ग्लोबल वार्मिंग का असर अब केवल बाहर के मौसम, खेती या पानी की कमी तक सीमित नहीं है। बढ़ती गर्मी महिलाओं के लिए भी एक नया खतरा बन रही है। इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एप्लाइड सिस्टम्स एनालिसिस (IIASA) की रिसर्च में ऑस्ट्रिया, न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका के वैज्ञानिकों ने यह दावा किया है कि असामान्य तरीके से बढ़ता तापमान महिलाओं के खिलाफ होने वाली घरेलू हिंसा को बढ़ा सकता है।
इस रिसर्च में कुछ साल तक करीब 31 देशों की महिलाओं को जोड़ा गया था। रिपोर्ट के मुताबिक, बढ़ती गर्मी और पार्टनर के साथ हिंसा में सीधा संबंध देखा गया है, खासकर भावनात्मक और शारीरिक हिंसा के मामलों में।
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'गर्मी तनाव को बढ़ाती है'
रिसर्च में कहा गया है कि गर्मी सीधे तौर पर हिंसा की वजह नहीं बनती। इसका मतलब है कि अगर किसी रिश्ते में पहले से ही तनाव है तो अधिक गर्मी से यह और बढ़ जाता है। यही बढ़ा हुआ तनाव आगे चलकर हिंसा का रूप ले लेता है। इसलिए एक्सपर्ट्स जलवायु परिवर्तन को हिंसा का मुख्य कारण मानने के बजाय इसे तनाव बढ़ाने वाले एक रिस्क फैक्टर के रूप में देख रहे हैं।
किन महिलाओं पर ज्यादा असर?
रिसर्च से यह बात सामने आई है कि बढ़ती गर्मी का असर सभी महिलाओं पर एक जैसा नहीं पड़ता। गांव और कम पढ़ी-लिखी महिलाओं में इसका असर ज्यादा देखा गया। इसकी बड़ी वजह यह है कि इन महिलाओं के पास ऐसे माहौल से बाहर निकलने के लिए आर्थिक मदद, सामाजिक सहारा या अन्य रास्ते बहुत सीमित होते हैं।
रिसर्च में यह भी कहा गया है कि पति और पत्नी अगर दोनों पढ़े-लिखे होते हैं और आर्थिक स्थिति बेहतर होती है तो हिंसा का खतरा कम हो जाता है। पार्टनर का बार-बार शराब पीना हिंसा की सबसे बड़ी वजहों में से एक माना गया। महिलाओं की बढ़ती आजादी भी हिंसा का एक बहुत बड़ा कारण है।
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समाधान क्या है?
इसमें भविष्य के हालात का अंदाजा लगाते हुए कहा है कि अगर महिलाओं की शिक्षा और विकास पर ध्यान दिया गया तो हिंसा से प्रभावित महिलाओं के प्रतिशत में कमी आ सकती है। इससे निपटने के लिए महिलाओं की सुरक्षा को शामिल करना बेहद जरूरी है। इसके लिए महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। साथ ही महिलाओं को खुद से फैसले लेने और कमाई करने के ज्यादा मौके दिए जाने चाहिए।
हमें यह समझने की जरूरत है कि अगर महिलाओं की स्थिति में सुधार करना है तो लगातार इस ओर काम करने की जरूरत है। बढ़ती आबादी के कारण ऐसी महिलाओं की कुल संख्या फिर भी बढ़ सकती है जिन्हें मदद की जरूरत पड़ सकती है। इस लिहाज से सरकारों और संगठनों को एक साथ मिलकर नीति बना कर काम करने की आवश्यकता है।