-
इस्केमिक स्ट्रोक, जिसमें रक्त का थक्का मस्तिष्क की रक्तवाहिका को अवरुद्ध कर देता है, और हेमरेजिक स्ट्रोक जिसमें रक्तवाहिका फटने से मस्तिष्क में रक्तस्राव होता है।
हाई ब्लड प्रेशर स्ट्रोक का एक प्रमुख जोखिम कारक है। इसके अलावा मधुमेह, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल, हृदय की कुछ बीमारियां, विशेषकर एट्रियल फिब्रिलेशन, धूम्रपान, अत्यधिक शराब का सेवन, मोटापा, शारीरिक निष्क्रियता और खराब खानपान भी स्ट्रोक का जोखिम बढ़ाते हैं। उम्र बढ़ने के साथ जोखिम बढ़ता है लेकिन स्ट्रोक किसी भी उम्र में हो सकता है। अच्छी बात यह है कि नियमित स्वास्थ्य जांच और जोखिम कारकों पर नियंत्रण से कई मामलों में स्ट्रोक का खतरा कम किया जा सकता है।
स्ट्रोक की पहचान कैसे करें?
स्ट्रोक की पहचान के लिए FAST का सिद्धांत याद रखना उपयोगी है।
- F – Face (चेहरा): क्या मुस्कुराने पर चेहरे का एक हिस्सा टेढ़ा दिखाई देता है?
- A – Arm (बांह): क्या एक हाथ या पैर में अचानक कमजोरी या सुन्नपन आ गया है?
- S – Speech (बोलना): क्या बोलने में लड़खड़ाहट, शब्द समझने या बोलने में परेशानी हो रही है?
- T – Time (समय): इनमें से कोई भी लक्षण दिखे तो तुरंत एम्बुलेंस बुलाएं और मरीज को स्ट्रोक के इलाज की सुविधा वाले अस्पताल पहुंचाएं।
इसके अलावा अचानक दृष्टि कम होना या धुंधला दिखना, संतुलन बिगड़ना, चलने में परेशानी अथवा बिना किसी स्पष्ट कारण के अत्यंत तेज सिरदर्द भी स्ट्रोक के संकेत हो सकते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लक्षण शुरू होने का समय नोट करें। लक्षण कुछ मिनटों में ठीक हो जाएं, तब भी इसे नजरअंदाज न करें, क्योंकि यह ट्रांजिएंट इस्केमिक अटैक (TIA) हो सकता है, जो भविष्य में बड़े स्ट्रोक का चेतावनी संकेत है। मरीज को स्वयं गाड़ी चलाकर अस्पताल नहीं जाना चाहिए और न ही अपने स्तर पर एस्पिरिन या कोई अन्य दवा देनी चाहिए, क्योंकि स्ट्रोक रक्तस्राव के कारण भी हो सकता है।
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स्ट्रोक का इलाज और बचाव क्या है?
- स्ट्रोक के इलाज में सबसे महत्वपूर्ण है- समय पर सही अस्पताल पहुंचना। हर मिनट में मस्तिष्क की लाखों तंत्रिका कोशिकाएं नष्ट हो सकती हैं, इसलिए स्ट्रोक को मेडिकल इमरजेंसी मानना चाहिए।
- अस्पताल में तत्काल मस्तिष्क की CT या MRI जांच और आवश्यक रक्तवाहिका संबंधी जांच की जाती है, ताकि यह पता चल सके कि स्ट्रोक रक्तवाहिका में रुकावट के कारण हुआ है या रक्तस्राव के कारण। दोनों स्थितियों का इलाज अलग-अलग होता है।
- इस्केमिक स्ट्रोक के चुनिंदा मरीजों को निर्धारित समय-सीमा और चिकित्सकीय मानदंडों के अनुसार नस के जरिए थक्का घोलने वाली दवा दी जा सकती है। उपयुक्त मरीजों में यह उपचार सामान्यतः लक्षण शुरू होने के साढ़े चार घंटे के भीतर दिया जाता है। कुछ मरीजों में उन्नत इमेजिंग के आधार पर इसका लाभ इस अवधि के बाद भी संभव हो सकता है। बड़ी मस्तिष्क रक्तवाहिका में थक्का होने पर मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टॉमी नामक प्रक्रिया से कैथेटर के जरिए थक्का निकाला जा सकता है। चयनित मरीजों में यह प्रक्रिया 24 घंटे तक लाभकारी हो सकती है।
- अगर स्ट्रोक रक्तस्राव के कारण हुआ है, तो इलाज में रक्तचाप नियंत्रण, रक्तस्राव के कारण का उपचार और जरूरत पड़ने पर न्यूरोसर्जरी शामिल हो सकती है। इसके बाद फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी और पुनर्वास मरीज की कार्यक्षमता वापस पाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- बचाव के लिए रक्तचाप, मधुमेह और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखना, धूम्रपान छोड़ना, नियमित व्यायाम करना, संतुलित आहार लेना, पर्याप्त नींद लेना और हृदय संबंधी बीमारियों का उचित उपचार कराना जरूरी है। जिन लोगों को पहले स्ट्रोक या TIA हो चुका है, उनके लिए डॉक्टर की सलाह के अनुसार दोबारा स्ट्रोक से बचाव की दवाएं और नियमित फॉलो-अप विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।