भारत के टैक्स अधिकारियों ने देश की तीन बड़ी इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों हायर, गोदरेज एंड बॉयस और ब्लू स्टार को एक कारण बताओ नोटिस जारी किया है। आरोप है कि इन कंपनियों ने रीसाइकलिंग किए बिना ही वेंडर के बनाए फर्जी कागजातों पर भरोसा किया। साथ ही गलत तरीके से लगभग 6 करोड़ रुपये का टैक्स क्रेडिट क्लेम कर लिया। टैक्स विभाग के 550 पन्नों के इस नोटिस के सामने आने के बाद भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स मार्केट में हड़कंप मच गया है।
इस नोटिस के आने के बाद कई अन्य प्रमुख कंपनियों ने भी अपने रीसाइकलिंग और ई-वेस्ट सप्लाई चेन की अंदरूनी जांच शुरू कर दी है। जांच अधिकारियों ने यह दावा किया है कि इस फर्जीवाड़े की जांच को पूरे इंडस्ट्री में फैलाने के संकेत दिए हैं।
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क्या है पूरा मामला?
2022 से सरकार के नियमों के तहत इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों को अपने बेचे गए सामान के एक हिस्से को रीसायकल करना जरूरी होता है। ज्यादातर कंपनियां इसके लिए रजिस्टर्ड रीसायकलर्स से कम्प्लायंस सर्टिफिकेट खरीदती हैं। जांच अधिकारियों ने बताया कि इन कंपनियों ने 'WEEE-PRO रिसोर्स रिकवरी सॉल्यूशंस' नाम की एक रीसाइकलिंग फर्म से सर्टिफिकेट खरीदे। जांच में सामने आया कि वेंडर ने ई-वेस्ट कलेक्शन, ट्रांसपोर्टेशन या रीसाइकलिंग का कोई असली काम किया ही नहीं था।
अधिकारियों की मानें तो कंपनियों ने यह माना है कि उनसे लापरवाही हुई हैं। उन्होंने खुद जाकर यह चेक नहीं किया था कि वेंडर वाकई में रीसाइकलिंग कर भी रहा है या नहीं। हैरान कर देने वाली बात यह रही कि इस फर्जीवाड़े का पता एडिटेड फोटो से लग पाया।
कैसे होता है फर्जीवाड़ा?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ई-वेस्ट पैदा करने वाला देश बन चुका है। ई-वेस्ट नियम 2022 के तहत लागू EPR सिस्टम ने एक नया बाजार तैयार करके दिया जिसे EPR सर्टिफिकेट्स का व्यापार कहते हैं। इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद बनाने वाली कंपनियों को यह छूट मिली कि वे रीसाइक्लर से सर्टिफिकेट खरीदकर अपना पर्यावरण लक्ष्य पूरा दिखा सकें। कई रजिस्टर्ड रीसाइक्लर्स ने बिना वास्तविक कचरा प्रोसेस किए केवल कागजों पर EPR सर्टिफिकेट जेनरेट किए और टेक-कंपनियों को बेच दिए। यानी कचरा जमीन पर कचरा ही रहा लेकिन पोर्टल पर उसका रीसाइकलिंग सर्टिफिकेट इश्यू हो गया।
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भारत में जितने भी रजिस्टर्ड रीसाइक्लर्स हैं, उनमें से 80% से अधिक केवल 'डिसमैंटलर' हैं। यानी वे पुराने कंप्यूटर या मोबाइल को खोलकर प्लास्टिक्स, वायर और सर्किट बोर्ड अलग कर देते हैं। लेकिन सर्किट बोर्ड में से सोना, तांबा, कोबाल्ट या लिथियम निकालने की मॉडर्न तकनीक देश की चुनिंदा बड़ी कंपनियों के पास ही है। औपचारिक रीसाइक्लर को सरकारी नियमों, सुरक्षा मानकों और टैक्स का पालन करना पड़ता है, जबकि अनौपचारिक कबाड़ी स्क्रैप को तुरंत नकद देकर खरीद लेते हैं। वे तेजाब में सर्किट बोर्ड जलाकर मेटल निकालते हैं जिससे जहरीला धुआं और केमिकल कचरा सीधे हवा और पानी में घुल जाता है।
सरकारी ई-वेस्ट ऑडिट और सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) के जारी आंकड़ों को देखे तो यह विरोधाभास साफ दिखाई देता है। सरकारी आंकड़ों की माने तो पिछले कुछ सालों में सलाना ई-वेस्ट के उत्पादन में 15-20% की वृद्धि हुई है जबकि अगर असंगठित क्षेत्र का जोड़ दे तो यह आंकड़ा बहुत आगे निकल जाएगा। राज्यों में महाराष्ट्र, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, गुजरात और कर्नाटक ई-वेस्ट उत्पादन में सबसे ऊपर हैं। यूपी और दिल्ली-एनसीआर में अनौपचारिक डिस्मैनलिंग का विशाल नेटवर्क आज भी ऐक्टिव है।
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क्या होगा रास्ता?
भारत को ई-वेस्ट संकट से बाहर निकालने के लिए केवल ऑनलाइन EPR पोर्टल और नोटिस काफी नहीं हैं। आवश्यकता इस बात की है कि केवल डिजिटल एंट्री के आधार पर EPR क्रेडिट जारी न हों बल्कि रीसाइकलिंग प्लांट्स की बिजली खपत और ऑडिट की जांच की जानी चाहिए। मुरादाबाद, सीलमपुर या धारावी जैसे अनौपचारिक ई-वेस्ट हब के कबाड़ियों को बंद करने के बजाय उन्हें सुरक्षित डिसमैनलिंग सेंटर्स में अपग्रेड और फॉर्मलाइज किया जाए। भारत 5G, EV बैटरी और सोलर पैनलों का बड़ा उपभोक्ता बन रहा है।
यदि हम मौजूदा लैपटॉप-स्मार्टफोन का ई-वेस्ट सिस्टम संभालने में कागजी साबित हो रहे हैं तो आने वाले 5 सालों में लाखों टन ई-वेस्ट का क्या होगा? यह सिर्फ तीन या चार कंपनियों पर CPCB के एक्शन तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इस पूरे सिस्टम को दुरुस्त करने से ही हम वास्तव में आने वाले समस्या को संभाल पाएंगे।