पढ़े लिखे लोग भी कैसे हो जाते हैं डिजिटल अरेस्ट के शिकार? डर का मनोविज्ञान समझिए
भारत में तेजी से डिजिटल अरेस्ट स्कैम के मामले बढ़ रहे हैं। आइए समझते हैं डिजिटल अरेस्ट क्या है और इससे बचने के लिए आपको क्या करना चाहिए।

प्रतीकात्मक तस्वीर, Photo Credit: ChatGpt
भारत में साइबर ठगी के नए तरीकों में 'डिजिटल अरेस्ट' सबसे खतरनाक और तेजी से फैलने वाला अपराध बनकर उभरा है। इस ठगी में अपराधी खुद को पुलिस, केंद्रीय जांच एजेंसियों या सरकारी अधिकारियों के रूप में पेश करते हैं। लोगों को यह विश्वास दिलाते हैं कि उनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामला दर्ज हो चुका है। गिरफ्तारी के डर और कानूनी कार्रवाई की धमकी के बीच पीड़ितों को लंबे समय तक फोन या वीडियो कॉल पर 'डिजिटल हिरासत' में रखा जाता है और उनसे बड़ी रकम ट्रांसफर करवाई जाती है।
भारतीय कानून में डिजिटल अरेस्ट जैसी कोई कानूनी प्रक्रिया मौजूद ही नहीं है। न पुलिस और न ही कोई जांच एजेंसी किसी व्यक्ति को फोन या वीडियो कॉल के माध्यम से गिरफ्तार या हिरासत में रख सकती है। लेकिन इस स्कैम की ताकत कानून में नहीं, बल्कि उस भय में है जिसे अपराधी बेहद योजनाबद्ध तरीके से पैदा करते हैं।
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कैसे काम करता है डिजिटल अरेस्ट स्कैम
इस प्रकार की ठगी में अपराधी सबसे पहले पीड़ित को फोन कॉल करते हैं। खुद को पुलिस अधिकारी, सीबीआई अधिकारी, प्रवर्तन निदेशालय (ED) या किसी अन्य सरकारी एजेंसी का प्रतिनिधि बताते हैं। बातचीत की शुरुआत अक्सर किसी गंभीर आरोप से होती है जैसे मनी लॉन्ड्रिंग, ड्रग्स तस्करी, अवैध पार्सल, या अश्लील वीडियो से जुड़ा मामला। इसके बाद पीड़ित को बताया जाता है कि उनके आधार नंबर, बैंक खाते या किसी पार्सल का नाम किसी आपराधिक जांच में सामने आया है। कई मामलों में ठग नकली केस नंबर, गिरफ्तारी वारंट या अदालत के दस्तावेज भी भेजते हैं। ये दस्तावेज इतने वास्तविक लगते हैं कि आम व्यक्ति के लिए असली और नकली में फर्क करना मुश्किल हो जाता है।
एक बार जब पीड़ित डर के दबाव में आ जाता है, तो उसे लगातार वीडियो कॉल पर बने रहने के लिए कहा जाता है। उसे बताया जाता है कि वह 'डिजिटल निगरानी' में है। अगर उसने कॉल काटी या किसी से बात की तो उसे तुरंत गिरफ्तार कर लिया जाएगा। इस दौरान उसे घर से बाहर न निकलने और किसी से संपर्क न करने के निर्देश दिए जाते हैं। अंत में उससे कहा जाता है कि मामला सुलझाने या नाम क्लियर कराने के लिए कुछ रकम सरकारी खाते में ट्रांसफर करनी होगी।
बुजुर्गों से करोड़ों की ठगी के मामले
डिजिटल अरेस्ट स्कैम के कई मामलों में बुजुर्ग नागरिक सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। गुजरात के कच्छ में एक 85 और 83 वर्ष के दंपती से लगभग 1.07 करोड़ रुपये की ठगी की गई। अपराधियों ने उन्हें मनी लॉन्ड्रिंग मामले में फंसाने का डर दिखाया और लगभग एक महीने तक लगातार वीडियो कॉल पर नजरबंद रखा। इस दौरान व्हाट्सऐप पर नकली अदालत के आदेश और गिरफ्तारी वारंट भी भेजे गए।
दिल्ली में एक और मामले में 81 और 77 साल के दंपती से लगभग 15 करोड़ रुपये की ठगी की गई है। ठगों ने खुद को पुलिस अधिकारी बताया और दंपती पर अश्लील वीडियो फैलाने और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप लगाए। उन्हें बताया गया कि उनके खिलाफ अरेस्ट वारंट जारी हो चुका है और जांच पूरी होने तक उन्हें वीडियो कॉल पर निगरानी में रहना होगा। इस मामले में ठगों ने एक नकली वर्चुअल सुप्रीम कोर्ट सुनवाई भी आयोजित की, जिसमें एक व्यक्ति जज की भूमिका में और अन्य लोग अभियोजक तथा वकील बनकर शामिल हुए। इस पूरी नाटकीय व्यवस्था ने पीड़ितों को पूरी तरह भ्रमित कर दिया है।
बढ़ते मामले और चौंकाने वाले आंकड़े
डिजिटल अरेस्ट स्कैम के मामले पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़े हैं। गृह मंत्रालय के अनुसार राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर 2022 में लगभग 39,925 मामले दर्ज हुए थे। जिनमें करीब 91 करोड़ रुपये की ठगी हुई थी। 2024 तक यह संख्या बढ़कर 1,23,672 मामलों तक पहुंच गई थी। ठगी की रकम 1,935 करोड़ रुपये से अधिक हो गई।
दिल्ली में भी इस प्रकार के मामलों में लगातार वृद्धि देखी गई है। साइबर अपराध विशेषज्ञों के अनुसार जागरूकता बढ़ने के बावजूद अपराधी लगातार नई तकनीकों और तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं।
डर और मनोविज्ञान का खेल
साइबर कानून विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्कैम की सफलता का सबसे बड़ा कारण मनोवैज्ञानिक दबाव है। जैसे ही कोई व्यक्ति पुलिस या केंद्रीय एजेंसी का नाम सुनता है, उसके मन में डर और घबराहट पैदा हो जाती है। अपराधी इसी मनोविज्ञान का फायदा उठाते हैं। वे लगातार पीड़ित को यह विश्वास दिलाते रहते हैं कि मामला बेहद गंभीर है और अगर तुरंत सहयोग नहीं किया गया तो गिरफ्तारी, संपत्ति जब्ती या बदनामी हो सकती है।
साइबर मनोवैज्ञानिकों के अनुसार इस स्कैम के तीन मुख्य तत्व होते हैं अधिकार (authority), अलगाव (isolation) और भय (fear)। जब पीड़ित को परिवार या दोस्तों से बात करने से रोका जाता है तो वह पूरी तरह अपराधियों के नियंत्रण में आ जाता है।
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जांच एजेंसियों के सामने चुनौतियां
डिजिटल अरेस्ट स्कैम की जांच करना भी आसान नहीं है। अक्सर कॉल विदेशों से किए जाते हैं, लेकिन तकनीकी तरीकों से उन्हें भारतीय मोबाइल नंबर की तरह दिखाया जाता है। इसके लिए SIM बॉक्स जैसी तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय कॉल भारतीय नंबर की तरह दिखाई देती है। ठगी की रकम कई बैंक खातों के जरिए तेजी से ट्रांसफर की जाती है। ये खाते अक्सर म्यूल अकाउंट होते हैं, जो ऐसे लोगों के नाम पर खोले जाते हैं जिन्हें पता भी नहीं होता कि उनके दस्तावेजों का इस्तेमाल अपराध में किया जा रहा है। कई मामलों में पैसा अलग-अलग राज्यों में निकाला जाता है जबकि अपराधी किसी दूसरे देश में बैठे होते हैं, जिससे जांच और भी जटिल हो जाती है।
AI और डीपफेक का बढ़ता खतरा
साइबर अपराध में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस्तेमाल ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। अब अपराधी वीडियो कॉल पर नकली चेहरे, डीपफेक तकनीक और AI-जनरेटेड आवाजों का इस्तेमाल कर सकते हैं। AI की मदद से नकली सरकारी दस्तावेज, अदालत के आदेश और कानूनी भाषा में लिखे नोटिस तैयार किए जा रहे हैं, जो इतने वास्तविक लगते हैं कि आम नागरिक के लिए उनकी सत्यता पर सवाल उठाना मुश्किल हो जाता है।
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कानून और व्यवस्था की चुनौतियां
विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा कानून इन नई तकनीकों से होने वाले साइबर अपराधों से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। कई मामलों में अपराधियों पर सिर्फ धोखाधड़ी या जालसाजी के सामान्य प्रावधान लगाए जाते हैं। बैंकिंग सिस्टम में भी कई खामियां सामने आई हैं। अक्सर बैंक यह कहकर जिम्मेदारी से बच जाते हैं कि पैसा ग्राहक ने खुद ट्रांसफर किया था। विशेषज्ञों का सुझाव है कि बड़ी रकम के लेन-देन पर कुछ समय की देरी या एडिशनल वेरिफिकेशन जैसी व्यवस्थाएं लागू की जानी चाहिए।
कैसे बचें इस तरह की ठगी से
- कोई भी पुलिस या जांच एजेंसी फोन या वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी नहीं करती।
- डराने वाली कॉल आने पर तुरंत फोन काटें और स्थानीय पुलिस या साइबर हेल्पलाइन से संपर्क करें।
- किसी भी अनजान व्यक्ति के कहने पर बैंक ट्रांसफर न करें।
- संदिग्ध मामलों की शिकायत राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन 1930 या cybercrime.gov.in पर करें।
- डर से बाहर निकलना ही सबसे बड़ा बचाव
डर से बाहर निकलना ही सबसे बड़ा बचाव
डिजिटल अरेस्ट स्कैम यह दिखाता है कि आधुनिक साइबर अपराध सिर्फ तकनीक का खेल नहीं है। ह्यूमन फिजियोलॉजी को समझकर रचा गया जाल है। अपराधी जानते हैं कि डर और अधिकार का भ्रम पैदा करके वे किसी भी व्यक्ति को डरा सकते है। ऐसे में सबसे प्रभावी बचाव है घबराहट में तुरंत प्रतिक्रिया न देना, थोड़ा ठहरकर सोचने और जानकारी की पुष्टि करने की आदत डालना।
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