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पंचकूला कांड: ऐसे कांड पर अधिकतम क्या कर सकती हैं जुवेनाइल अदालतें?

नाबालिगों के अपराधों में जुवेनाइल अदालतों की प्राथमिकता सुधारवादी रहती है। जघन्य मामलों में भी नाबालिग बच निकलते हैं।

जुवेनाइल कोर्ट। AI इमेज। Photo Credit: ChatGPT

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हरियाणा के पंचकूला जिले के एक सरकारी स्कूल में तीसरी क्लास के 8 साल के छात्र ने पहली क्लास की 6 साल की बच्ची को बुरी तरह मारा है। जमकर लात-घूंसे चलाने के बाद छात्र ने छात्रा के सिर पर ईंट से भी कई बार मारा। छात्रा बुरी तरह घायल हो गई, उसकी आंखों के पास गहरे जख्म है। छात्रा की हालत अब खतरे से बाहर बताई जा रही है।

पंचकूला की इस वारदात पर नई बहस छिड़ गई है। लोग नाबालिग बच्चे की परवरिश पर सवाल उठा रहे हैं। कुछ लोगों का कहना है कि पारिवारिक पृष्ठभूमि ऐसी रही होगी, निर्दयता तभी आती है। दूसरी तरफ एक वर्ग कह रहा है कि अगर वह बच्चा बाहर निकला तो और खूंखार साबत हो सकता है। 
 
पुलिस ने स्कूल प्रबंधन पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए शनिवार को मामला दर्ज किया। आरोपी बच्चे को निरीक्षण गृह भेजा गया है। 28 अक्टूबर को दोपहर तीन से चार बजे के बीच सेक्टर 20 के स्कूल में हुई। 

 

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बच्ची की हालत कैसी है?

पुलिस अधिकारियों के मुताबिक बच्ची की हालत स्थिर है। उसे कई चोटें आई हैं और टांके लगे हैं। उसका इलाज चंडीगढ़ के PGI में चल रहा है। डॉक्टर उसे 2 से 3 दिन और निगरानी में रखेंगे। जांच के लिए 5 सदस्यीय कमेटी बनाई गई है। बाल अधिकार आयोग ने लिया इस प्रकरण पर संज्ञान लिया है। 

पंचकूला में हुआ क्या था?

शनिवार को एक CCTV वीडियो वायरल हुआ था। एक लड़का बच्ची के बाल पकड़कर उसका सिर बार-बार डेस्क पर मारता दिखता है। बच्ची के गिरने के बाद वह लात से हमला करता है, ईंट जैसी चीज से मारता है। बच्ची के चाचा ने कहा कि स्कूल की छुट्टी के बाद ऑटो ड्राइवर उसे लेने पहुंचा तो वह नहीं मिली। 

ड्राइवर ने तुरंत उसके पिता को बताया और पिता स्कूल पहुंचे। चाचा का दावा है कि लड़के ने वहां से जाने से पहले पिता को बच्ची की जगह बताई। परिवार ने सवाल उठाया है कि प्रिंसिपल के कमरे से सीसीटीवी कैमरों की निगरानी होती है। इसके बावजूद घटना का पता कैसे नहीं चला।

अब कौन कर रहा है जांच?

इस केस की जांच विशेष किशोर पुलिस इकाई (SJPU) कर रही है। जांच एक वरिष्ठ अधिकारी की निगरानी में हो रही है। पंचकूला की डीसीपी अदिति सिंह ने बताया कि शुरुआती जांच में स्कूल प्रशासन की लापरवाही सामने आई है। स्कूल के प्रिंसिपल, क्लास इंचार्ज और चौकीदार के खिलाफ FIR दर्ज की गई। मामला किशोर न्याय अधिनियम की धारा 75 और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 125-बी के तहत दर्ज हुआ है।

 

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ऐसे मामलों में अधिकतम क्या हो सकता है?

सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड विशाल अरुण मिश्रा ने कहा, 'भारतीय न्याय संहिता की धारा 20 कहती है कि 7 साल से कम उम्र के बच्चे का किया कोई भी काम अपराध नहीं माना जाता। धारा 21 के अनुसार सात से बारह साल का बच्चा अगर अपने काम की प्रकृति और नतीजे समझने लायक परिपक्व नहीं है तो उसका काम भी अपराध नहीं माना जाएगा। 8 साल के बच्चे के मामले में यही प्रावधान लागू होगा।'

 

एडवोकेट विशाल अरुण मिश्रा ने कहा, 'नाबालिग की परिपक्वता पुलिस जांच और किशोर न्याय बोर्ड (JJB) के आकलन से तय होगी। 18 साल से कम उम्र के हर बच्चे का मामला किशोर न्याय अधिनियम 2015 के तहत चलता है। इस कानून में किसी नाबालिग को फांसी या बिना रिहाई की संभावना वाली उम्रकैद नहीं दी जा सकती।'

अगर सजा नहीं तो कैसे होता है सुधार?

एडवोकेट विशाल अरुण मिश्र ने कहा, 'आम मामलों में जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड चेतावनी, परामर्श, सामुदायिक सेवा या प्रोबेशन का आदेश दे सकता है या बच्चे को अधिकतम तीन साल के लिए विशेष गृह भेज सकता है। 16 से 18 साल के किशोर पर जघन्य अपराध का आरोप हो, तो JJB पहले उसकी मानसिक और शारीरिक क्षमता का आकलन करता है। इसके बाद मामला बाल न्यायालय को भेजा जा सकता है, जहां वयस्क की तरह सुनवाई हो सकती है।'

एडवोकेट विशाल अरुण मिश्र, AoR, सुप्रीम कोर्ट:-
अगर नाबालिग दोषी भी पाया जाता है तो भी उसे 21 साल का होने तक सुरक्षित स्थान पर रखा जाता है। इसके बाद तय होता है कि उसे रिहा किया जाए या जेल भेजा जाए। 16 साल से कम उम्र के बच्चे पर किसी भी हाल में वयस्क की तरह मुकदमा नहीं चल सकता।

ऐसे मामलों में स्कूल कितना जिम्मेदार है?

एडवोकेट विशाल अरुण मिश्रा ने कहा, 'स्कूल प्रबंधन पर कार्रवाई किशोर न्याय अधिनियम की धारा 75 के तहत होती है। जिस व्यक्ति पर बच्चे की देखरेख की जिम्मेदारी हो, वह बच्चे के साथ क्रूरता करे या उसकी उपेक्षा करे तो उसे तीन साल तक की कैद, एक लाख रुपये तक का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।'

 

एडवोकेट विशाल अरुण मिश्रा ने कहा, 'अगर ऐसा बच्चों की देखरेख के लिए बनी किसी संस्था को चलाने वाले या वहां काम करने वाले व्यक्ति ने किया हो तो सजा पांच साल तक की सश्रम कैद और पांच लाख रुपये तक के जुर्माने तक बढ़ सकती है। अगर इससे बच्चा शारीरिक रूप से अक्षम हो जाए, मानसिक रूप से बीमार हो जाए या उसकी जान को खतरा हो, तो सजा कम से कम तीन साल और अधिकतम दस साल की सश्रम कैद हो सकती है। इसके साथ पांच लाख रुपये तक का जुर्माना भी लगाया जा सकता है।'

 

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कब नाबालिगों का ट्रायल बालिगों की तरह हो सकता है?

जुलाई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में कहा था कि अगर कोई नाबालिग हत्या का आरोपी है और यह अपराध 'घोर अपराध' की श्रेणी में आता है तो उसे वयस्क की तरह अदालत में मुकदमा चल सकता है। अदालत ने साफ किया कि भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत हत्या जघन्य अपराध है। इस धारा में सजा मौत या उम्रकैद है।

 

कोर्ट ने कहा कि उम्रकैद इस अपराध की न्यूनतम सजा मानी जाएगी, इसलिए इसे घोर अपराध माना जाएगा। किशोर न्याय अधिनियम के तहत घोर अपराध वे होते हैं जिनमें कम से कम सात साल या उससे ज्यादा की सजा हो सकती है।

 

आरोपी के वकील का कहना था कि धारा 302 में 'न्यूनतम' शब्द साफ नहीं लिखा है, इसलिए इसे सिर्फ 'गंभीर अपराध' माना जाए, घोर नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि हत्या में अदालत उम्रकैद से कम सजा नहीं दे सकती, इसलिए उम्रकैद ही न्यूनतम सजा है। 


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