जिन देशों में हुआ 'रिजीम चेंज', वहां बदला क्या, मोहन भागवत का बयान कितना सही?
राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि रिजीम चेंज से कुछ नहीं बदलता है, यह पश्चिम की हवा है जिसमें कई देश जल रहे हैं। क्या वाकई ऐसा है, पढ़ें।

अर्जेंटीना में रिजीम चेंज के बाद स्थिर सरकार आई थी। Photo Credit: PTT
राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने मंगलवार को विजयादशमी के अपने वार्षिक भाषण में हाल के चुनाव आयोग विरोधी प्रदर्शनों और सरकार बदलने की बातों पर कहा है कि रिजीम चेंज से कुछ नहीं बदलता है। उन्होंने फ्रांस, अल्बानिया, बांग्लादेश और नेपाल में हुई हिंसा और अशांति का जिक्र करते हुए कहा कि भारत में भी ऐसे प्रयास हो रहे हैं। लेकिन उन्होंने साफ कहा कि भारत में सरकार बदलने की कोशिशें कामयाब नहीं होंगी।
मोहन भागवत ने कहा कि पश्चिम में एक तूफान आया है। फ्रांस, बांग्लादेश और नेपाल में जो हुआ उसे देखिए। भारत में भी ऐसी कोशिशें जारी हैं, लेकिन यहां सरकार नहीं बदलेगी। भारत अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ आगे बढ़ रहा है और समाज की सामूहिक ताकत बढ़ी है। उन्होंने जोर दिया कि समस्याएं आती हैं और आंदोलन भी होते हैं, लेकिन इनका मकसद समाधान ढूंढना होना चाहिए, न कि दुश्मनी फैलाना। मर्यादा का ध्यान रखना जरूरी है।
मोहन भागवत ने कहा कि आंदोलन सिर्फ वोट या सस्ती लोकप्रियता के लिए नहीं होने चाहिए। सिर्फ आंदोलन से समाधान नहीं निकलते, असली समाधान समाज में बातचीत और संवाद से निकलते हैं। भागवत ने चेतावनी दी कि कुछ ताकतें पीड़ित होने का भाव पैदा करके असंतोष और अराजकता फैलाने की कोशिश कर रही हैं। इनसे सावधान रहना चाहिए ताकि भ्रम और फूट न फैले।
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क्या रिजीम चेंज से कुछ बदल सका है?
पिछले दो दशकों में दुनिया के कई देशों में लंबे समय से सत्ता में जमे तानाशाह और निरंकुश शासक या तो जनविद्रोह के चलते हटे या बाहरी हस्तक्षेप से हटाए गए। सत्ता परिवर्तन के बाद भी जमीनी हालात, बहुत ज्यादा नहीं बदले। ज्यादातर देशों में मुश्किलें जस की तस हैं। सीरिया, लीबिया, मिस्र, इराक, सूडान, वेनेजुएला, यमन, ट्यूनीशिया, अफगानिस्तान और हैती जैसे देशों में आज भी राजनीतिक अस्थिरता, संघर्ष और मानवीय संकट वैसे ही था, जैसे रिजीम चेंज होने से पहले था।
सीरिया में रिजीम चेंज से कुछ बदल पाया?
सीरिया में बहुसंख्यक तबका सुन्नी था। बशर अल-असर शिया समुदाय से थे। बशर अल-असद के सत्ता से हटने के बाद देश में अहमद अल-शरा की अंतरिम अगुवाई में हालात बहुत नहीं सुधरे हैं। यूरोपियन यूनियन एजेंसी फॉर असाइलम (EUAA) का कहना है कि नए रिजीम का शासन ज्यादातर जमीन पर है लेकिन ड्रूज बहुल स्वेदा क्षेत्र अब भी काफी हद तक केंद्रीय नियंत्रण से बाहर है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध हटने के बावजूद आर्थिक संकट गहरा बना हुआ है। संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि देश में 1.65 करोड़ से अधिक लोगों को तत्काल मानवीय सहायता की दरकार है। जून 2026 में नई संसद का पहला सत्र आयोजित किया गया था। देश में कुछ भी क्रांतिकारी स्तर पर नहीं बदला।
लीबिया, रिजीम चेंज की वजह से पनपा गृहयुद्ध?
कर्नल मुअम्मर गद्दाफी के पतन के बाद से लीबिया आंतरिक विभाजन से उबर नहीं सका है। त्रिपोली में अब्दुल हामिद दबीबा के नेतृत्व वाली संयुक्त राष्ट्र समर्थित सरकार और पूर्व में खलीफा हफ्तर समर्थित समानांतर प्रशासन के बीच देश बंटा हुआ है। जून 2026 में दोनों गुटों के बीच सत्ता-साझेदारी को लेकर वार्ता और सहमति के संकेत मिले हैं, लेकिन स्थायी समाधान अब भी दूर है।
मिस्र बदहाली से कभी उबर पाएगा?
राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी के नेतृत्व में मिस्र गंभीर आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है। देश ने करीब 57 अरब डॉलर के अंतरराष्ट्रीय बेलआउट समझौते किए हैं, फिर भी महंगाई और कर्ज का दबाव कायम है। वहीं, 'ह्यूमन राइट्स वॉच' जैसी मानवाधिकार संस्थाओं का कहना है कि राजनीतिक विरोधियों और असहमति की आवाजों को दबाने का सिलसिला जारी है।
इराक का हाल क्या है?
लंबे राजनीतिक गतिरोध के बाद मई 2026 में कारोबारी अली अल-जैदी प्रधानमंत्री बने। देश में शुरुआती सुधार दिखा है लेकिन राजनीतिक स्थिरता की अभी कमी है। सरकार ने भ्रष्टाचार विरोधी अभियानों को प्राथमिकता दी है और अमेरिका और ईरान दोनों के साथ संतुलित कूटनीति बनाए रखने की दिशा में काम कर रही है। अल-जैदी ने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से रिश्ते सुधार रही है। इराक में ईरान समर्थित कई सशस्त्र समूह मौजूद हैं, जिनकी वजह से देश आलोचना के केंद्र में रहता है।
सूडान न संभला है, न संभल सकता है
अप्रैल 2023 से सेना प्रमुख जनरल अब्देल फतह अल-बुरहान और अर्धसैनिक बल रैपिड सपोर्ट फोर्सेज के बीच जारी गृहयुद्ध थमने का नाम नहीं ले रहा है। 6 अक्टूबर को सेना प्रमुख ने किसी भी तरह की सुलह वार्ता से इनकार कर दिया। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, इस संघर्ष में अब तक हजारों लोगों की जान जा चुकी है और 1.5 करोड़ से अधिक लोग विस्थापित हो चुके हैं।
वेनेजुएला को अमेरिका ही स्थिर नहीं रहने देगा
जनवरी 2026 में अमेरिका ने वेनेजुएला की संप्रभुता को ताक पर रखते हुए निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को हिरासत में लेकर किडनैप कर लिया। निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी वहां की जेल में बंद हैं। कराकस में डेल्सी रोड्रिगेज ने कार्यवाहक राष्ट्रपति का कार्यभार संभाला है। अमेरिका के इशारे पर चल रहीं हैं। राजनीतिक उथल-पुथल मची है। अमेरिका ने वहां के तेल संसाधनों पर कब्जा किया है। अमेरिका चाहता है कि यहां के तेल को रिफाइन करके, दुनिया में बेचा जाए। वेनेजुएला को सुधारने नहीं, वेनेजुएला को तबाह करने की कोशिश हो रही है।
यमन, यहां कभी हालात नहीं बदल सकते हैं
यमन में कई गुट हैं, यह देश गृहयुद्ध से जूझ रहा है। दिसंबर 2025 में संयुक्त अरब ईरान समर्थित दक्षिणी ट्रांजिशनल काउंसिल ने दक्षिणी यमन में हमला बोलकर हद्रमौत, अल-महरा और पुराने दक्षिण यमन के ज्यादातर इलाकों पर कब्जा कर लिया है। सेयुन, तरिम और मुकल्ला जैसे शहरों पर इसी गुट का कब्जा है। सऊदी अरब ने इसका विरोध किया और हवाई हमले किए, जिसके बाद यमनी सरकार ने यूएई सेना को बाहर निकलने का आदेश दिया और यूएई ने अपनी सेना वापस बुला ली।
जनवरी 2026 में सऊदी समर्थन वाली यमन सरकार की सेना ने पलटवार किया। जल्दी ही खोए इलाके वापस लिए, मुकल्ला और सेयुन छुड़ाए और 7 जनवरी को एसटीसी की राजधानी अदन में घुस गई। एसटीसी नेता ऐदारुस अल-जुबैदी भागकर यूएई चले गए, उन पर देशद्रोह का आरोप लगा और 9 जनवरी को एसटीसी ने खुद को भंग कर दिया।
यमन में जुलाई 2026 से संघर्ष में तेजी दर्ज की गई है। अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन (IOM) के आंकड़ों के मुताबिक, 1 अगस्त से 12 अक्टूबर के बीच 2.17 लाख से अधिक लोग बेघर हुए, जिनमें सबसे अधिक प्रभावित ताइज क्षेत्र रहा। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट बताती है कि देश में 2.2 करोड़ लोगों को मानवीय सहायता की जरूरत है, जबकि 1.8 करोड़ लोग गंभीर खाद्य संकट का सामना कर रहे हैं।
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ट्यूनीशिया: कभी लोकतंत्र की मिसाल, अब सवालों के घेरे में
'अरब स्प्रिंग' की इकलौती सफलता ट्यूनीशिया को लोग मानते हैं। यह देश अब राजनीतिक संकट के केंद्र में है। राष्ट्रपति कैस सईद ने संसद भंग कर दिया है। सत्ता का केंद्रीकरण है और लोकतांत्रिक संस्थाओं के पतन हो चुका है। राष्ट्रपति कैस सईद ने 2021 में संसद को भंग करने और 2022 में नए संविधान को लागू करने के बाद लगभग सभी कार्यकारी, विधायी और न्यायिक शक्तियां अपने हाथों में ले ली हैं। अक्टूबर 2024 के राष्ट्रपति चुनावों में प्रमुख विपक्षी नेताओं, कार्यकर्ताओं और पत्रकारों की जेलबंदी या अयोग्यता के बीच सईद ने दोबारा जीत हासिल की। विपक्ष और मानवाधिकार संगठन उन पर 2011 की 'अरब स्प्रिंग' से हासिल लोकतांत्रिक उपलब्धियों को समाप्त करने और तानाशाही थोपने का आरोप लगाते हैं। यह देश गंभीर आर्थिक संकट, बढ़ती मुद्रास्फीति और बेरोजगारी से जूझ रहा है। साल 2026 में यहां व्यापक प्रदर्शन हुए थे।
अफगानिस्तान, कबीलाई दौर में पहुंच चुका है यह देश
दुनिया वक्त के साथ आगे जाती है, अफगानिस्तान सैकड़ों साल पीछे चला गया है। तालिबान सरकार ने महिलाओं की पढ़ाई लिखाई पर प्रतिबंध लगाया, उनकी नौकरी पर प्रतिबंध लगाया। अगस्त 2021 में काबुल पर तालिबान के नियंत्रण के बाद से देश गंभीर आर्थिक व मानवीय संकट में है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, देश की 45 प्रतिशत आबादी मानवीय मदद पर निर्भर है। वहां का समर्थ तबका कबका भाग गया है। महिलाएं कबीलाई युग में पहुंच गईं हैं।
हैती का बुरा हाल, हालात संभल नहीं सकेंगे?
साल 2021 में राष्ट्रपति जोवेनेल मोइज की हत्या के बाद से देश में कोई निर्वाचित राष्ट्रपति या संसद नहीं है। राजधानी पोर्ट-ऑ-प्रिंस के लगभग 85 से 90 प्रतिशत हिस्से पर सशस्त्र आपराधिक गिरोहों का नियंत्रण है। नागरिक प्रशासन, पुलिस और सार्वजनिक व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है। व्यवस्था बहाल करने और निष्पक्ष चुनाव कराने के मकसद से बनाए गए संक्रमणकालीन राष्ट्रपति परिषद के बीच राजनीतिक मतभेद और प्रशासनिक टकराव की स्थिति है। देश में चुनावों की कोई तस्वीर साफ नहीं है।
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