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पेंशन, बिजली और मुफ्त के वादे हिमाचल प्रदेश को कर रहे कंगाल? CAG ने बताई हकीकत

CAG की रिपोर्ट बता रही है कि पुरानी पेंशन योजना बहाल करने, फ्री बिजली देने और ऐसे ही कई अन्य वादे निभाने के चक्कर हिमाचल प्रदेश की आर्थिक स्थिति हर साल और खराब होती जा रही है।   

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CAG ने दी हिमाचल प्रदेश की रिपोर्ट, Photo Credit: ChatGPT

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अक्सर खबरें आती हैं कि हिमाचल प्रदेश की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। कई बार कर्मचारियों की सैलरी में देरी की खबरें भी आ चुकी हैं। इसी साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी राज्य की आर्थिक स्थिति पर सवाल उठाए थे। अब भारत के नियंत्रक और महालेक्षा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट भी इन बातों की पुष्टि कर रही है। आंकड़े बता रहे हैं कि हिमाचल प्रदेश सरकार की जितनी कमाई है, उससे ज्यादा पैसे वह खर्च करने पड़ रहे हैं। खैर, ऐसी हालत तो देश के सभी 28 राज्यों की है लेकिन हिमाचल प्रदेश का राजकोषीय घाटा अब निर्धारित सीमा से भी ज्यादा हो चुका है।

 

हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने बीते 3 सितंबर को यह रिपोर्ट विधानसभा में पेश की। इस रिपोर्ट में साल 2024-25 के दौरान राज्य की कमाई, खर्च, कर्ज और अन्य वित्तीय गतिविधियों का ब्योरा दिया गया है। CAG की रिपोर्ट बताती है कि देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में हिमाचल प्रदेश की हिस्सेदारी 0.70 प्रतिशत है। हिमाचल प्रदेश के लिए चिंता की बात है कि पिछले पांच साल में इस हिस्सेदारी में कमी है। हालांकि, पिछले साल की तुलना में राज्य की GDP में थोड़ा इजाफा जरूर हुआ है।

 

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CAG का स्पष्ट करना है कि राज्य में जितने राजस्व की कमाई हो रही है उसका 86 प्रतिशत हिस्सा सैलरी, पेंशन और सब्सिडी जैसे कामों पर ही खर्च हो जा रहा है। इसका नतीजा होता है कि विकास के कार्यों और नई योजनाओं के लिए राज्य के पास पैसे ही नहीं बचते। अब राज्य में काम करवाने के लिए हिमाचल प्रदेश को केंद्र सरकार का मुंह देखना पड़ता है, राहत पैकेज मांगने पड़ते हैं या फिर कर्ज लेना पड़ता है।

CAG ने क्या-क्या खामियां पकड़ी हैं?

फिस्कल रेस्पान्सिबिलिटी एंड बजट मैनेजमेंट (FRBM) ऐक्ट 2003 तय करता है कि किसी राज्य का घाटा कितना हो सकता है। इसी कानून के मुताबिक, किसी भी वित्तीय घाटा उस राज्य की GSDP के 3 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होना चाहिए। यानी अगर किसी राज्य की GSDP 100 रुपये है तो राजकोषीय घाटा अधिकतम 103 रुपये होना चाहिए। अब CAG रिपोर्ट के जरिए सामने आया है कि हिमाचल प्रदेश का राजकोषीय घाटा 12,611.05 करोड़ यानी राज्य की GSDP का 5.44 प्रतिशत है। राज्य का राजस्व घाटा 6804.61 करोड़ रुपये है जो कि राज्य की GSDP का 2.94 प्रतिशत है।  

 

राजकोषीय घाटे को ऐसे समझिए कि हिमाचल प्रदेश को साल भर में जितने भी पैसे मिले, उनकी तुलना में 12,611.05 करोड़ रुपये ज्यादा खर्च हुए। यानी कमाई से 5.44 प्रतिशत ज्यादा खर्च हुए। इन पैसों में टैक्स से होने वाली कमाई, केंद्र से मिलने वाला टैक्स और अनुदान और कर्ज के पैसे शामिल हैं। CAG की सलाह है कि कमाई बढ़ाने के लिए हिमाचल प्रदेश को कोशिश करनी और खर्च और कर्ज को कम करने की दिशा में काम करना होगा।

 

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GDP और GSDP के आंकड़े बता रहे हैं कि साल 2015-16 से देश की की GDP में  हिमाचल प्रदेश की हिस्सेदारी हर साल कम ही हुई है। बीजेपी के जयराम ठाकुर की सरकार में राज्य की GSDP की देश की GDP में हिस्सेदारी 0.81 प्रतिशत से घटकर 0.72 तक आ गई। फिर सुखविंदर सिंह सुक्खू की सरकार में यही हिस्सेदारी 0.72 से घटकर 0.70 प्रतिशत तक आ गई है। हालांकि, इसी दौरान राज्य के लोगों की प्रति व्यक्ति आय 2020-21 में 1.73 लाख रुपये से बढ़कर 2024-25 में 2.56 लाख रुपये तक पहुंच गई है।

 

financial condition of himachal pradesh

 

कहां से होती है हिमाचल प्रदेश की कमाई?

साल 2024-25 में हिमाचल प्रदेश को कुल 40,872.35 करोड़ रुपये का राज्य मिला। इसमें 12,772 करोड़ रुपये राज्य के टैक्स से, 10.681.24 करोड़ रुपये टैक्स में केंद्र की ओर से मिले हिस्से से, 3697.50 करोड़ टैक्स के इतर मिलने वाले राज्य से और 13,721.61 करोड़ रुपये अनुदान और अन्य सहायतों से मिले। इसके अलावा, राज्य की पूंजीगत प्राप्तियां कुल 12,795.69 करोड़ रुपये थीं। इसमें से कर्ज पर दिए गए पैसों में से 184.64 करोड़ रुपये प्राप्त हुए। हिमाचल प्रदेश ने इस साल कुल 12,611.05 करोड़ रुपये का कर्ज भी लिया।

 

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इस तरह हिमाचल प्रदेश के बाद कुल 53,668.04 करोड़ रुपये इकट्ठा हुए। इसमें से 47,676.96 करोड़ रुपये राजस्व खर्च में गए। ब्याज के तौर पर ही 6260.93 करोड़ रुपये चुकाने पड़े और पूंजीगत खर्च यानी विकास के कामों पर खर्च सिर्फ 5966.83 करोड़ रुपये का हुआ। 34.25 करोड़ रुपये का कर्ज भी हिमाचल प्रदेश सरकार ने बांटा। इस तरह हिमाचल प्रदेश का राजकोषीय घाटा 12611 करोड़ रुपये हुआ क्योंकि इतने पैसे उसने कर्ज लेकर खर्च किए। वहीं, राजस्व घाटा 6804.61 करोड़ रुपये क्योंकि खुद को मिलने राजस्व यानी 40,872 करोड़ रुपये की तुलना में उसका राजस्व खर्च 47,676.96 करोड़ रुपये का था।     

 

हिमाचल प्रदेश को टैक्स के जरिए स्टेट GST, स्टेट एक्साइज, भू राजस्व, स्टैंप ड्यूटी और अन्य टैक्सों से होती है। वहीं, बिजली, खनन, ब्याज और डिविडेंड आदि से गैर-टैक्स वाला राजस्व मिलता है।   

 

cm sukhu on loan of himachal pradesh

अच्छी कमाई के बावजूद क्यों नहीं बच रहे हैं पैसे?

CAG की रिपोर्ट में ही बताया गया है कि हिमाचल प्रदेश को मिलने वाले राजस्व का 86 प्रतिशत हिस्सा तो सैलरी, पेंशन और सब्सिडी पर ही खर्च हो जा रहा है। सामाजिक सेवा पर खर्च हो रहे पैसों पर कांग्रेस सरकार आने के बाद इजाफा हुआ है। साल 2022-21 में सामाजिक सेवाओं पर 14,580 करोड़ रुपये खर्च हो रहे थे लेकिन 2023-24 में 19066 करोड़ तो 202425 में 19806 करोड़ रुपये खर्च हुए। इसी तरह सामान्य सेवाओं पर हुए 2020-21 में 13,623 करोड़ रुपये खर्च हो रहे थे लेकिन 2024-25 में 20,700 करोड़ रुपये खर्च हुए। यह इजाफा दिखाता है कि राज्य के खर्च में बेतहासा बढ़ोतरी हुई है। इसका सर स्थानीय निकायों को मिलने वाले निकाय और उन्हें दिए जाने वाले कर्ज पर आया है। 2020-21 में जहां निकायों को 329.48 करोड़ रुपये दिए थे, उसकी तुलना में साल 2024-25 में सिर्फ 34.25 करोड़ रुपये ही दिए गए।

 

himachal spending on subsidy

पेंशन, सब्सिडी और सैलरी का खर्च बढ़ा

हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस सरकार ने पुरानी पेंशन योजना लागू कर दी थी जिसके चलते राज्य का खर्च और बढ़ गया। साल 2020-21 में पेंशन पर सिर्फ 6088.39 करोड़ रुपये खर्च हो रहे थे। 2022-23 में इसके लिए 9283.87 करोड़, 2023-24 में 9212.64 करोड़ रुपये और 2024-25 में 9543.85 करोड़ रुपये खर्च हो गए। यानी पांच साल में पेंशन पर होने वाला खर्च लगभग डेढ़ गुना खर्च बढ़ गया।

 

इसी तरह सैलरी और मानदेय पर होने वाले खर्च में भी बढ़ोतरी हुई है। 2020-21 में इस पर 13,411.11 करोड़ रुपये खर्च हो रहे थे। कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद इसमें भी इजाफा हुआ है। 2024-25 में सिर्फ इसी पर 17,461.50 करोड़ रुपये खर्च हो गए।

 

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हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार 125 यूनिट बिजली फ्री देती है। इसका असर यह हुआ है कि बिजली पर दी जाने वाली सब्सिडी पर खर्च पांच साल में लगभग दोगुना हो गया है। 2020-21 में बिजली की सब्सिडी पर कुल 520.45 करोड़  रुपये खर्च हुए थे लेकिन 2024-25 में इसके लिए 942.85 करोड़ रुपये खर्च हुए।

 

हिमाचल सरकार ने छात्रों के लिए फ्री बस सेवा शुरू की थी। इसका असर हुआ कि ट्रांसपोर्ट सब्सिडी पर जहां साल 2022-21 में 171.20 करोड़ रुपये खर्च हुए वहीं 2024-25 में इस पर 542 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ गए। इसका असर खाद्यान्न, कृषि और बागवानी की सब्सिडी में कटौती के रूप में दिखा। फूड सप्लाई की सब्सिडी पांच साल में 239.97 करोड़ से घटकर 179.75 करोड़ रुपये हो गई। इसी तरह कृषि की सब्सिडी 108.18 करोड़ से 66.34 करोड़ और बागवानी की सब्सिडी 111.20 करोड़ से घटकर 99.96 करोड़ हो गई। इसके बावजूद पांच साल में सब्सिडी 1240.63 करोड़ से बढ़कर 1872.20 करोड़ रुपये हो गई। 

 

spending of himachal pradesh

 

इन आंकड़ों को देखते हुए CAG ने राज्य को सलाह दी है कि वह ऐस जरिए खोजे जहां से और पैसे कमाए जा सके। साथ ही, उन सेक्टर पर ध्यान दे जहां से पैसे बनाने की संभावना है। CAG ने बताया है कि राज्य का कुल 7910.47 करोड़ रुपये का राजस्व 31 मार्च 2025 तक बकाया था जिसमें से 1329 करोड़ का राजस्व पांच साल से बकाया है। यानी हिमाचल प्रदेश सरकार को इतना राजस्व और मिल सकता था। ऐसे में CAG ने सलाह दी है कि सरकार ने पैसों को भी समय पर वसूलने की कोशिश करे।


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