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रेप-POCSO केस के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट 5 साल और चलेंगी, क्यों पड़ी जरूरत?

केंद्र सरकार ने रेप और बच्चों के साथ यौन अपराधों से जुड़े मामलों की जल्द सुनवाई के लिए बनाई गई फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSC) योजना को पांच साल और जारी रखने की मंजूरी दे दी है।

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सांकेतिक तस्वीर, Photo Credit-ChatGPT

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केंद्र सरकार ने रेप और बच्चों के साथ यौन अपराधों से जुड़े मामलों की जल्द सुनवाई के लिए बनाई गई फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSC) योजना को पांच साल और जारी रखने की मंजूरी दे दी है। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने इस योजना को वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक जारी रखने का फैसला किया है। इसके तहत देश में विशेष POCSO अदालतों सहित 850 फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट चलाने का प्रावधान है।

 

केंद्र सरकार का कहना है कि इस योजना का उद्देश्य रेप और POCSO अधिनियम के तहत दर्ज मामलों का जल्द निपटारा करना और पीड़ितों को समय पर न्याय दिलाना है। योजना के विस्तार पर कुल 3,788.04 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। इसमें केंद्र सरकार 2,353.15 करोड़ रुपये और राज्य और केंद्र शासित प्रदेश 1,434.89 करोड़ रुपये खर्च करेंगे। केंद्र की हिस्सेदारी निर्भया फंड से दी जाएगी। 

 

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क्या बताते हैं आंकड़े? 

सरकार की ओर से इस योजना को शुरू हुए करीब 7 साल हो चुके हैं। यह 2 अक्टूबर 2019 को शुरू हुई थी। 4 नवंबर 2026 को जारी कैबिनेट की जानकारी के मुताबिक, इन अदालतों ने अब तक कुल 4,02,457 मामलों का निपटारा किया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 31 दिसंबर 2025 तक इन अदालतों में रेप और POCSO से जुड़े 2,45,579 मामले लंबित थे। वहीं, योजना शुरू होने से 2025 के अंत तक इन अदालतों ने कुल 3,66,124 मामलों का निपटारा किया था। इस योजना को शुरू हुए करीब 7 साल हो चुके हैं लेकिन  बड़ी संख्या में अब भी मामले लंबित ही हैं।  

 

इस योजना के तहत फिलहाल 779 फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट काम कर रही हैं, जिनमें 399 विशेष POCSO अदालतें शामिल हैं। अब सरकार ने इनकी संख्या बढ़ाकर 850 करने का फैसला किया है। यानी कुल 71 नई अदालतें बढ़ाने का प्रावधान है। इन अदालतों का विस्तार उन जिलों में किया जाएगा, जहां रेप और POCSO मामलों की संख्या ज्यादा है। नए जिलों का चयन लंबित मामलों के आंकड़ों के आधार पर किया जाएगा।

 

इसके अलावा, फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट में मामलों की सुनवाई तेजी से हो सके, इसके लिए हर अदालत में एक न्यायिक अधिकारी, एक विशेष सरकारी वकील और छह सहायक कर्मचारी तैनात किए जाएंगे। विशेष सरकारी वकील केवल इसी अदालत के मामलों की पैरवी करेंगे। वहीं, सहायक कर्मचारियों की मदद से अदालत के प्रशासनिक कामकाज को आसान बनाने और पुराने मामलों के निपटारे में तेजी लाने की कोशिश की जाएगी।  

क्यों पड़ी जरूरत?

रेप और बच्चों के साथ यौन अपराधों के मामलों में समय पर सुनवाई और न्याय मिलना जरूरी है लेकिन पीड़ितों को लंबे समय तक न्याय का इंतजार करना पड़ रहा है। इसके कई मामले लंबित हैं। इस समस्या को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने विशेष अदालतों की व्यवस्था शुरू की थी लेकिन अब भी मामले लंबित हैं। यही वजह है कि अब इसे और 5 साल के लिए बढ़ाया जा रहा है।  

 

सरकार के इस योजना का मकसद ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए अलग अदालतें उपलब्ध कराना है, ताकि इनकी सुनवाई दूसरे मामलों के साथ लंबित न रहे और इनका जल्द निपटारा हो सके। सुप्रीम कोर्ट ने 25 जुलाई 2019 को एक आदेश दिया था। इसमें कहा गया था कि जिन जिलों में POCSO अधिनियम के तहत 100 से ज्यादा मामले लंबित हैं, वहां विशेष अदालतें बनाई जाएं। इसके बाद केंद्र सरकार ने 2 अक्टूबर 2019 को फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट योजना शुरू की थी। 

2031 तक जारी रहेगी योजना

फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट योजना शुरुआत में एक साल के लिए लागू की गई थी। बाद में इसे बढ़ाकर 31 मार्च 2026 तक कर दिया गया था। अब केंद्र सरकार ने इसे 1 अप्रैल 2026 से 31 मार्च 2031 तक जारी रखने की मंजूरी दी है। न्याय विभाग राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ मिलकर इस योजना को लागू करेगा। अदालतों के कामकाज की निगरानी FTSC डैशबोर्ड, प्रगति रिपोर्ट और खर्च से जुड़े बयानों के जरिए की जाएगी। 

 

विभाग हाईकोर्ट और राज्य सरकारों के साथ बैठकें करके योजना की समीक्षा भी करेगा। सरकार को उम्मीद है कि अगले पांच साल तक इस योजना को जारी रखने से रेप और POCSO मामलों की सुनवाई में तेजी आएगी, लंबित मामलों की संख्या घटेगी और पीड़ितों को समय पर न्याय मिल सकेगा। 

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