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प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से किसान क्यों बना रहे दूरी? 73 लाख ने छोड़ा साथ

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को लेकर चिंताजनक आंकड़े सामने आ रहे हैं जिनसे इस योजना को लेकर कई तरह के सवाल खड़े होने शुरू हो गए हैं।

Farmer after rain

किसान की फसल खराब, Photo Credit: PTI

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किसानों को आर्थिक सुरक्षा देने के लिए प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना शुरू की गई थी। इस योजना का मकसद था कि फसल खराब होने पर किसान को कम से कम आर्थिक सहारा मिल सके। इस योजना को कई साल तक सरकार एक अहम योजना के रूप में पेश करती रही लेकिन अब इस योजना की कामयाबी पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि पिछले दो साल में करीब 73 लाख किसानों ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से दूरी बना ली है। अब सवाल यह उठ रहा है कि अगर यह योजना इतनी ही अच्छी है तो किसान इस योजना से पीछे क्यों हट रहे हैं। 

 

फसल बीमा योजना से जुड़ा यह आंकड़ा ऐसे समय सामने आया है जब जलवायु परिवर्तन के कारण खेती का जोखिम और बढ़ रहा है और इस साल मानसून भी किसानों और खेती के अनुकूल नहीं है। यानी जिस समय किसानों को बीमा की सबसे ज्यादा जरूरत है, उसी समय उनका योजना से बाहर होना गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। जानकारों का मानना है कि इसकी एक बड़ी वजह क्लेम के भुगतान में देरी, नुकसान के आकलन को लेकर विवाद और बीमा प्रोसेस का काफी मुश्किल होना हो सकता है। 

 

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क्या है यह योजना?

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) केंद्र सरकार की फसल बीमा योजना है, जिसे 2016 में लागू किया गया था। इसका उद्देश्य सूखा, बाढ़, ओलावृष्टि, चक्रवात, कीट और बीमारियों जैसी प्राकृतिक आपदाओं या अन्य अप्रत्याशित घटनाओं से फसल को हुए नुकसान की स्थिति में किसानों को आर्थिक सुरक्षा देना और उनकी आय को स्थिर रखना है। इस योजना के तहत किसान को बहुत कम प्रीमियम देना होता है और बाकी प्रीमियम का बड़ा हिस्सा केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर देती हैं। अगर किसान को नुकसान होता है तो उसके आधार पर बीमा का कवर दिया जाता है। 

किसान क्यों पीछे हट रहे?

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में किसान का हिस्सा अपेक्षाकृत कम रखा गया है। खरीफ फसलों के लिए किसान को बीमा राशि का अधिकतम 2 फीसदी, रबी में 1.5 फीसदी और व्यावसायिक व बागवानी फसलों में अधिकतम 5 फीसदी प्रीमियम देना होता है। बाकी प्रीमियम केंद्र और राज्य सरकारें वहन करती हैं। ऐसे में तो किसानों को भारी संख्या में जोखिम से बचने के लिए इस योजना का लाभ उठाना चाहिए था लेकिन इसके विपरीत किसान इस योजना से पैर पीछे खींच रहे हैं। कागज पर यह व्यवस्था किसानों के लिए आकर्षक दिखती है, लेकिन असली परेशानी तब शुरू होती है जब फसल खराब होती है। किसान के लिए सबसे जरूरी सवाल होता है कि नुकसान कितना हुआ और पैसा कब मिलेगा। यहीं प्रक्रिया कई बार उलझ जाती है।

 

फसल नुकसान का आकलन मुख्य रूप से क्रॉप कटिंग एक्सपेरिमेंट (CCE) के जरिए किया जाता है। इसमें किसी क्षेत्र के चुनिंदा खेतों में फसल काटकर उत्पादन का आकलन किया जाता है और उसे पुराने उत्पादन आंकड़ों से तुलना की जाती है। अब सैटेलाइट और ड्रोन जैसी तकनीकों का इस्तेमाल भी बढ़ाया जा रहा है। दिक्कत यह है कि किसान का नुकसान उसके खेत में होता है, जबकि बीमा का आकलन कई मामलों में पूरे बीमित क्षेत्र की औसत उपज के आधार पर होता है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर भारी नुकसान झेलने वाला किसान भी अपेक्षित मुआवजे से वंचित रह सकता है।

योजना में फर्जीवाड़े की संभावना

फरवरी 2026 में राजस्थान विधानसभा में कृषि मंत्री किरोड़ी लाल मीणा ने बताया कि श्रीगंगानगर के करणपुर में 1.70 लाख इंटिमेशन फॉर्म की जांच में करीब 32 हजार फॉर्म ऐसे मिले, जिनमें फसल नुकसान शून्य दिखाया गया था, जबकि वास्तविक नुकसान 50 से 70 फीसदी तक बताया गया। मंत्री के मुताबिक इससे किसानों के करीब 128 करोड़ रुपये के दावे प्रभावित हुए। मामले में एफआईआर दर्ज की गई और आगे जांच के लिए SOG को जिम्मेदारी देने की बात कही गई। 

 

इतना ही नहीं, राजस्थान में फर्जी दस्तावेजों के जरिए बीमा कराने के दूसरे मामले भी सामने आए। जयपुर और टोंक जिलों में कृषि विभाग ने फर्जी फसल बीमा की शिकायतों की जांच के बाद मामला सही पाया और संबंधित लोगों तथा ई-मित्र के खिलाफ FIR की कार्रवाई के निर्देश दिए। इससे साफ है कि समस्या केवल यह नहीं कि किसान को क्लेम देर से मिल रहा है। जिस व्यवस्था में किसान के नुकसान का आकलन होना है, उसी में फर्जी दस्तावेज, गलत आंकड़े और बिचौलियों के जरिए फर्जीवाड़ा हो रहा है। ऐसे मामलों में किसानों का नुकासान हो रहा है। 

 

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क्या है भविष्य?

सरकार के आंकड़ों के मुताबिक,प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत 2016-17 में शुरुआत से दिसंबर 2025 तक 92.46 करोड़ से ज्यादा किसान आवेदन बीमित किए गए और 1.96 लाख करोड़ रुपये के दावे बांटे जा चुके हैं। करीब 24.31 करोड़ किसानों को इसका लाभ मिला है। यानी  यह कहना सही नहीं होगा कि योजना पूरी तरह फेल हो गई है। करोड़ों किसानों को भुगतान मिला है और आपदा के समय इसने आर्थिक सुरक्षा भी दी है लेकिन भुगतान की प्रोसेस, बीमा के लिए कागजी कार्रवाई और समय से बीमा कवर ना मिलने जैसी दिक्कतों के कारण किसानों का इस योजना से मोहभंग हो रहा है।

 

ऐसे में सरकार अगर किसानों के लिए इस प्रोसेस को और भी आसान करे, वैज्ञानिक तरीकों से फसल बीमा कवर तय करने की कोशिश की जाए और नुकसान की भरपाई के लिए सरकारी दफ्तर, बैंक, बीमा कंपनी के चक्कर लगाने के लिए किसान को मजबूर ना किया जाए तो इस योजना का लाभ उसके असली हकदारों को मिल सकता है। 


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