गुजरात हाई कोर्ट ने 'क्रूरता' से जुड़े एक पुराने केस में पति को बरी कर दिया है। यह फैसला 23 साल बाद आया है। साल 1996 में एक महिला ने शादी के एक साल बाद फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली थी। पुलिस ने उसके पति दिलीप भाई मंगल वरली पर केस किया।
दिलीप पर आरोप था कि वह अपनी पत्नी पर क्रूरता करते थे। उन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 498 (ए) और धारा 306 के तहत दोषी ठहराया गया था। उन पर पत्नी के साथ घरेलू हिंसा करने के आरोप थे, उन पर खुदकुशी के लिए उकसाने के आरोप थे। ये दोनों धाराएं, इन्हीं से संबंधित हैं।
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मामला क्या है?
ट्रायल कोर्ट ने साल 2003 में दिलीपभाई मंगलभाई वरली बनाम गुजरात राज्य केस में पति को दोषी ठहराया था। उसे खुदकुशी के लिए उकसाने के जुर्म में 7 साल और क्रूरता के लिए 1 साल की सजा दी गई थी। पति ने हाई कोर्ट में अपील की थी। ट्रायल कोर्ट के खिलाफ हाई कोर्ट में पति ने गुहार लगाई थी, जिस पर अब फैसला आया है। जस्टिस गीता गोपी ने फैसला सुनाया कि आरोपी पति निर्दोष है। दिलीप की सजा रद्द कर दी गई और उसे बरी कर दिया गया।
कोर्ट ने कहा है?
पत्नी के मायके में बिना बताए रात गुजारने पर पति ने एक बार थप्पड़ मारा था। यह एक ही घटना थी। कोर्ट ने कहा कि धारा 498 के तहत सिर्फ एक थप्पड़ को क्रूरता नहीं माना जा सकता। इसके लिए लगातार और असहनीय मारपीट के मामले सामने आते तो इसे क्रूरता कहा जा सकता था।
जस्टिस गीता गोपी, हाई कोर्ट:-
पति का पत्नी को बिना बताए रात भर मायके में रहने की वजह से थप्पड़ मारना क्रूरता नहीं मानी जाएगी। आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप साबित नहीं हो पाया है। लगातार, असहनीय पिटाई की भी बात सामने नहीं आई है। इसे क्रूरता मानने के लिए ठोस सबूत की जरूरत है, जिससे यह साबित हो सके कि बेटी ने कोई दूसरा रास्ता न मिलने पर फांसी लगाकर खुदकुशी की। गवाह क्रूरता और आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला साबित करने में नाकाम रहे। ट्रायल कोर्ट का नतीजा गलत है। इसलिए सजा कायम नहीं रह सकती है।'
क्यों सजा नहीं मिली?
कोर्ट ने कहा कि लेकिन इसके लिए पक्का सबूत चाहिए था। ऐसा कोई मजबूत सबूत नहीं मिला कि इससे पत्नी सुसाइड करने पर मजबूर हुई। पत्नी के माता-पिता ने आरोप लगाया था कि झगड़े इसलिए होते थे क्योंकि पति रात को शादियों में अतिरिक्त कमाई करने के लिए 'बैंजो' बजाने जाता था और देर से घर लौटता था। पत्नी को यह पसंद नहीं था।
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23 साल बात बरी हुआ पति
कोर्ट ने नोट किया कि पति-पत्नी का रिश्ता आमतौर पर ठीक था। दहेज की कोई मांग नहीं थी। मारपीट के संदर्भ में कोई पुरानी शिकायत या मेडिकल रिकॉर्ड की भी बात सामने नहीं आई है। कोई आजाद गवाह भी नहीं मिले। खुदकुशी के लिए उकसाने के आरोप तभी साबित होते हैं, जब इसके संदर्भ में कोई सीधा कनेक्शन हो। कोर्ट ने इसे आम घरेलू झगड़ा माना था। पति को पूरी तरह से बरी कर दिया गया है।