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स्कूल में टीचर की पिटाई से एक और बच्चे की मौत, क्या हैं नियम और कहां हो रही चूक?

आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में एक स्कूली बच्चे की कथित तौर पर पिटाई के बाद मौत हो गई है। इस घटना की एक सीसीटीवी फुटेज सामने आने के बाद सवाल उठने लगे हैं कि क्या टीचर बच्चों की पिटाई कर सकता है।

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टीचर ने छात्र को पीटा, Photo Credit: Social Media

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आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में 20 अगस्त 2026 को एक हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, 6 साल के एक बच्चे को होमवर्क पूरा ना करने के कारण स्कूल में टीचर ने पिटा था। इस प्रताड़ना के बाद बच्चे की मौत हो गई। कक्षा में लगे सीसीटीवी फुटेज में सामने आया कि टीचर ने बच्चे को होमवर्क न करने पर डांटा, थप्पड़ मारा और उसे प्रताड़ित किया, जिसके बाद बच्चा अचानक टीचर की गोद में गिर गया। इस घटना के बाद लोगों में काफी ज्यादा गुस्सा है। 

 

सोशल मीडिया पर इस घटना की सीसीटीवी वीडियो भी सामने आई है। वीडियो में साफ दिखाई दे रहा है कि बच्चा लाइन में होमवर्क दिखाने के लिए लगा हुआ है और वह काफी डरा हुआ है। इसके बाद टीचर ने रोते हुए बच्चे के कपड़े उतारने की कोशिश की और थप्पड़ मारा। इसके बाद बच्चे बेहोश होकर टीचर की गोद में जा गिरा। इसके तुरंत बाद बच्चे को अस्पताल ले जाया गया जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। 

 

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बच्चों की पिटाई को लेकर क्या हैं नियम?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या टीचर को बच्चे को अनुशासन सिखाने के लिए मारने का अधिकार है? इसको लेकर एक बार फिर सोशल मीडिया पर बहस शुरू हो गई है। कानूनी तौर पर स्कूल में बच्चों की पिटाई पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाया गया है।

 

राइट टू एजुकेशन यानी RTE एक्ट की धारा 17 में स्पष्ट कहा गया है कि किसी बच्चे को शारीरिक दंड या मानसिक प्रताड़ना नहीं दी जा सकती। इसका उल्लंघन करने वाले व्यक्ति के खिलाफ सेवा नियमों के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान है। यानी बच्चे को थप्पड़ मारना, डंडे से पीटना, कान खींचना, मुर्गा बनाना या अपमानित करना स्कूल का अनुशासन नहीं माना जा सकता। शिक्षक के पास बच्चे को समझाने और उसका व्यवहार सुधारने के कई तरीके हैं, लेकिन हिंसा उनमें शामिल नहीं है।

NCPCR गाइडलाइंस 

NCPCR यानी नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स ने बच्चों को लेकर कई गाइडलाइंस जारी की है। NCPCR ने  स्कूलों में बच्चों की शारीरिक और मानसिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए मानक तय किए गए हैं। गाइडलाइंस के अनुसार, बच्चे के खिलाफ उठाया गया कोई भी कदम जिससे उसे दर्द या तकलीफ हो, फिजिकल पनिशमेंट माना जाएगा। 

 

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फिर चूक कहां हो रही है?

स्कूलों में छात्रों को मानसिक और शारिरीक रूप से प्रताड़ित करने पर पूरी तरह से बैन लगा हुआ है। कोई भी टीचर बच्चे को काम ना करने या अनुशासन भंग करने के नाम पर पिट नहीं सकता है। हालांकि, आज भी समय-समय पर इस तरह की रिपोर्ट्स सामने आती हैं जहां बच्चों को पीटा जाता है। नियमों के अनुसार, हर स्कूल में बच्चों की शिकायत सुनने का मैकेनिज्म और प्रोटोकॉल्स डेवलप करना होगा। स्कूल में जगह-जगह ड्राप बॉक्स लगाए जाएं ताकि बच्चे अपनी शिकायतें, बिना पहचान उजागर किए डाल सकें लेकिन इस पर ज्यादातर स्कूलों में काम नहीं हो सका है। 

 

इसके साथ ही हर स्कूल गको टीचर्स, पेरेंट्स, डॉक्टर, वकील, काउंसलर चाइल्ड राइट एक्टिविस्ट और स्टूडेंट्स के साथ मिलकर एक कमेटी बनानी होती है जो स्कूल में बच्चों को दी गई पनिशमेंट की जांच करती है लेकिन ऐसा ज्यादातर स्कूलों में नहीं है। ऐसे में बच्चों के साथ आज भी अन्याय हो रहा है। 

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