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कॉर्पोरेट हेल्थ इंश्योरेंस ही काफी नहीं, पर्सनल बीमा है जरूरी, समझिए क्यों

नौकरी छोड़ते ही कंपनी का हेल्थ इंश्योरेंस खत्म हो जाता है, जिससे भविष्य में इलाज का पूरा खर्च खुद उठाना पड़ सकता है और नई पॉलिसी लेना भी मुश्किल हो जाता है।

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कॉर्पोरेट हेल्थ इंश्योरेंस, जिसे कंपनी का ग्रुप इंश्योरेंस भी कहते हैं, नौकरी करने वाले लोगों के लिए एक बड़ी सुविधा है। कंपनी इसका सारा खर्चा उठाती है इसलिए कर्मचारियों को इसके लिए पैसे नहीं देने पड़ते। इंश्योरटेक प्लेटफॉर्म प्लम की एक नई रिपोर्ट बताती है कि 59 प्रतिशत कर्मचारी कोई भी अपनी पर्सनल हेल्थ पॉलिसी नहीं रखते हैं। वे पूरी तरह से अपनी कंपनी की पॉलिसी पर ही निर्भर रहते हैं। यह सही नहीं है क्योंकि नौकरी छोड़ने या रिटायर होने पर यह पॉलिसी तुरंत बंद हो जाती है।

 

इस इंश्योरेंस में अस्पताल में भर्ती होने, डॉक्टर की फीस और सर्जरी का खर्च मिलता है। अगर आप 24 घंटे से ज्यादा अस्पताल में भर्ती होते हैं तो कंपनी पूरा बिल भरती है। इसमें भर्ती होने से पहले और छुट्टी मिलने के बाद के भी कुछ दिनों के खर्चे मिल जाते हैं। छोटी बीमारियां, जिनमें अस्पताल में ज्यादा देर नहीं रुकना पड़ता, वे भी इसमें कवर होती हैं। इमरजेंसी में एम्बुलेंस का खर्च भी कंपनी देती है। सबसे बड़ा फायदा यह है कि पुरानी बीमारियां पहले दिन से ही कवर हो जाती हैं। हालांकि, प्लम की रिपोर्ट के मुताबिक, मैटरनिटी यानी प्रसव के कवर में लंबा इंतजार करना पड़ता है, इसलिए 90 प्रतिशत से ज्यादा लोग इसका फायदा नहीं ले पाते हैं।

 

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इस पॉलिसी का फायदा यह है कि पुरानी बीमारियां पहले दिन से कवर हो जाती हैं। कुछ कंपनियां इसमें मैटरनिटी, ओपीडी, दांतों और आंखों का इलाज, और वेलनेस प्रोग्राम जैसी सुविधाएं भी देती हैं। हालांकि, मैटरनिटी कवर में लंबे वेटिंग पीरियड के कारण 90 प्रतिशत से ज्यादा लोग इसका फायदा नहीं ले पाते हैं।  

सरकारी सुरक्षा का ढांचा

एम्प्लॉयीज स्टेट इंश्योरेंस कॉरपोरेशन (ESIC) उन कर्मचारियों के लिए है जिनकी सैलरी 21,000 रुपये महीने तक है। इसमें कंपनी और कर्मचारी दोनों का थोड़ा-थोड़ा पैसा जमा होता है। इसकी कमी यह है कि आप केवल ईएसआईसी के अस्पतालों में ही इलाज करवा सकते हैं, जहां सुविधाएं हर जगह अच्छी नहीं होतीं। सैलरी बढ़ने या नौकरी छूटने पर यह सुरक्षा भी खत्म हो जाती है।

कॉर्पोरेट हेल्थ इंश्योरेंस की लीमीट

यह इंश्योरेंस सिर्फ आपकी नौकरी के साथ जुड़ा है, जो इसकी सबसे बड़ी कमजोरी है। नौकरी छोड़ने के बाद जब आप अपनी पर्सनल पॉलिसी लेने जाते हैं, तो उम्र ज्यादा होने की वजह से आपको महंगा प्रीमियम देना पड़ सकता है। प्लम की रिपोर्ट कहती है कि पिछले छह महीनों में 54 प्रतिशत लोगों को या तो पॉलिसी देने से मना कर दिया गया या उनसे 10 से 50 प्रतिशत तक ज्यादा पैसे मांगे गए क्योंकि उन्हें पहले से डायबिटीज या बीपी जैसी बीमारियां थीं। 

 

यह बहुत चिंता की बात है क्योंकि भारत में 71 प्रतिशत कामकाजी लोग ऐसी ही बीमारियों के जोखिम में हैं। कंपनी का कवर आमतौर पर 3 से 5 लाख रुपये ही होता है, जो बड़े शहरों के इलाज के लिए कम है। नियम भी कंपनी तय करती है, इसलिए पार्टनर बदलने पर इलाज की सुविधाएं बदल सकती हैं। प्लम के मुताबिक, 40 प्रतिशत लोग पर्सनल पॉलिसी तभी खरीदते हैं जब उन्हें कंपनी की पॉलिसी के जरिए क्लेम करने का अनुभव होता है।

 

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सही तरीका क्या है?

कॉर्पोरेट इंश्योरेंस को सिर्फ एक सपोर्ट की तरह रखें। छोटे इलाज के लिए यह ठीक है लेकिन अपने परिवार की सुरक्षा के लिए 10 से 15 लाख रुपये की अपनी पर्सनल पॉलिसी जरूर लें। बड़ी बीमारियों के लिए 50 लाख रुपये से ज्यादा का 'सुपर टॉप-अप' प्लान लेना बहुत सस्ता और अच्छा विकल्प है। प्लम कंपनी 6,000 से ज्यादा कंपनियों के साथ काम करती है और अब बीमारियों को रोकने के लिए डिजिटल तरीके अपना रही है।

 

आपको पर्सनल पॉलिसी जल्दी ले लेनी चाहिए। अभी आप स्वस्थ हैं तो आपको कम पैसों में अच्छी पॉलिसी मिल जाएगी और उसका इंतजार वाला समय भी नौकरी के दौरान ही निकल जाएगा। अगर आपके पास अपनी पर्सनल पॉलिसी होगी, तो नौकरी बदलने या छोड़ने पर भी आपकी सुरक्षा आपके साथ रहेगी और आपको किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

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