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जब से पकड़ा तब से शुरू होती है 24 घंटे में पेश करने की समय सीमा: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने 3 अलग-अलग हाई कोर्ट के फैसलों को खारिज करते हुए कहा है कि किसी भी शख्स को हिरासत में लिए जाते ही 24 घंटे में उसे पेश करने की डेडलाइन शुरू हो जाती है।

सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट, Photo Credit-ANI

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भारत का कानून कहता है किसी भी शख्स को हिरासत में लिए जाने या फिर गिरफ्तार किए जाने के 24 घंटे के अंदर कोर्ट में पेश करना अनिवार्य है। कई बार इस 24 घंटे की समय सीमा को लेकर बहस होती है। यह भी देखा जाता है कि पुलिस पहले हिरासत में लेकर कई घंटे की पूछताछ करती है और फिर गिरफ्तार करती है। ऐसे मामलों में पुलिस गिरफ्तार के समय से 24 घंटे गिनती है। अब सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि किसी भी शख्स को हिरासत में लेते ही 24 घंटे की यह समय सीमा शुरू हो जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि गिरफ्तारी से पहले पूछताछ, जांच या तलाशी में लगे समय को 24 घंटे से अलग नहीं गिना जा सकता है।   


सुजीत दास बनाम भारत सरकार केस की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ये अहम बातें कहीं है। इस केस की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां औऱ जस्टिस अतुल एस चांदुरकर ने की। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि अगर किसी भी शख्स को 24 घंटे के अंदर कोर्ट में पेश नहीं किया जाता है तो उसे कस्टडी से रिहा करना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इसमें सिर्फ उस समय को नहीं गिना जाएगा जो एक जगह से दूसरी जगह जाने में लगेगा। उदाहरण के लिए अगर किसी को एक शहर से दूसरे शहर ले जाने में 3 घंटे लगते हैं तो 24 घंटे का यही समय 27 घंटे हो सकता है।

पूछताछ, जांच और तलाशी में लगा समय भी 24 घंटे के अंदर ही होगा

सुप्रीम कोर्ट की इस बेंच ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(2) के उद्देश्य से 'गिरफ्तारी' और 'हिरासत' के बीच आर्टिफिशियल तरीके से अंतर नहीं किया जा सकता। बेंच ने कहा कि ऐसी कोई भी व्याख्या संवैधानिक आदेश के विपरीत होगी, जिसके तहत पुलिस को औपचारिक गिरफ्तारी से पहले हिरासत में बिताई गई अवधि को 24 घंटे की समय सीमा से बाहर रखने की अनुमति मिले। बेंच ने आगे कहा, ‘यह विचार कि 24 घंटे की अवधि केवल औपचारिक गिरफ्तारी से शुरू होती है, संविधान के अनुच्छेद 22(2) और भारतीय न्याय सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 56 के संवैधानिक आदेश के खिलाफ है।'

 

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इस फैसले में कहा गया है कि 24 घंटे की समय सीमा की गणना करते समय केवल गिरफ्तारी के स्थान से मजिस्ट्रेट की अदालत तक पहुंचने में लगने वाले समय को ही इसमें शामिल नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि औपचारिक गिरफ्तारी से पहले पूछताछ, जांच, तलाशी या जब्ती में लगा समय इस अवधि से बाहर नहीं रखा जा सकता। यानी इन चीजों में लगा समय भी 24 घंटे के अंदर ही गिना जाना चाहिए।

3 हाई कोर्ट के विचार हुए खारिज

बता दें कि संविधान का अनुच्छेद 22(2) कहता है कि गिरफ्तार और हिरासत में रखे गए हर व्यक्ति को गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना चाहिए। इसमें गिरफ्तारी के स्थान से अदालत तक पहुंचने में लगने वाला आवश्यक समय शामिल नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा हाई कोर्ट के आर्यमन पटनायक केस, मद्रास हाई कोर्ट के कन्नन केस और केरल हाई कोर्ट के अरुण के. थॉमस केस में दिए गए विचारों को खारिज कर दिया। इन मामलों में औपचारिक गिरफ्तारी से पहले हिरासत में बिताई गई अवधि को 24 घंटे की समय सीमा की गणना से बाहर रखने की अनुमति दी गई थी।

 

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सुप्रीम कोर्ट के साफ कहा है कि समय सीमा की गणना करते समय गिरफ्तारी के स्थान से मजिस्ट्रेट की अदालत तक पहुंचने में लगने वाले आवश्यक समय के अलावा किसी अन्य अवधि को बाहर नहीं रखा जा सकता। इस बेंच ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति को 24 घंटे की अवधि से ज्यादा समय तक हिरासत में रखा जाता है और उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया जाता, तो उसे तत्काल रिहा किया जाना चाहिए।

 

बेंच ने कहा कि हिरासत में लेने वाले प्राधिकारी को यह सुनिश्चित करना होगा कि संवैधानिक रूप से निर्धारित 24 घंटे की सीमा के भीतर भी किसी व्यक्ति को उचित अवधि से अधिक समय तक हिरासत में न रखा जाए। इस फैसले में कहा गया कि न्यायिक मजिस्ट्रेट को हिरासत में लिए जाने की वास्तविक तारीख और समय दर्ज करना होगा और संवैधानिक समय सीमा का पालन हुआ है या नहीं, इसकी स्वतंत्र रूप से जांच करनी होगी। बेंच ने कहा कि मजिस्ट्रेट को यह भी देखना होगा कि परिस्थितियों के अनुसार हिरासत की अवधि उचित है या नहीं। अगर हिरासत की अवधि जरूरत से ज्यादा है, तो वे रिमांड देने से इनकार कर सकते हैं

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