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8 अरब डॉलर की स्पेस इकॉनमी, 400 से ज्यादा स्टार्टअप, ISRO कैसे कमाल कर रहा है?

साल 1960 के दशक से शुरू हुआ भारतीय अंतरिक्ष मिशन, अब दुनिया के सबसे सफल अंतरिक्ष मिशनों में से एक है। यह सफर इसरो ने कैसे तय किया है, पढ़ें इस बार के फ्राइडे रिलीज में।

ISRO

प्रतीकात्मक तस्वीर। AI इमेज। Photo Credit: Kbargaon

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1960 का दशक था। भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रमों की जब शुरुआत हुई, तब इसे लोग इंडियन नेशनल कमेटी फॉर स्पेस रिसर्च (INCOSPAR) के नाम से जानते थे। 16 जुलाई 1969 में जब नेशनल एयरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (NASA) ने अपना पहला मानवयुक्त अंतरिक्ष यान भेजा था, उससे महज एक महीने भारत के अंतरिक्ष मिशन 15 अगस्त 1969 नींव पड़ी थी। दोनों देशों के बीच तकनीक से लेकर बजट तक, जमीन आसमान का अंतर था। चंद्रमा के इस मिशन का नाम अपोलो था, जिस पर अमेरिका ने करीब 25 अरब डॉलर खर्च किए थे। इसरो तब परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) की एक छोटी सी शाखा था, जिसका बजट बेहद सीमित था। 

अंतर को ऐसे ही समझ सकते हैं कि अमेरिका चंद्रमा की सफर पर निकल पड़ा था और भारत के रॉकेट के पुर्जे साइकिल और बैलगाड़ी पर ढोए जाते थे। तब भारत के इसरो का बजट लाखवें हिस्से से भी कम था। अधिकतम 1 या दो करोड़। 29 जुलाई, 1958 को नासा की स्थापना हो गई थी, जबकि करीब 4 साल भारत, भारत में INCOSPAR की नींव पड़ी। तब भारत के पास अंतरिक्ष कार्यक्रमों के लिए कोई अलग विभाग नहीं था। साल 1963 में इसरो की स्थापना से कई साल पहले भारत ने थुम्बा रॉकेट लॉन्चिग स्टेशन तैयार किया था। विक्रम साराभाई जोर दे रहे थे कि भारत का अंतरिक्ष भी अपने शुरुआती कदम चले कि भारत भी स्पेस रेस में शामिल हो। 

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कैसे हुआ इसरो का जन्म?

INCOSPAR की स्थापना के एक साल बाद साल 1963 में थुम्बा रॉकेट लॉन्चिंग स्टेशन बना। विक्रम साराभाई ने केरल के थुम्बा में एक तटीय गांव को रॉकेट लॉन्चिंग के लिए चुना। यह रेखा, भूमध्य रेखा के करीब था। हवा और वायमंडलीय परिस्थितियां इसी के अनुकूल थीं। भारत के शुरुआती मिशन में NASA ने भारत की मदद की थी। 21 नवंबर 1963 को थुम्बा से पहला साउंडिंग रॉकेट मिला। यहां से भारत ने अपने रॉकेट मिशन का पहला कदम चला। शुरुआती दिनों में संसाधनों की इतनीकमी थी कि रॉकेट के पुर्जे साइकिल और बैलगाड़ी पर ढोए जाते थे। चर्च और बिशप हाउस जैसे स्थलों को अस्थाई कार्यालय के तौर पर इस्तेमाल किया जाता रहा। यह अंतरिक्ष कार्यक्रमों की शुरुआत भर थी। भारत को लंबी उड़ान भरनी थी। 

Vikram Sarabhai

कब हुई इसरो की स्थापना?

INCOSPAR को अब विस्तार मिला। 15 अगस्त 1969 को INCOSPAR को पुनर्गठित किया गया और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की नींव पड़ी। विक्रम साराभाई, इसके पहले अध्यक्ष थे। उनका एजेंडा तय था, भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम पूरी तरह से कृषि, मौसम, संचार और शिक्षा के क्षेत्र में होगा, न कि विकसित देशों की तरह चांद पर इंसान भेजने का। 

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जब भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को लगा झटका 

30 दिसंबर 1971 को भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को बड़ा झटका लगा। साराभाई नहीं रहे, उनकी जगह सतीश धवन ने इसरो की कमान संभाली। उन्होंने विक्रम साराभाई के परमाणु कार्यक्रमों को आगे बढ़ाया। 1972 में अंतरिक्ष आयोग और अंतरिक्ष विभाग की स्थापना हुई। ISRO को इसी के अंतर्गत लाया गया। तब से लेकर अब तक, इसरो अंतरिक्ष विभाग के अंतर्गत आता है और प्रधानमंत्री के अधीन काम करता है। 

भारत ने शुरुआती सफलता का स्वाद कैसे चखा?

साल 1975 तक, भारत ने अपना पहला उपग्रह आर्यभट्ट, सोवियत रॉकेट से लॉन्च किया। लॉन्च के कुछ दिनों बाद इसके उपकरणों ने सिग्नल भेजना बंद कर दिया। साल 1980 तक, भारत ने अपना सेटेलाइट लॉन्च व्हीकल-3 बना लिया था। डॉ. कलाम इस प्रोजेक्ट के निदेशक थे। इसकी मदद से भारत ने रोहिणी उपग्रह को कक्षा में स्थापित किया। तब दुनिया के सिर्फ सोवियत संघ, अमेरिका,फ्रांस, जापान, चीन और ब्रिटेन ऐसे देश थे, जिन्होंने अपने रॉकेट से अपना उपग्रह स्थापित किया था।  

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बैलगाड़ी वाले इसरो की कहानी क्या है?

साल 1981 में जब ISRO के वैज्ञानिकों ने अपना पहला कम्युनिकेशन सैटेलाइट 'APPLE' बैलगाड़ी पर बैठाकर ले जाया तो पूरी दुनिया हंस पड़ी थी। इसे इसरो ने एरियन पैसेंजर पेलोड एक्सपेरीमेंट (AAPLE) नाम दिया था। यह भारत का पहला संचार उपग्रह था। इसे फ्रेंच गुयाना से यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) के एरियन-1 रॉकेट के जरिए अंतरिक्ष में भेजा गया था। इसका वजन करीब 672 किलोग्राम था। इस मिशन की सफलता ने भारत के आगे के सैटेलाइट कार्यक्रम की नींव रखी।

लेकिन सैटेलाइट को बैलगाड़ी से क्यों लाया गया, इसकी कहानी भी दिलचस्प है। सैटेलाइट की एंटीना टेस्टिंग के लिए वैज्ञानिकों को बिना चुंबकीय प्रभाव वाली जगह चाहिए थी। महंगे उपकरण या लैब बनाने के बजाय वैज्ञानिकों ने आसान रास्ता अपनाया। उस वक्त तक ISRO के पास लॉन्ग रेंज एंटीना या थर्मल ब्लैंकेट जैसी सुविधाएं नहीं थीं।

किसी उपग्रह को जिस टेलीमेट्री, ट्रैकिंग और कमांड लिंक से कंट्रोल किया जाता है, उसी में खामी आ गई थी। इसे दूर करने के लिए सबसे बड़ी बाधा थी कि खुले मैदान में गैर-चुम्बकीय वातावरण हो। तब सिर्फ 150 रुपये के किराए वाली बैलगाड़ी पर APPLE को लादकर खुली जगह ले गए, वहां टेस्टिंग की गई। APPLE ने टीवी कार्यक्रम प्रसारण, रेडियो नेटवर्किंग और सैटेलाइट कम्युनिकेशन के कई प्रयोग किए। एक सोलर पैनल खुलने में समस्या आई थी, फिर भी सैटेलाइट ने अपना काम अच्छे से किया। इस मिशन के प्रोजेक्ट डायरेक्टर आरएम वासगम थे। इस मिशन ने ही INSAT और GSAT श्रृंखला विकसित करने के लिए एक मजबूत आधार दिया, जिसकी वजह से देश में संचार क्रांति आई। 

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बैलगाड़ी से हजारों करोड़ कमाने तक, इसरो ने सफर कैसे पूरा किया?

भारतीय अंतरिक्ष विभाग के मुताबिक भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम ने पिछला एक दशक, क्रांतिकारी साबित हुआ। स्टार्टअप्स, निवेश, प्रक्षेपण क्षमताओं की बदौलत भारत ने इस सेक्टर में कई उपलब्धियां हासिल की हैं। अंतरिक्ष विभाग ने निजी क्षेत्रों को भी मौके दिए तो निवेश का मौका बढ़ा। साल 2014 में भारत में सिर्फ 1 पंजीकृत अंतरिक्ष स्टार्टअप था। फरवरी 2026 तक यह बढ़कर 400 से ज्यादा हो गया है। इन स्टार्टअप्स में कुल 500 मिलियन डॉलर से ज्यादा का निवेश हुआ है, जिसमें अकेले 2025 में करीब 150 मिलियन डॉलर का निवेश आया है। 

3 करोड़ से 8 अरब डॉलर तक, कैसे इसरो की अर्थव्यवस्था बढ़ी?

अंतरिक्ष विभाग के मुताबिक 1970 के दशक में इसरो का ISRO का बजट अधिकतम 3.5 से 4 करोड़ रुपये के बीच था। अब भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था 8 अरब डॉलर की है, जो वैश्विक बाजार में 2-3 फीसदी हिस्सेदारी रखती है। अगले दशक में इसे 5 गुना बढ़ाकर 40-45 अरब डॉलर तक पहुंचाने का अनुमान है। 

भारत का लक्ष्य 2030 तक वैश्विक अंतरिक्ष बाजार में 8 फीसदी हिस्सेदारी हासिल करना है।  न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) का राजस्व भी तेजी से बढ़ा है। वित्त वर्ष 2021-22 में यह ₹321.77 करोड़ था, जो 2024-25 में बढ़कर ₹3,246.09 करोड़ हो गया। IN-SPACe ने 31 जनवरी 2026 तक उद्योग और स्टार्टअप्स को ISRO की 71 तकनीकों का हस्तांतरण कराया है। अब तक 6 भारतीय गैर-सरकारी संस्थाओं ने 18 उपग्रह लॉन्च किए हैं और 25 पेलोड POEM प्लेटफॉर्म पर उड़ाए गए या निर्धारित किए गए हैं।

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क्यों इसरो का हो रहा है विस्तार?

अंतरिक्ष विभाग का कहना है कि फरवरी 2024 में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) नियमों को आसान बनाया गया। अब उपग्रह निर्माण और संचालन में ऑटोमैटेड रूट से 74 फीसदी तक विदेशी निवेश की अनुमति है। प्रक्षेपण यानों और स्पेसपोर्ट में 49 फीसदी तक FDI की छूट है, जबकि उपग्रह तथा ग्राउंड सेगमेंट के उपकरण निर्माण में 100 फीसदी FDI की अनुमति दी गई है।

भारत की प्रक्षेपण क्षमता क्या है?

भारत के पास अत्याधुनिक सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल हैं। इसरो ने ब्रिटेन और फ्रांस सहित कई देशों के व्यापारिक उपग्रहों का सफल प्रक्षेपण किया है। भारत के पास पोलर सेटेलाइट लॉन्च व्हीकल (PSLV), जियो सैंक्रोनस सेटेलाइट लॉन्च व्हीकल,  लॉन्च व्हीकर मार्क 3 (LVM-3) जैसे प्रक्षेपण यान हैं। लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में 10 टन और जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (GTO) में 4.2 टन इन प्रक्षेपण यानों की क्षमता है। ISRO नेक्स्ट जनरेशन लॉन्च व्हीकल (NGLV) पर काम कर रहा है, जिसकी मदद से LEO अब 30 टन पेलोड ले जा सकेगा। इसका अपडेटेड वर्जन 14 टन की क्षमता वाला होगा। ISRO के पास अभी 2 सक्रिय लॉन्च पैड हैं, एक तीसरे की भी स्वीकृति मिली है, जिसे 3,984.86 करोड़ रुपये की लागत से तैयार किया जाएगा। SSLV कॉम्प्लेक्स हर साल 20 से 25 ऑर्बिटल प्रक्षेपण करने में सक्षम होगा।

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दुनिया के कैसे काम आ रहा ISRO?

1990 के दशक से 2014 तक ISRO ने केवल 35 विदेशी उपग्रह लॉन्च किए थे। 2014 के बाद मार्च 2026 तक यह संख्या बढ़कर 399 हो गई है। भारत ने 61 देशों और 5 बहुपक्षीय संगठनों के साथ 300 से अधिक अंतरिक्ष सहयोग समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। भारत ने जर्मन प्रक्षेपण यानों से 11 जर्मन उपग्रह भी सफलतापूर्वक लॉन्च किए।

ISRO के अंतरिक्ष मिशन की उपलब्धियां क्या हैं?

इसरो के हिस्से असफलताएं कम, सफलताएं ज्यादा आईं हैं। चंद्रयान-3 ने 23 अगस्त 2023 को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास 69.3 डिग्री दक्षिण अक्षांश पर सफल लैंडिंग की थी। 24 सितंबर 2014 को मंगलयान, मंगल की कक्षा में पहुंचा। यह मिशन सिर्फ 6 महीने के लिए था, लेकिन यह 8 वर्ष से ज्यादा वक्त तक सक्रिय रहा।

आदित्य-L1 पृथ्वी से 15 लाख किलोमीटर दूर हेलो कक्षा में स्थापित है और अब तक 27 टेराबाइट से ज्यादा सौर डेटा जारी कर चुका है। जनवरी 2025 में स्पेडेक्स मिशन में सफल डॉकिंग प्रयोग हुआ। गगनयान मिशन के तहत 3 भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को 400 किमी की कक्षा में तीन दिन भेजने की योजना है।

इसरो और नासा के संयुक्त उपक्रम 'नासा-इसरो सिंथेटिक अपार्चर रडार' (NISAR) है। यह NASA और ISRO का संयुक्त अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट मिशन है। इसका मसकद पृथ्वी की सतह, बर्फ, जंगल, जल, और प्राकृतिक आपदाओं में होने वाले बदलावों पर नजर रखना है। शुभांशु शुक्ला ने एक्सिओम-4 मिशन में 25 जून 2025 को फाल्कन-9 से उड़ान भरी और 15 जुलाई 2025 को जमीन पर लौटे। उन्होंने 7 सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण प्रयोग किए। 

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ISRO के अगले प्रोजेक्ट क्या हैं?

वीनस ऑर्बिटर मिशन मार्च 2028 में लॉन्च होने वाला है। BAS-01 मिशन 2028 तक लॉन्च होगा, जिसके तहत 5 मॉड्यूल वाला भारतीय स्पेस स्टेशन बनाने की योजना है। नेविगेशन सिस्टम (NavIC) भारतीय सीमाओं से 1,500 किलोमीटर दूर तक नजर रखता है। अब इसे अपडेट करने की तैयारी चल रही है। NVS-01 मई 2023 और NVS-02 जनवरी 2025 में लॉन्च हो चुके हैं। कुल 5 सेकेंड जनरेशन सैटेलाइट (NVS-01 से NVS-05) लॉन्च करने की योजना है।

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