प्रतिबंध से खनन तक, कैसे बदली भारत की 'समुद्र मंथन' नीति, उम्मीदें क्या हैं?
सरकार ने समुद्री सीमा में विशेष आर्थिक क्षेत्र और गहरे समुद्री इलाकों में में पेट्रोलियम की खोज के लिए 'नो-गो एरिया' की नीति में बड़ा बदलाव किया है। इससे क्या बदला है, क्या संभावनाएं हैं, पढ़ें रिपोर्ट।

बैरन द्वीप। Photo Credit: PTI
देश आजादी का 80वां स्वाधीनता दिवस मना रहा है। प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी
ने लाल किले की प्राचीर से पश्चिम एशिया में तनाव की वजह से पैदा हुए संकट का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि हमें हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर होना चाहिए था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि देश अभी भी कच्चे तेल पर काफी हद तक निर्भर है। उन्होंने बताया कि पुरानी गलत सोच के कारण समुद्री क्षेत्र का लगभग 99 प्रतिशत हिस्सा 'नो गो एरिया' घोषित कर दिया गया था, जिससे समुद्र के अंदर तेल-गैस की खोज नहीं हो पाई।
प्रधान मंत्री मोदी ने कहा, 'अब सरकार ने इस सोच को बदला है और उन क्षेत्रों को 'गो अहेड एरिया' के रूप में खोल दिया है। इसके तहत समुद्र में नए भंडारों की खोज का काम तेज किया जा रहा है। हाल ही में समुद्र मंथन' योजना की घोषणा की गई है और इसे गति देने के लिए 85,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं।'
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, 'कई बार संसाधनों की कमी के कारण देश रुकता नहीं है लेकिन रुकने का कारण सोच की सीमाएं होती हैं। जब सोच बंध जाती है, सीमाओं में सड़ने लग जाती है तब हम अपने सामर्थ्य को भी पहचान नहीं पाते हैं। देश को आज कच्चे तेल पर निर्भर रहना पड़ रहा है और हमारी गलत सोच के कारण है।'
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नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री:-
आप जानकर हैरान रह जाएंगे, हमने समुद्री तट पर, 99% हमारा समुद्री तट का पूरा हिस्सा ऐसी सोच के कारण 'नो-गो एरिया' घोषित कर रखा है। हमने ही समुद्र के अंदर जाकर अन्वेषण न करने का निर्णय कर लिया था। ये सोच का दायरा था। हमने फैसला किया कि ये नहीं चल सकता। हमने उस 99 प्रतिशत क्षेत्र को 'गो-अहेड एरिया' के रूप में खुला कर दिया है। हम समुद्र के भीतर भी नए-नए भंडार खोजने की दिशा में प्रयास कर रहे हैं।
क्यों भारत ने 'नो गो एरिया' घोषित किया था?
रक्षा मंत्रालय ने पहले पर्यावरण कारणों से समुद्री तटों के लगभग 99 फीसदी हिस्से को अन्वेषण (Exploration) के लिए प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित किया था। इन्हें 'नो-गो एरिया' के तौर पर नोटिफाई किया गया था। एक तर्क यह भी था कि भारत के तटीय इलाकों में 'मोनाजाइट' खनिज पाया जाता है, जिसे परमाणु खनिज मानते हैं। इन्हीं इलाकों में मोनाजाइट और थोरियम की आंशिक मात्रा मिलती है, जिसका इस्तेाल न्यूक्लियल फ्यूल के तौर पर हो सकता है। भारत अगर अपने परमाणु ऊर्जा कंपनियों पर जोर देता तो इनकी जरूरत पड़ती। परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 और एटमिक एनर्जी रूल्स 1984 के तहत भी मोनाजाइट युक्त तटीय खनिजों के दोहन पर रोक थी। यह इलाका भी परमाणु ऊर्जा विभाग की अनुमति के अधीन था।
कैसे बदलती रही नीति?
पहले निजी कंपनियों को उन्हीं तटीय क्षेत्रों में खनन की अनुमति थी जहां मोनाजाइट एक तय सीमा से कम मिलता था। साल 2016 के संशोधन ने निजी कंपनियों को 0.75 प्रतिशत से ज्यादा मोनाजाइट सांद्रता (concentration) वाली तटीय रेत को खनन से रोका गया। फरवरी 2019 में खान मंत्रालय ने एक नई अधिसूचना जारी की जिसमें मोनाजाइट की सीमा को 0.75 प्रतिशत से घटाकर शून्य कर दिया। ज्यादा अन्वेषण की इजाजत इसलिए भी नहीं थी कि अगर प्राइवेट कंपनियों को यहां मौका देता तो भारत अपना खनिज स्टोर खो देता। केवल परमाणु खनिज अन्वेषण एवं अनुसंधान निदेशालय के पास यह अधिकार था कि यहां अन्वेषण किया जा सके।
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अब सरकार ने क्या फैसला लिया?
केंद्रीय कैबिनेट ने जुलाई 2026 को पेट्रोलियम मंत्रालय के नेशनल ऑफशोर एक्सप्लोरेशन स्कीम 'समुद्र मंथन योजना' को मंजूरी दे दी। इस योजना के तहत करीब 84,084 करोड़ रुपये खर्च करने की सरकार ने योजना तैयार की। प्रधानमंत्री इसी समुद्र मंथन योजना का जिक्र कर रहे थे।
इस योजना से होगा क्या?
समुद्र मंथन योजना का मकसद गहरे समुद्र और अति-गहरे समुद्र में तेल-गैस की खोज को बढ़ावा देना है। तेल-गैस की खोज महंगी और जोखिम भरी होती है। समुद्र में एक कुआं खोदने में 125 से 150 मिलियन डॉलर तक खर्च आ सकता है। कई बार पता भी नहीं चलता कि वहां तेल-गैस मिलेगा या नहीं। इसलिए सरकार जोखिम कम करने के लिए मदद करेगी। इससे निजी कंपनियां भी आगे आएंगी। योजना 2030-31 तक चलेगी।
कैसे खर्च होंगे पैसे?
पैसे का इस्तेमाल चार हिस्सों में होगा। सबसे ज्यादा 43,200 करोड़ रुपये 60 गहरे समुद्री कुओं की खुदाई के लिए रखे गए हैं। सरकार हर कुएं की लागत का आधा या अधिकतम 675 करोड़ रुपये तक देगी। 28,534 करोड़ रुपये समुद्र के नीचे तेल-गैस की मैपिंग यानी सीस्मिक डेटा जुटाने में लगेंगे। 10,000 करोड़ रुपये साझा सुविधाओं के विकास में और 2,000 करोड़ रुपये घरेलू उपकरण बनाने वाले जोन बनाने में खर्च होंगे। फिलहाल देश के पुराने तेल-गैस क्षेत्र हर साल 6-7 प्रतिशत उत्पादन घटा रहे हैं। इसलिए नए क्षेत्रों की जरूरत है।
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किन इलाकों में संभावनाएं हैं?
कृष्णा-गोदावरी, कावेरी, महानदी और अंडमान जैसे क्षेत्रों में संभावनाएं हैं। ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन लिमिटेड (ONGC) अगले सात साल में 150 गहरे समुद्री कुएं खोदने की योजना बना रही है। ऑयल इंडिया अंडमान में काम कर रही है और वहां गैस भी मिली है। द हिंदी की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अगर यह प्रोजेक्ट सफल होता है तो देश का घरेलू तेल-गैस उत्पादन सालाना 62 मिलियन मीट्रिक टन से बढ़कर 80 मिलियन मीट्रिक टन हो सकता है। संसाधन आधार भी 1.6 अरब टन से 2.2 अरब टन तक बढ़ेगा। इससे कच्चे तेल के आयात में करीब एक लाख करोड़ रुपये सालाना की बचत हो सकती है। इससे देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और विदेशों पर निर्भरता कम होगी।
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