हर बार रिजीम चेंज का दावा कर रहे ट्रंप, 4 दशक से हो क्यों नहीं पाया?
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बार-बार दावा कर रहे हैं कि ईरान में रिजीम बदल गया है। उनके इस बयान का हकीकत से दूर-दूर तक लेना-देना नहीं है। ईरान में 4 दशक से एक ही रिजीम है।

शिया मुस्लिम, ईरान के आयतुल्ला को अपना सर्वोच्च धार्मिक नेता मानते हैं। Photo Credit: PTI
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश पर अमेरिकी सेना ने 28 फरवरी को ईरान की राजधानी तेहरान में सुप्रीम लीडर आयतुल्ला अली खामेनेई के आवास पर हमला किया। हमले में अली खामेनेई की मौत हो गई। उनके साथ इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के जवान और कई अन्य नेता मारे गए। खामेनेई परिवार के भी कुछ सदस्य मारे गए। अमेरिका ने दावा किया कि रिजीम चेंज हो गया है। क्या ऐसा हुआ?
अमेरिका 4 दशक से चाह रहा है कि ईरान में रिजीम बदल जाए। अमेरिका चाहता है कि इस्लामिक सत्ता व्यवस्था की जगह, उदार शासन व्यवस्था ईरान में आए और 80 के दशक से पहले जैसे ईरान के साथ दुनिया के संबंध हों, ठीक वैसे ही संबंध नए दौर में भी हो। ईरान में इस्लामिक शासन है, जिसकी हिफाजत IRGC के हवाले है। अमेरिका के चाहने के बाद भी, आयतुल्ला अली खामनेई के मरने के बाद भी इस्लामिक क्रांति न तो कमजोर पड़ी, नहीं संगठन बिखरने पाया।
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4 दशक से ईरान में क्यों नहीं पाया सत्ता परिवर्तन?
डोनाल्ड ट्रंप, राष्ट्रपति, अमेरिका:-
ईरान के नए रिजीम के राष्ट्रपति, अपने पूर्ववर्ती शासकों से ज्यादा बुद्धिमान और कम कट्टर हैं। उन्होंने अमेरिका के साथ सीजफायर की मांग की है। हम इसे तब मानेंगे जब होर्मुज स्ट्रेट खुल जाएगा, आजाद होगा और साफ होगा। तब तक, हम ईरान को गुमनामी में भेज देंगे या पाषाण काल में पहुंचा देंगे।'
डोनाल्ड ट्रंप का दावा झूठा क्यों है?
ऐसा पहली बार नहीं है, जब डोनाल्ड ट्रंप ने ऐसा दावा किया है। डोनाल्ड ट्रंप, बार-बार ईरान पर झूठ बोल रहे हैं। कभी वह कह रहे हैं कि ईरान की पूरी मिसाइल क्षमता तबाह हो चुकी है, कभी वह कहते हैं कि ईरान की सत्ता व्यवस्था बदल चुकी है। सच्चाई यह है कि आज भी ईरान के सुप्रीम लीडर, मोजतबा खामेनेई हैं, जो अली खामेनेई के बेटे हैं। ईरान, इजरायल और अमेरिका के साथ कई मोर्चों पर जंग लड़ रहा है। अमेरिकी सैन्य बेस खाड़ी के देशों में बुरी तरह तबाह हुए हैं। ट्रंप के दावों को भी बार-बार ईरान खारिज कर रहा है।
इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प (IRGC) के प्रवक्ता इब्राहिम जोल्फागरी ने ट्रंप का मजाक उड़ाते हुए कहा था, 'हे ट्रंप, आपको बाहर निकाला जाता है। आप ऐसे शब्दों के लिए अभ्यस्त है। आपका शुक्रिया, इस तथ्य पर ध्यान देने के लिए।'
इब्राहिम जोल्फागरी, प्रवक्ता, IRGC:-
जिस रणनीतिक ताकत के बारे में आप बात करते हैं, वह फेल हो चुकी है। वह जो खुद को दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बताते हैं, अगर वह पहले ही ऐसा कर सकता तो संकट से बाहर निकल चुका होगा। अपनी हार को समझौतों का नाम मत दो। आपके खोखले वादों का दौर बीत चुका है।
ईरान में नहीं कमजोर पड़ा 'आयतुल्ला' रिजीम
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भले ही कितना दावा कर रहे हों कि अब ईरान कमजोर पड़ चुका है, ईरान, बार-बार उनके दावों को गलत साबित कर रहा है। उनका दावा है कि ईरान के शांत और समझदार नेताओं से युद्ध खत्म करने को लेकर बातचीत चल रही है लेकिन ईरान इसे एक सिरे से खारिज कर रहा है।
ईरान में अब असली ताकत IRGC के हाथ में है। यह देश की सेना से अलग, बहुत ताकतवर पैरामिलिट्री फोर्स है, जो अब सारी जिम्मेदारी संभाल रहा है। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन अब पूरी तरह से दरकिनार कर दिए गए हैं। उनका विरोध बढ़ता जा रहा है। IRGC अब देश के महत्वपूर्ण फैसले खुद ले रही है।
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मोजतबा बेहोश, फिर कैसे चल रही जंग?
सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनी युद्ध के पहले दिन अमेरिका-इजराइल के हमलों में मारे गए थे। उसके बाद उनके बेटे मोजतबा खामेनेई को सुप्रीम लीडर बना दिया गया। मोजतबा युद्ध शुरू होने के बाद से न दिखे हैं और न ही उनकी कोई आवाज आई है। सिर्फ उनके नाम के मैसेज टीवी पर पढ़े जा रहे हैं। अफवाहें हैं कि मोजतबा या तो मर चुके हैं या कोमा में हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि उनकी हालत बहुत गंभीर है, जबकि अमेरिकी रक्षा मंत्री ने दावा किया कि वे गंभीर रूप से जख्मी हैं।
कौन कर रहा है इस्लामिक रिजीम की हिफाजत?
IRGC ने अब मोजतबा खामेनेई के चारों ओर सख्त सुरक्षा घेरा बना रखा है। राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन कई बार उनसे मिलने की कोशिश कर चुके हैं, लेकिन IRGC उन्हें इजाजत नहीं दे रही है। IRGC ने राष्ट्रपति के मंत्रियों की नियुक्तियां भी रोक दी हैं। मसूद पेजेश्कियन ने इंटेलिजेंस मिनिस्टर बनाने की कोशिश की थी लेकिन IRGC चीफ अहमद वाहिदी ने इसे रोक दिया। मेजर-जनरल मोहम्मद पाकपुर की मौत के वह नए कमांडर बने थे। मसूद पेजेश्कियन का कहना है कि ईरान की अर्थव्यवस्था पड़ोसियों से हुई दुश्मनी की वजह से डूब जाएगी, उनकी बात IRGC सुन नहीं रही है। IRGC ही इस्लामिक रिजीम की सुरक्षा में तैनात है।
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क्यों 4 दशक से नहीं बदल पाया इस्लामिक रीजीम? 5 वजहें हैं जिम्मेदार
- IRGC: ईरानी इस्लामिक रिजीम की सबसे बड़ी ताकत, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ही है। ईरान के पास साजमान-ए बासिज-ए मोस्तजफिन (बसीज) भी है। यह IRGC का अनुषांगिक संगठन है। ईरान में जब भी सत्ता परिवर्तन के लिए मांग होती है, दोनों संगठन बुरी तरह से विद्रोह दबाते है। दिसंबर 2025 में भड़का आंदोलन इसका गवाह रहा है, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए। दोनों संगठन, सिर्फ सुप्रीम लीडर के प्रति जवाबदेह हैं। ईरान में सत्ता के स्थिर रहने की एक वजह यह भी है।
- विलायत-ए-फकीह: ईरान, गणराज्य तो है लेकिन लोकतांत्रिक देश नहीं है। ईरान में अंतिम निर्णय लेने का अधिकार सिर्फ सुप्रीम लीडर के पास है। ईरान की राजनीतिक व्यवस्था 'विलायत-ए-फकीह' को मानती है। यहां अंतिम और बड़ा फैसला, सर्वोच्च धार्मिक नेता के पास ही है। निर्वाचित राष्ट्रपति या संसद के ऊपर 'गार्जियन काउंसिल' जैसी संस्थाएं हैं। केवल उन्हें ही चुनाव में उतरने की इजाजत है, जो शासन के प्रति वादार हों।
- कमजोर विपक्ष: ईरान में सत्ता विरोधी लहर दबा दी जाती है। विपक्ष के पास अपने आंदोलन को जीवित रख पाने के लिए मजबूत अर्थव्यवस्था भी नहीं है। ईरान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से तेल और गैस के निर्याट पर टिकी है। सीधा लाभ बड़े व्यापारियों और सरकारी संगठनों को मिलता है, विपक्ष हाथ मलता रह जाता है। दुनियाभर के आर्थिक प्रतिबंध इस देश पर लागू हैं, इसलिए व्यापार के दायरे भी सीमित हैं।
- अल्पसंख्यक सुधारवादी: ईरान में सुधारवादी नेताओं को या तो जेल भेजा गया है या उन्हें देश निकाला दे दिया गया है। दशकों से चले दमन की वजह से ईरान के भीतर कोई एक ऐसा प्रभावशाली नेता या संगठित विपक्षी दल पैदा ही नहीं हो पाया। पहले 1979 में रूहुल्लाह खुमैनी ने शासन संभाला फिर अली खामेनेई ने 1989 से सत्ता संभाला, अब मोजतबा खामेनई संभाल रहे हैं। कोई एक नेता 4 दशक में तैयार नहीं हो सका जो इन्हें चुनौती दे पाए। जब-जब कोई विद्रोही स्वर उठता है उसे या तो खत्म कर दिया जाता है या गद्दार करार देकर जेल में ठूंस दिया जाता है।
- धर्म: ईरान एक शिया बहुसंख्यक देश है। जब अली खामेनेई की मौत हुई, भारत तक में शिया मतावलंबी सड़कों पर उतरे। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, लाखों शिया मुस्लिमों ने अली खामेनेई की मौत के विरोध प्रदर्शन किया। अली खामेनेई का रुख भारत विरोधी रहा है, वह कश्मीर जैसे अहम मुद्दे पर देश के खिलाफ बयानबाजी कर चुके हैं, फिर भी शिया उन्हें पूजते हैं। अगर उनके प्रति भारत में इस इस कदर समर्थन है तो ईरान की कल्पना काजिए। ईरान की बड़ी आबादी न क्रांति के पक्ष में है, न ही सत्ता परिवर्तन के। ईरान के लोग, आज भी 'आयतुल्ला' को अपनी पहचान और संस्कृति का संरक्षक मानते हैं। ऐसे में ईरान में सत्ता परिवर्तन के दावे ही किए जा सकते हैं, जब तक, ईरान में यह व्यवस्था रहती है, ईरान में सत्ता परिवर्तन मुश्किल है।
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