कमेटी को भेजे पत्र में जांच को लेकर जस्टिस वर्मा ने क्या कहा? 10 बड़ी बातें
जस्टिस यशवंत वर्मा ने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा भेज दिया है। इसके अलावा जजेस इन्क्वॉयरी कमेटी से अपना नाम वापस लिए जाने के लिए लिखे 13 पन्नों के पत्र में उन्होंने जांच से संबंधित महत्त्वपूर्ण बातें कही हैं।

जस्टिस यशवंत वर्मा, File Photo Credit: PTI
जस्टिस यशवंत वर्मा ने भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते उन्हें पद से हटाने के लिए चल रही महाभियोग प्रक्रिया के बीच इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज के पद से इस्तीफा दे दिया है। पिछले साल दिल्ली स्थित उनके घर से भारी मात्रा में नकदी बरामद होने के बाद से ही वर्मा सवालों के घेरे में थे। उस समय उन्होंने इस बात से इनकार किया था कि वह नकदी उनकी है।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को लिखे अपने इस्तीफे में जस्टिस वर्मा ने इस अचानक लिए गए फैसले का कोई कारण नहीं बताया है। हालांकि, जजेस इन्क्वॉयरी कमेटी को लिखे पत्र में उन्होंने अपने को निर्दोष बताने के लिए कई कारण गिनाए हैं। 13 पन्नों का एक विस्तृत पत्र लिखकर जजेस इंक्वायरी प्रोसीडिंग्स से उन्होंने तुरंत अपना नाम वापस ले लिया। इसमें उन्होंने 2025 में अपने सरकारी आवास (30 तुगलक क्रेसेंट, नई दिल्ली) के स्टोररूम में लगी आग और उसके बाद ‘कैश’ मिलने की घटना को पूरी तरह से खारिज करते हुए कहा कि पूरी प्रक्रिया अनुचित, पक्षपाती और संवैधानिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ रही।
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छुट्टी पर होने का दावा
जस्टिस वर्मा, जो 2021 से दिल्ली हाई कोर्ट के जज थे और 13 साल से ज्यादा की न्यायिक सेवा का रिकॉर्ड रखते थे, ने लिखा कि वे हाई कोर्ट की होली ब्रेक पर छुट्टी पर थे जब 12-13 मार्च 2025 को स्टोररूम में आग लगी। आग बुझाने वाले दमकल और पुलिस कर्मियों ने कुछ वीडियो रिकॉर्ड किए, जिनमें कैश दिखाई दिया। मीडिया और सोशल मीडिया पर इसे ‘जज के घर का काला धन’ बताकर भारी हंगामा मचा दिया गया। लेकिन जस्टिस वर्मा का कहना है कि स्टोररूम उनके परिवार के रहने वाले हिस्से से पूरी तरह अलग, अनलॉक और स्टाफ, मैन्टेनेंस व अन्य लोगों द्वारा इस्तेमाल होने वाला कमरा था। वह घटना के समय दूर छुट्टी पर थे, मोबाइल कनेक्टिविटी भी नहीं थी और उन्हें आग या कैश की कोई जानकारी नहीं थी।
गवाहों को ड्रॉप करने का आरोप
पत्र में सबसे ज्यादा जोर उन्होंने न्यायिक जांच की प्रक्रिया पर दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि इन-हाउस कमेटी (IHC) की रिपोर्ट प्रारंभिक और गोपनीय थी, फिर भी उसे सबूत के रूप में इस्तेमाल किया गया। 54 गवाहों में से 27 को बिना वजह छोड़ दिया गया, जिनमें कई ऐसे थे जिनकी गवाही उनके पक्ष में जाती। क्रॉस-एक्जामिनेशन के बाद फेवरेबल गवाहों को अचानक ड्रॉप कर दिया गया। CCTV फुटेज, DVR और फॉरेंसिक रिपोर्ट नहीं दिखाई गईं। बर्डन ऑफ प्रूफ को पलट दिया गया और साबित करने को कहा गया कि कैश उनका नहीं था जबकि अभियोजन पक्ष ने कोई प्रथम दृष्टया केस भी नहीं बनाया। तीनों चार्जेस (कैश रखना, सबूत से छेड़छाड़ और असहयोग) को उन्होंने बिना सबूत के, सिर्फ अनुमानों पर आधारित बताया।
जस्टिस वर्मा ने लिखा कि ऐसी प्रक्रिया जारी रखना खुद को और न्यायपालिका को धोखा देना होगा। इसलिए उन्होंने ‘सबसे गहरी निराशा और दुख’ के साथ प्रोसीडिंग्स से हटने का फैसला लिया। उनका पत्र न सिर्फ अपनी सफाई है, बल्कि हाई कोर्ट के जज के साथ हुई ‘अन्याय’ की कहानी भी है, जो भविष्य में न्यायिक जवाबदेही की प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है। यह 13 पन्नों का दस्तावेज आज पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया है।
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जस्टिस यशवंत वर्मा के पत्र की 10 बड़ी बातें:
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स्टोररूम उनके नियंत्रण में नहीं था: जस्टिस वर्मा ने स्पष्ट किया कि स्टोररूम आवास के रहने वाले हिस्से से अलग, बैक गेट से जुड़ा, अनलॉक और स्टाफ, मैन्टेनेंस, गार्डनर्स आदि द्वारा इस्तेमाल होने वाला कमरा था। CCTV भी उनके नियंत्रण के बाहर था।
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घटना के समय वे छुट्टी पर थे: 12 मार्च 2025 को वे पत्नी के साथ हिल स्टेशन पर छुट्टी पर थे। सीमित मोबाइल कनेक्टिविटी के कारण उन्हें आग की सूचना 15 मार्च सुबह 1:00-1:15 बजे तक नहीं मिली।
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कैश के बारे में उन्हें जानकारी नहीं थी: कोई सबूत नहीं कि कैश उन्होंने रखा था या उनके परिवार को पता था। उन्होंने इसे ‘अनुमान’ पर आधारित आरोप बताया।
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54 गवाहों में से 27 को बिना वजह ड्रॉप किया गया: कई गवाह जिनकी गवाही उनके पक्ष में थी या जो पुलिस-दमकल अधिकारियों के फैसलों को उजागर करती थी, उन्हें अचानक हटा दिया गया।
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क्रॉस-एक्जामिनेशन के बाद फेवरेबल गवाहों को हटाया गया: दमकल, पुलिस और PSO (पर्सनल सिक्योरिटी ऑफिसर) गवाहों को क्रॉस-एक्जामिनेशन में कमजोर पाए जाने के बाद ड्रॉप कर दिया गया।
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बर्डन ऑफ प्रूफ: सामान्य कानून के विपरीत उन्हें 'कैश कहां से आया' साबित करने को कहा गया जबकि अभियोजन पक्ष ने कोई ठोस सबूत नहीं दिया।
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CCTV, DVR और फॉरेंसिक रिपोर्ट गायब: कोई CCTV फुटेज पेश नहीं की गई। DVR तक ऐक्सेस नहीं दी गई और फॉरेंसिक जांच भी अधूरी रही।
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तीनों चार्जेस बिना सबूत के: चार्ज-1 (कैश रखना), चार्ज-2 (सबूत से छेड़छाड़) और चार्ज-3 (असहयोग) सभी को उन्होंने 'अनुमानों' पर आधारित बताया।
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इन-हाउस कमेटी की रिपोर्ट का दुरुपयोग: प्रारंभिक और गोपनीय रिपोर्ट को सबूत मान लिया गया, जबकि गवाहों को क्रॉस-एक्जामाइन करने का मौका नहीं दिया गया।
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अन्याय की प्रक्रिया को वैधता नहीं देना चाहते: उन्होंने लिखा कि ऐसी पक्षपाती प्रक्रिया जारी रखना न्यायपालिका के लिए घातक होगा, इसलिए 'सबसे गहरी निराशा' के साथ प्रोसीडिंग्स से हट रहे हैं।
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