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ग्रीन एनर्जी का साइड इफेक्ट, क्या आपकी जेब पर भारी पड़ेगा कम चलता कोयला प्लांट?

भारत में पिछले दो सालों में ग्रीन एनर्जी से बिजली उत्पादन की क्षमता बढ़ी है। इसके साथ ही कोयला पावर प्लांट का कम इस्तेमाल हुआ है। यह पर्यावरण के हिसाब से बहुत अच्छी खबर है लेकिन ऊर्जा के जानकार इसे चिंता का विषय बता रहे हैं।

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प्रतीकात्मक तस्वीर, AI Generated Image

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भारत में क्लीन एनर्जी यानी सौर और पवन उर्जा ने इस साल एक नया रिकॉर्ड बनाया है। देश में 50 साल बाद यह पहला मौका आया है जब बिजली की मांग बढ़ने के बावजूद कोयले से बनने वाली बिजली में कोई बढ़ोतरी नहीं दर्ज की गई है। पर्यावरण के लिहाज से यह एक बहुत अच्छी खबर है। इस खबर का एक दूसरा पहलू भी है जो आपकी जेब और हर महीने आने वाले बिजली के बिल से जुड़ा हुआ है। 


सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) और कार्बन ब्रीफ की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, 2024 की पहली छमाही से 2026 की पहली छमाही के बीच भारत में बिजली की मांग 7 % बढ़ी। राहत की बात यह रही कि इसी समय में क्लीन एनर्जी का उत्पादन 70 टेरावाट-घंटे बढ़ गया। यानी मांग से भी ज्यादा बिजली क्लीन एनर्जी से ग्रिड को मिली।

 

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पावर प्लांट कम चले लेकिन खर्च नहीं घटा

इस रिपोर्ट में बताया गया है कि 2024 से 2026 के बीच देश में बिजली की बढ़ती मांग को पूरी तरह से सौर और पवन ऊर्जा ने संभाला। इस दौरान 8.5 GW की क्षमता वाले नए कोयला पावर प्लांट भी स्थापित किए गए लेकिन इन आंकड़ों के बीच चिंताजनक बात यह रही कि क्लीन एनर्जी की भारी आपूर्ति के कारण इन नए और पुराने पावर प्लांट को पहले के मुकाबले काफी कम देर चलाना पड़ा। पर्यावरण के लिए तो यह अच्छी खबर है लेकिन ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों के लिए यह चिंता का विषय है। 

कैसे बढ़ता है बिजली बिल?

हमें यह समझना होगा कि कैसे ऊर्जा के उत्पादन के बावजूद लोगों के बिल पर बोझ बढ़ेगा। आम लोग यह समझते हैं कि अगर कोयला कम जलेगा तो बिजली सस्ती होनी चाहिए। भारत के बिजली मॉडल में ऐसा बिल्कुल नहीं होता। बिजली घर दो लागतों पर चलता है। 'वेरिएबल कॉस्ट' यानी कोयले का खर्च और 'फिक्स्ड कॉस्ट' यानी प्लांट बनाने का कर्ज, ब्याज, कर्मचारियों का वेतन और मेंटेनेंस। पावर प्लांट चाहे 100% चले या 20%, उसकी फिक्स्ड कॉस्ट बिल्कुल नहीं घटती। 

 

इसके बाद आता है प्रति यूनिट बिजली। जब कोई कोयला प्लांट कम क्षमता पर चलता है तो उसकी फिक्स्ड कॉस्ट उतनी ही बिजली पर बंट जाती है। इससे कोयले से बनने वाली बिजली की 'प्रति यूनिट उत्पादन लागत' महंगी हो जाती है।

आपकी राज्य की बिजली वितरण कंपनी यानी DISCOM ने कोयला प्लांट के साथ 25-25 साल का एग्रीमेंट कर रखा है। वे बिजली खरीदें या न खरीदें, उन्हें इन पावर प्लांटों को 'कैपेसिटी चार्ज' देना ही पड़ेगा। 

 

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लोगों की जेब पर असर

जाहिर सी बात है कि जब बिजली कंपनियों की लागत कोयला प्लांटों के खाली पड़े रहने के कारण बढ़ेगी तो वे इस वित्तीय घाटे को खुद बर्दाश्त नहीं करेंगी। वे राज्य बिजली नियामक आयोग (SERC) के पास जाकर आम जनता के लिए बिजली दरों में बढ़ोतरी की मांग करेंगी।

 

अगर आसान शब्दों में कहे तो 'ग्रीन एनर्जी' के कारण कोयला प्लांट कम जरूर चल रहे हैं लेकिन इन प्लांट का 'सिटिंग चार्ज' और रखरखाव का खर्च अप्रत्यक्ष रूप से आपके और हमारे बिजली बिल के जरिए ही वसूला जाएगा। 

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