कुछ दिनों पहले ही संचार साथी ऐप की अनिवार्यता को लेकर खूब हंगामा हुआ था। पहले टेलीकॉम कंपनियों ने इसे लेकर विरोध जताया था, फिर आम जनता ने भी इस पर ऐतराज जाहिर किया था। नतीजा यह हुआ कि केंद्र सरकार ने यह कह दिया कि इस ऐप को डाउनलोड करना या प्रीलोड करना अनिवार्य नहीं है। अब Reuters की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत सरकार आने वाले समय में स्मार्टफोन बनाने वाली कंपनियों से सोर्स कोड मांग सकती है। दावा यह भी किया गया कि कंपनियों ने इस पर ऐतराज जताया है। अब भारत के इलेक्ट्रॉनिक और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने जवाब दिया है।
रॉयटर्स ने अपनी खबर में दावा किया था कि इन कंपनियों ने सरकार के इस प्रस्तावित '83 सिक्योरिटी स्टैंडर्ड' पैकेज का विरोध किया है और कहा है कि ऐसा करना किसी भी वैश्विक मानक के हिसाब से सही नहीं है। अब भारत सरकार ने इस खबर का खंडन करते हुए साफ-साफ कहा है कि किसी भी कंपनी से सोर्स कोड नहीं मांगा गया है।
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सरकार ने क्या सफाई दी?
रॉयटर्स ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि सरकार की ओर से इसे साइबर सुरक्षा दुरुस्त करने और यूजर डेटा से जुड़े फ्रॉड को रोकने की दिशा में उठाया गया कदम बताया गया है। इस मामले पर IT सेक्रेटरी एस कृष्णन ने रॉयटर्स से कहा था, 'इंडस्ट्री की जो भी वाजिब चिंता होगी, उसका हल खुले दिल से निकाला जाएगा। अभी इस पर ज्यादा कुछ कहना सही नहीं होगा।' उन्होंने यह भी कहा कि इस मामले पर अभी वह ज्यादा विस्तार से नहीं बता सकते क्योंकि टेक कंपनियों से अभी बातचीत जारी है। दूसरी तरफ, टेक कंपनियों ने भी इस बारे में रॉयटर्स को कोई जवाब नहीं दिया था। बाद में भारत की आईटी मिनिस्ट्री ने इसका खंडन जारी करते हुए कहा कि ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं दिया गया है।
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रसारण मंत्रालय ने अपने बयान में कहा है, 'मंत्रालय ने सभी स्टेकहोल्डर्स की राय लेने की प्रक्रिया शुरू की है ताकि मोबाइल की सुरक्षा से जुड़े रेगुलेरटी फ्रेमवर्क तय किए जा सकें। यह इंडस्ट्री के साथ किए जाने वाले एक रेगुलर और रूटीन कंसल्टेशन का हिस्सा है ताकि सेफ्टी या सिक्योरिटी के मानक तय किए जा सकें। एक बार स्टेकहोल्डर्स के साथ सलाह-मशविरा हो जाए फिर सिक्योरिटी स्टैंडर्ड पर चर्चा की जाएगी। अभी तक कोई रेगुलेशन तैयार नहीं हुआ है।'
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बता दें कि 2014 और 2016 में चीन ने सोर्स कोर्ड मांगे थे लेकिन तब Apple ने इसे स्वीकार नहीं किया था। अमेरिका में भी ऐसी कोशिशें हुईं लेकिन कंपनियों ने इसे स्वीकार नहीं किया था। रॉयटर्स का दावा है कि भारत में टेक कंपनियों के इंडस्ट्री ग्रुप MAIT ने भी भारत सरकार के ऐसे संभावित प्रस्तावों का विरोध किया है।
सोर्स कोड शेयर किया तो क्या होगा?
सोर्स कोड यह बताते हैं कि किसी कंपनी का मोबाइल फोन या उसमें काम करने वाला ऑपरेटिंग सिस्टम कैसे काम करता है। यह कंपनियों के लिए बेहद निजी चीज होती है। यही वजह है कि Apple और सैमसंग जैसी कंपनियां कई देशों में पहले भी इसका विरोध कर चुकी हैं। माना जाता है कि अगर सरकार के पास सोर्स कोड का ऐक्सेस रहे तो इससे मोबाइल फोन इस्तेमाल करने वाले लोगों की निजता का हनन किया जा सकता है। साथ ही, कंपनियों को यह भी डर होता है कि इससे उनके प्रतिद्वंद्वी उनकी खूबियों का कमियों को आसानी से जान जाएंगे।