हथियार नहीं, 'रेड कारपेट' से कैसे थमा नक्सलवाद? 9,855 करोड़ रुपये का खेल समझिए
31 मार्च 2026 को ही केंद्र सरकार ने भारत को नक्सल मुक्त घोषित कर दिया था। अब नक्सलवाद पर हुए खर्च का लेखा जोखा सामने आया है। सरकार ने क्या कीमत चुकाई, पढ़ें।

एंंटी नेक्सल फोर्स। Photo Credit: PTI
भारत छह दशकों तक लगातार वामपंथी उग्रवाद का केंद्र रहा है। पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से मई 1967 में भड़की माओवादियों की तथाकथित क्रांति 'नक्सलवाद' के नाम से भारत में जानी गई। तब चारू मजूमदार, कानून सान्याल और जंगल संथाल की तिकड़ी ने भूमिहीन किसानों और आदिवासी जमींदारों के बीच नफरत की ऐसी आग बोई कि दशकों तक, भारत नक्सलवाद से सुलगता रहा। यह शस्त्र विद्रोह, देखते ही देखते देश के 12 से ज्यादा राज्यों में फैला और सैकड़ों जवानों और आम लोगों की बलि ले गया। केंद्र सरकार ने 31 मार्च 2026 को आधिकारिक तौर पर कहा कि देश से नक्सलवाद खत्म हो गया।
नक्सलवाद, लाखों आदिवासी परिवारों, विद्रोहियों और सरकार के टकराव की कहानी है, जिसे खत्म करने में सरकार ने पानी की तरह पैसा बहाया है। वामपंथी उग्रवादियों की 12 राज्यों में समानांतर सरकार चल रही थी, जिन जगहों पर उनका प्रभुत्व था, वहां की सड़कें, स्कूल, अस्पताल सब पर ताला लगा। विकास की मुख्यधारा से दशकों तक ये इलाके कटे रहे। जिस भी सरकार ने उन इलाकों में विकास की कवायद की, बड़ी कीमत आदिवासी और सरकार दोनों को चुकानी पड़ी।
31 मार्च 2026 को यह तस्वीर बदल गई। केंद्र सरकार ने भारत को आधिकारिक तौर पर नक्सलवाद से मुक्त घोषित किया। गृहमंत्री अमित शाह बार-बार दोहराते रहे कि 31 मार्च, नक्सलवाद की आखिरी तारीख हो गई। कई बड़े माओवादियों ने सरेंडर किया, कैडर ने सरेंडर किया, जिन्होंने विद्रोह चुना, वे मारे गए।
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कैसे खत्म हुआ नक्सलवाद?
मई 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार बनी। नक्सलियों का दायरा 12 राज्यों के 200 से ज्यादा जिलों में फैला था, जिसे रेड कॉरिडोर कहा जाता था। यह देश की सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों में से एक था। ये इलाके, मुख्यधारा से कटे थे, यहां शहादत बेहद आम थी। सरकार ने यह तय किया कि वामपंथी उग्रवाद को खत्म करना है। सरकार ने धीरे-धीरे जोर दिया कि इन इलाकों में पहले सड़कें तैयार की जाएं, जिससे सुरक्षाबलों की यहां तक पहुंच हो पाए।
सुरक्षाबलों को धीरे-धीरे यहां लाया गया, एजेंसियों के बीच तालमेल सुधारा गया, समर्पण और पुनर्वास की व्यवस्थित नीति लाई गई और आदिवासियों को भरोसे में लिया गया। सड़कों, डिजिटल कनेक्टिविटी, दूरदराज के इलाकों में सरकार की मौजूदगी और रोजगार के मौकों ने काफी हद तक सरकार का काम आसान किया लेकिन यह आसान नहीं था।
नक्सलवाद का सबसे हिंसक दौर क्या था?
नक्सलवाद की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी विद्रोह से हुई थी, जो माओवादी विचारधारा और हथियारबंद क्रांति के सिद्धांत से प्रेरित था। नक्सलियों के करीब 92 प्रतिशत हथियार पुलिस थानों से लूटे गए थे। कई उग्रवादी संगठनों ने मिलकर 2004 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) की नींव रखी और यही प्रतिबंधित संगठन, भारत को लगातार जख्म देता रहा।
2004 से 2014 का दशक नक्सलवाद के इतिहास का सबसे हिंसक दौर रहा। साल 2010 में हिंसा अपने चरम पर थी, जब 1,936 घटनाएं हुईं और 720 आम नागरिकों की जान गई। पूरे दशक में कुल 17,542 हिंसक घटनाएं दर्ज हुईं, जिनमें 1,913 सुरक्षाकर्मी और 5,019 आम नागरिक मारे गए। उस समय कोई एक जैसी राष्ट्रीय नीति नहीं थी और अलग-अलग राज्य अपने-अपने तरीके से काम कर रहे थे। 2009 में तत्कालीन सरकार ने खुद स्वीकार किया था कि नक्सलवाद कश्मीर और पूर्वोत्तर से भी बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती बन चुका है।
सरकार को 9,855.20 करोड़ रुपये खर्च क्यों करने पड़े?
गृह मंत्रालय के मुताबिक 2015 में नक्सलवाद से निपटने के लिए राष्ट्रीय नीति और कार्ययोजना को मंजूरी दी गई, जिसने पुरानी बिखरी हुई व्यवस्था की जगह एक संगठित, पूरी सरकार को साथ लेकर चलने वाली रणनीति अपनाई। इसमें केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) तैनात किए गए। सरकार ने इस योजना पर पानी की तरह पैसे खर्च किए हैं।
- स्पेशल इंफ्रास्ट्रक्चर स्कीम (SIS): 1,761.00 करोड़ रुपये
- सुरक्षा संबंधी व्यय (SRE): 3,805.00 करोड़ रुपये
- स्पेशल सेंट्रल असिस्टेंस (SCA): 4,289.20 करोड़ रुपये
हथियार नहीं, 'रेड कारपेट' से थमा नक्सलवाद?
सिर्फ हथियार से नक्सलवाद खत्म नहीं हो पाता। केंद्र सरकार ने नक्सलियों से वादा किया कि अगर वे मुख्यधारा में शामिल होते हैं, हथियार छोड़ते हैं तो उनके पुनर्वास में सरकार मदद करेगी। सरकार ने 3 सूत्रीय फॉर्मूला तैयार किया, जिसकी मदद से नक्सली मुख्यधारा में लौटे। सरकार ने पहले सुरक्षा संबंधी व्यय, विशेष केंद्रीय सहायता जैसी योजनाओं पर खूब पैसे खर्च किए।
SCA योजना के तहत 2017 से अब तक लगभग 4,289.20 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके हैं। SIS के तहत नक्सल प्रभावित राज्यों में विशेष बलों, खुफिया शाखाओं, जिला पुलिस और सुरक्षित पुलिस थानों के निर्माण के लिए 1,761 करोड़ रुपये की परियोजनाएं मंजूर हुईं। 2014-15 से SRE योजना के तहत 3,805.04 करोड़ रुपये जारी किए गए। इसका इस्तेमाल, अभियानों, प्रशिक्षण, समर्पण करने वाले नक्सलियों के पुनर्वास और शहीद जवानों और नागरिकों के परिवारों की मदद के लिए हुआ।
24 अगस्त 2024 को सरकार ने 31 मार्च 2026 तक देश को नक्सल-मुक्त बनाने का लक्ष्य तय किया। सुरक्षाबल दंडकारण्य के जंगलों में उन इलाकों तक गए, जहां तक पहले सरकार जाती ही नहीं थी। सरकार ने एंटी नक्सल ऑपरेशन चलाए, कई दौर की हिंसक झड़पें हुईं, नक्सलियों को घेरा गया, उनकी हथियार फैक्ट्रियां तबाह की गईं, मदद करने वालों पर नकेल कसी गई। आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और झारखंड में सुरक्षाबलों को बेहतर नतीजे मिले।
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कहां-कहां सरकार ने पैसे खर्च किए?
नक्सल प्रभावित इलाकों में 663 सुरक्षित पुलिस थाने बनाए गए, जबकि 2014 से पहले सिर्फ 66 थे। पिछले 7 वर्षों 408 नए CAPF शिविर स्थापित किए गए, जिससे जंगलों की हर गतिविधि पर सरकार की नजर रहे। जवानों को पहुंचाने और घायलों को निकालने के लिए 68 रात में उतरने लायक हेलिपैड बनाए गए। सुरक्षाबलों को 400 बुलेटप्रूफ और ब्लास्टप्रूफ गाड़ियां दी गईं, उनके इलाज के लिए 5 स्पेशल अस्पताल बनाए गए।
कमांडो बटालियन फॉर रिजॉल्यूट एक्शन (कोबरा), CRPF, जिला रिजर्व गार्ड (DRG) और झारखंड जगुआर, छत्तीसगढ़ पुलिस की विशेष इकाइयों और आंध्र प्रदेश के ग्रेहाउंड्स जैसे राज्य के विशेष दस्तों को मिलाकर एक बहुस्तरीय सुरक्षा ढांचा तैयार किया गया। डीआरजी, एसटीएफ, सीआरपीएफ और कोबरा के साझा प्रशिक्षण से एक तालमेल वाली, एक-दूसरे के साथ काम कर सकने वाली फोर्स बनी।
साल 2014 के बाद ड्रोन, UAV, सैटेलाइट तस्वीरों और एआई की मदद से जंगलों को नक्सलमुक्त करने पर काम किया गया। लोकेशन ट्रैकिंग, कॉल-लॉग, मोबाइल डेटा एनालिटिक्स और सोशल मीडिया विजिलेंस पर सरकार ने पैसे खर्च किए।
ट्रेस, टारगेट, न्यूट्रलाइज मिशन ने कितनी मदद की?
सिर्फ पैसे नहीं, सरकार ने 'ट्रेस, टारगेट, न्यूट्रलाइज' योजना पर जोर दिया। जिन माओवादियों ने सरेंडर करने से मना किया, उन्हें मरना पड़ा। ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट, ऑपरेशन ऑक्टोपस, ऑपरेशन डबल बुल, ऑपरेशन थंडरस्टॉर्म, ऑपरेशन भीमबर्ग और ऑपरेशन चक्रबंधा ने माओवादी नेटवर्क को तोड़ा।
नक्सलियों की फंडिंग रुकी तो और बेबस हुए
सुरक्षाबलों के साथ-साथ सरकार ने नक्सलियों की पूरी सहयोगी व्यवस्था पर भी वार किया। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) में एक विशेष शाखा बनाई गई जो नक्सलियों को मिलने वाली फंडिंग को रोकती है। दिसंबर 2025 तक NIA ने 40 करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति जब्त की, प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 12 करोड़ की संपत्ति अटैच की और राज्य एजेंसियों ने अतिरिक्त 40 करोड़ रुपये जब्त किए। दिसंबर 2025 तक 111 लेफ्ट विंग एक्सट्रीमिस्म (LWE) मामलों की जांच हुई और 98 आरोपपत्र दाखिल हुए। जून 2026 तक NIA के कुल मामलों की संख्या 112 हो गई, जिनमें से 100 में आरोपपत्र दाखिल हो चुके हैं।
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रेड कारपेट मॉडल कितना सफल रहा?
सरकार ने माओवादियों को पुनर्वास पर इतना जोर दिया कि बड़े और वांछित माओवादी भी जान बचाने की लालच से नहीं बच पाए। हथियार न छोड़ने पर मारे जाने का डर और छोड़ने पर लाखों का लालच वाला फॉर्मूला काम कर दिया। सरकार ने पहले दिन से कहा कि जो हथियार डालेगा, उसके लिए रेड कारपेट है।
समर्पण करने वाले बड़े पदाधिकारियों को तुरंत 5 लाख रुपये और बाकी को 2.5 लाख रुपये की आर्थिक सहायता का वादा किया गया। 36 महीने तक हर महीने 10,000 रुपये की सहायता राशि दी जाने लगी। समर्पण पर अतिरिक्त 50,000 रुपये का प्रोत्साहन सरकार दे रही है। अगर ग्रुप सरेंडर होता है तो और पैसे मिलते हैं।
पुनर्वास नीति के चलते समर्पण की संख्या लगातार बढ़ती गई। साल 2025 में 2,337 नक्सलियों ने हथियार डाले, जबकि 2024 से मार्च 2026 के बीच कुल 3,927 कैडरों ने समर्पण किया। इसमें नागरिक समाज के सदस्यों, पत्रकारों, समुदाय के नेताओं और जनप्रतिनिधियों ने भी अहम भूमिका निभाई।
नक्सलवाद तो खत्म हुआ, आदिवासियों को क्या मिला?
गृह मंत्रालय के मुताबिक नक्सलवाद खत्म करने का मकसद सिर्फ नक्सलियों को हराना नहीं था, बल्कि यह तय करना था कि बड़े शहरों में मिलने वाली हर सुविधा गरीब आदिवासियों तक भी पहुंचे। सड़क संपर्क योजना (RRP) और नक्सल प्रभावित इलाकों के लिए सड़क संपर्क परियोजना (RCPLWEA) के तहत कुल 15,189 किलोमीटर सड़कें बनाई गईं। डिजिटल कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए 9,497 मोबाइल टावर लगाए गए, जिससे सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित इलाकों के 46,592 में से 44,728 गांवों में मोबाइल कनेक्टिविटी पहुंच गई।
अप्रैल 2015 से मार्च 2026 के बीच 1,804 बैंक शाखाएं खुलीं, 1,321 एटीएम लगे, 74,720 बैंकिंग करेस्पॉन्डेंट नियुक्त किए गए और 6,025 डाकघर स्थापित हुए। शिक्षा और कौशल विकास के लिए बीते बारह सालों में 259 एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय (EMRS) मंजूर किए गए, जिनमें से 179 अब चालू हो चुके हैं।
47 औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (ITI) और 49 कौशल विकास केंद्र (SDC) बनाए गए, जिन पर करीब 800 करोड़ रुपये खर्च हुए। इन योजनाओं के जरिए 90,000 से ज्यादा युवाओं और महिलाओं को कौशल प्रशिक्षण दिया गया। जनजातीय युवा आदान-प्रदान कार्यक्रम (TYEP) के तहत 2014 से अब तक 37,655 आदिवासी युवाओं ने देश भर में एक्सपोजर विजिट में हिस्सा लिया है। सिविक एक्शन प्रोग्राम के तहत 2014 से अब तक 221.88 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं, जिनसे सुरक्षाबलों और स्थानीय समुदायों के बीच भरोसा मजबूत हुआ।
अब नक्सलवाद किस हाल में है?
नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या 2014 में 126 थी, जो मार्च-अप्रैल 2026 तक शून्य हो गई। सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों की संख्या भी 35 से घटकर शून्य हो गई। हिंसा के आंकड़ों में भी यह बदलाव साफ नजर आता है। साल 2010 नक्सलवाद के इतिहास का सबसे खतरनाक साल था, जब 1,936 घटनाएं और 1,005 मौतें दर्ज हुई थीं। नक्सल संबंधी घटनाएं 2014 के 870 से घटकर 2026 में सिर्फ 33 रह गईं, जबकि इसी दौरान मौतों की संख्या 310 से घटकर 11 रह गई। भारत का नक्सल-मुक्त बनना देश के स्वतंत्रता के बाद के इतिहास की सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा उपलब्धियों में से एक माना जा रहा है।
क्या अब भी नक्सली कर रहे हैं सरेंडर?
28 जुलाई 2026 को 'नई दिशा, नई पहल' अभियान के तहत कोलहान और लातेहार इलाके के 16 सक्रिय माओवादियों ने रांची में समर्पण किया, जिनमें एक रीजनल कमांडर, तीन जोनल कमांडर, तीन सब-जोनल कमांडर, छह एरिया कमांडर और तीन कैडर स्तर के सदस्य शामिल थे। इन्होंने 11 अत्याधुनिक हथियार, 38 मैगजीन और 1,562 राउंड गोला-बारूद भी सरकार को सौंपे।
अगले दिन, 29 जुलाई 2026 को बीजापुर पुलिस के सामने 49 लाख रुपये के कुल इनाम वाले 8 माओवादियों ने समर्पण किया। उसी दिन धनबाद-गिरिडीह सीमा से 1 करोड़ रुपये के इनामी माओवादी मिसिर बेसरा को गिरफ्तार किया गया। वह माओवादियों के सबसे बड़े नेता थे। शीर्ष माओवादी पोलित ब्यूरो सदस्य को गिरफ्तार किया गया, और खुफिया जानकारी पर आधारित संयुक्त अभियान में 15 लाख रुपये के इनामी रीजनल कमेटी सदस्य, एक अन्य कैडर और दो ग्रामीणों को भी पकड़ा गया। ज्यादातर माओवादियों ने सरेंडर कर दिया है।
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