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डेटा ही नहीं तो लगाम कैसे? रिजेक्ट होते बीमा क्लेम पर IRDAI के पास जवाब नहीं

इंश्योरेंस कंपनियां महंगा प्रीमियम तो लेती हैं लेकिन क्लेम खारिज करने से गुरेज भी नहीं करती हैं। ऐसा क्यों है, इसका राज, संसद के एक सवाल के जवाब में छिपा है।

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बीमा। Photo Credit: AI इमेज। Photo Credit: ChaGPT

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स्वास्थ्य बीमा कंपनियां कई बार बीमा धारकों से महंगे प्रीमियम पर पैसे ऐंठने के बाद मरीजों के इलाज का खर्च कराने से मुकर जाती हैं। एक-दो नहीं, हर साल सैकड़ों ऐसे मामले आते हैं, जब पीड़ित शिकायत करते हैं कि इंश्योरेंस प्लान होने के बाद भी उनके हॉस्पिटल चार्ज का खर्च उठाने से कंपनियों ने मना कर दिया। मुद्दे पर विवाद इतना बढ़ चुका है कि संसद में भी अब जन प्रतिनिधि सवाल कर रहे हैं। 

लोकसभा सांसद देवेश शाक्य ने संसद में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय से सवाल पूछा था कि क्या सरकार जानती है कि प्राइवेट स्वास्थ्य बीमा कंपनियां डॉक्टरों की ओर से सलाह दिए गए हॉस्पिटल एडमिशन के क्लेम को अक्सर 'इलाज की जरूरत नहीं' या 'पॉलिसी में शामिल नहीं' जैसे कारणों से खारिज कर देती हैं। इससे मरीजों के इलाज पर असर पड़ता है।

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3 सवाल, जिनका जवाब गोलमोल है 

क्या सरकार को इस बात की जानकारी है कि प्राइवेट स्वास्थ्य बीमा कंपनियां स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की सलाह पर अस्पताल में भर्ती होने के क्लेम को 'नॉन मेडिकल नेसेसिसटी' या शर्तों से बाहर होने जैसे आधारों पर खारिज कर रही हैं, जिससे मरीजों के इलाज पर बुरा असर पड़ रहा है।

क्या इंश्योरेंस कंपनियों को क्लिनिकल, मेडिकल फैसलों में दखल देने से रोकने के लिए कोई राष्ट्रीय मानक गाइडलाइन या मेडिकल ऑडिट सिस्टम प्रस्तावित है। 


क्या सरकार, इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (IRDAI) और हेल्थ सेक्टर के रेगुलेटर के साथ मिलकर, इलाज करने वाले डॉक्टर के क्लिनिकल फैसले को प्राथमिकता देने के लिए किसी अनिवार्य पॉलिसी पर विचार कर रही है? पिछले तीन वर्षों के दौरान, कंपनी-वार, मिले मेडिकल क्लेम आवेदनों और 'नॉन मेडिकल नेसेसिसटी' या 'एक्सक्लूजन' के आधार पर खारिज किए गए दावों का विवरण क्या है?

नॉन मेडिकल नेसेसिटी' और एक्सक्लूजन क्या है?

अब पहले 'नॉन मेडिकल नेसेसिटी' और एक्सक्लूजन को समझते हैं। बीमा कंपनियां सिर्फ इलाज का खर्च उठाती है, न कि इलाज से इतर की चीजों पर खर्च होने वाले रकम को कवर करती हैं। अगर कोई मरीज, अस्पताल में भर्ती है तो दस्ताने, टिश्य जैसे सामानों को अगर पॉलिसी में 'नॉन मेडिकल आइटम' का दर्जा मिला है तो उसका खर्च बीमा कंपनी नहीं उठाएगी।  

स्वास्थ्य बीमा में एक्स्लूजन का मतलब है जो बीमारियां, इलाज, मेडिकल कंडीशन या खर्च जो आपकी पॉलिसी में कवर नहीं होते। ऐसे मामले में बीमा कंपनी क्लेम नहीं देती, और खर्च आपको खुद उठाना पड़ता है। जैसे कई बीमा पॉलिसी में साफ तौर पर लिखा होता है कि प्लास्टिक सर्जरी या दांतों से जुड़े इलाज को कंपनी कवर नहीं करेगा। 

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स्वास्थ्य मंत्रालय के पास इन सवालों का जवाब क्या है?

स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने बताया, 'इंश्योरेंस कंपनियां हर क्लेम को पॉलिसी के नियमों, मरीज के मेडिकल रिकॉर्ड, डॉक्टर की राय और स्टैंडर्ड ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल के आधार पर देखती हैं।' सरकार ने साफ कहा है कि इंश्योरेंस रेगुलेटरी अथॉरिटी (IRDAI) फिलहाल कोई नया नियम बनाने की योजना नहीं बना रही है, जिसमें डॉक्टर की क्लिनिकल राय को सबसे ऊपर माना जाए। कंपनियां अभी भी अपना फैसला खुद ले सकेंगी।

क्या सरकार के पास क्लेम खारिज होने के आंकड़े हैं?

सरकार ने कहा है कि IRDAI कुल क्लेम खारिज होने का डेटा तो रखती है, लेकिन 'नॉन मेडिकल नेसेसिसटी' या 'एक्सक्लूजन' जैसे खास कारणों का अलग से रिकॉर्ड नहीं रखती। तीन साल में कंपनी-वार कितने क्लेम इन्हीं वजहों से रद्द हुए, इसका ब्योरा उपलब्ध नहीं है।

क्या सरकार इसमें सुधार करेगी?

सरकार ने साफ तौर पर कहा है कि कंपनियां अपने पॉलिसी के हिसाब से फैसला लेंगी, और डॉक्टर की राय को प्राथमिकता देने का कोई नया नियम अभी नहीं लाया जाएगा।

क्यों खलती है आंकड़े न होने की बात?

IRDAI और सरकार का मानना है कि उनके पास 'नॉन मेडिकल नेसेसिटी' और एक्सक्लूजन के आधार पर खारिज हुए बीमा के दावों का अलग से डेटा ही नहीं है। अब जिस संस्था को बीमा धारक के हितों की निगरानी करनी है, उसके पास यह जानने के लिए कोई विभाग ही नहीं है कि कितने मरीज इन आधारों पर ठुकराए जा सकते हैं। 

 

सरकार ने साफ कहा कि इलाज करने वाले डॉक्टर की क्लिनिकल राय को कोई प्राथमिकता देने का प्रस्ताव भी विचाराधीन नहीं है। अंतिम फैसला इंश्योरेंस कंपनी को ही करना तो वे अपने हितों के हिसाब फैसले कर लेते हैं। भले ही भले डॉक्टर ने अस्पताल में भर्ती की सलाह क्यों न दी हो। 

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IRDAI के क्लेम देने और खारिज करने के आंकड़े क्या हैं?

IRDAI ने अपनी सालाना रिपोर्ट 2024-25 में टर्म इंश्योरेंस और स्वास्थ्य बीमा, दोनों के क्लेम सेटलमेंट और रिजेक्शन से जुड़े आकड़ों को बताया है। बस 'नॉन मेडिकल नेसेसिसटी' और 'एक्सक्लूजन' के अलग से आंकड़े नहीं बताए हैं। टर्म और लाइफ इंश्योरेंस में डेथ क्लेम का सेटलमेंट की दर अच्छी रही है। व्यक्तिगत पॉलिसियों में कुल 10.34 लाख क्लेम आए, जिनमें से 97.82 प्रतिशत क्लेम पूरे पैसे देकर निपटाए गए। सिर्फ 1.01 प्रतिशत क्लेम जानकारी छुपाने के आधार पर धारा 45 के तहत रिपुडिएट किए गए, जबकि 0.66 प्रतिशत क्लेम पॉलिसी शर्तों के कारण रिजेक्ट हुए। 

ग्रुप पॉलसी में 99.68 क्लेम का निपटारा

ग्रुप पॉलिसियों में स्थिति और बेहतर रही, जहां 16.33 लाख क्लेम में से 99.68 प्रतिशत क्लेम सफलतापूर्वक सेटल हो गए और खारिज होने की दर नगण्य रही।स्वास्थ्य बीमा की बात करें तो जनरल और स्वास्थ्य बीमा कंपनियों में कुल 3.72 करोड़ क्लेम दर्ज किए गए। इनमें से 87.5 प्रतिशत क्लेम संख्या के आधार पर सेटल कर दिए गए, जबकि राशि के हिसाब से सेटलमेंट दर 71.14 प्रतिशत रही।

 

करीब 7.92 प्रतिशत क्लेम पॉलिसी शर्तों के मुताबिक डिसअलाउड किए गए और 4.58 प्रतिशत क्लेम रिपुडिएट हुए। साल के अंत में लगभग 4.58 प्रतिशत क्लेम लंबित रह गए। औसतन हर हेल्थ क्लेम पर 28,910 रुपये का भुगतान किया गया।लाइफ इंश्योरेंस कंपनियों द्वारा बेचे गए हेल्थ प्रोडक्ट्स में भी क्लेम सेटलमेंट दर अच्छी रही। स्वास्थ्य बीमा प्रोडक्ट्स में 80 प्रतिशत क्लेम सेटल हुए, जबकि हेल्थ राइडर्स में यह दर 98 प्रतिशत तक पहुंच गई। 

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चुनौती क्या है?

लाइफ इंश्योरेंस में क्लेम लगभग 98 प्रतिशत से ज्यादा मामलों में आसानी से मिल रहे हैं, जबकि स्वास्थ्य बीमा में 87 प्रतिशत से अधिक क्लेम सेटल हो रहे हैं। स्वास्थ्य बीमा में अभी भी कुछ क्लेम खारिज या लंबित रहने की समस्या बनी हुई है, जिसके लिए पॉलिसी शर्तों का पालन और सही दस्तावेज जमा करना बहुत जरूरी है। जो मामले एकदम से खारिज होते हैं, उनमें कंपनियां तर्क देती हैं कि पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन हुआ है। रिप्यूडिएटेड या अस्वीकृत क्लेम, वे हैं जो इंश्योरेंस अधिनियम, 1938 की धारा 45 का उल्लंघन करते हैं। यह धारा, तथ्यों के छिपाने से जुड़ी है।  


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