आज की तारीख 26 जुलाई है। यह दिन भारत देश के लिए बेहद गर्व का दिन है। आज ही के दिन 1999 में कारगिल युद्ध का समापन हुआ था, जहां भारतीय सैन्य बल ने पाकिस्तानी सेना को करारी शिकस्त दी थी। यह सैन्य संघर्ष तब शुरू हुआ था, जब पाकिस्तान के सैनिकों और घुसपैठियों ने लद्दाख के कारगिल क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद 3 मई 1999 से लेकर 26 जुलाई 1999 तक भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष चला। कारगिल युद्ध में भारत ने जीत हासिल की। इस जीत में न सिर्फ पुरुषों ने अहम योगदान दिया, बल्कि कुछ महिलाओं के साहस, समर्पण और बलिदान की वजह से भी भारत कब्जे वाले क्षेत्रों को वापस हासिल कर पाया।
कारगिल युद्ध में महिला सैनिकों ने बेहद गौरवशाली योगदान दिया, जिन्होंने अपने सराहनीय साहस और सेवा के जरिए इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज करा दिया। जहां एक तरफ गुंजन सक्सेना और श्रीविद्या राजन ने बतौर वायुसेना अधिकारी अपना शौर्य दिखाया, वहीं दूसरी तरफ कप्तान रुचि शर्मा, कप्तान यशिका हटवाल त्यागी और मेजर प्रिया झिंगन ने भारतीय सेना में रहकर पाकिस्तानी सेना को हराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनके अलावा मेजर डॉ. प्राची गर्ग के योगदान को भी भुलाया नहीं जा सकता।
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कारगिल युद्ध में महिलाओं का योगदान
गुंजन सक्सेना
इन्हें 'कारगिल गर्ल' के नाम से भी जाना जाता है। गुंजन सक्सेना भारतीय वायुसेना की जांबाज फ्लाइट लेफ्टिनेंट थीं। जब 1999 में कारगिल युद्ध हो रहा था, तब उनकी तैनाती श्रीनगर में थी। उन्होंने दुश्मनों की गोलीबारी के बीच घायल भारतीय सैनिकों को हेलीकॉप्टर के जरिए सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया। उनके इसी साहस के लिए उन्हें शौर्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
श्रीविद्या राजन
इनकी भी कारगिल युद्ध के दौरान तैनाती की गई थी। बतौर वायुसेना अधिकारी उन्होंने हेलीकॉप्टर के जरिए कई घायल सैनिकों को श्रीनगर के अस्पताल पहुंचाया, जिससे अनेक सैनिकों की जान बच सकी।
मेजर डॉ. प्राची गर्ग
कारगिल युद्ध के दौरान मेजर डॉ. प्राची गर्ग एकमात्र महिला डॉक्टर थीं। उन्होंने युद्ध के दौरान लगभग 200 घायल सैनिकों का इलाज किया और उनकी जान बचाई। मेजर डॉ. प्राची गर्ग वर्ष 1997 में भारतीय सेना में चिकित्सा अधिकारी के तौर पर शामिल हुई थीं।
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कप्तान रुचि शर्मा
ये 1996 में भारतीय सेना की सिग्नल कोर में शामिल हुई थीं। कारगिल युद्ध के दौरान इन्होंने युद्ध क्षेत्र में लड़ रहे सैनिकों को संचार नेटवर्क के जरिए आपस में जोड़े रखा, जिससे सैनिकों के बीच किसी तरह का भ्रम नहीं हुआ।
कप्तान यशिका हटवाल त्यागी
इनके योगदान को भी भुलाया नहीं जा सकता। जब कारगिल युद्ध हो रहा था, तब यशिका गर्भवती थीं। इसके बावजूद उन्होंने अपना कर्तव्य निभाया। कारगिल युद्ध के दौरान वह बतौर सेना अधिकारी युद्ध क्षेत्र में तैनात रहीं।