छत्तीसगढ़ की दो राज्यसभा सीटों पर चुनावी घमासान थम गया है। नामांकन की आखिरी तारीख तक कांग्रेस ने मौजूदा सांसद फूलोदेवी नेताम को फिर टिकट देकर भरोसा जताया, जबकि बीजेपी ने लक्ष्मी वर्मा को उम्मीदवार बनाया। दोनों उम्मीदवार महिला हैं और दोनों पार्टियां इनके जरिए महिला वोट बैंक के साथ-साथ जातिगत व क्षेत्रीय समीकरण साधने में जुटी दिख रही हैं। 16 मार्च को होने वाले चुनाव में दोनों उम्मीदवारों की जीत लगभग तय मानी जा रही है, क्योंकि विधानसभा में संख्या बल दोनों पार्टियों के पक्ष में है। लेकिन इस फैसले के पीछे गहरी सियासी गणित छिपा है।
बीजेपी ने बलौदाबाजार जिले की लक्ष्मी वर्मा को चुना, जो लंबे समय से संगठन में सक्रिय हैं। वे 2000-2006 तक मनवा कुर्मी क्षत्रिय समाज की प्रदेश महिला महामंत्री, फिर संगठन मंत्री और महिला अध्यक्ष रहीं। अभी अखिल भारतीय कुर्मी क्षत्रिय महासभा की राष्ट्रीय महिला महासचिव हैं। उनकी पृष्ठभूमि रायपुर इलाके को साधने में मददगार साबित होगी। वहीं, कांग्रेस ने कोंडागांव की फूलोदेवी नेताम को दोबारा मौका दिया। वह बस्तर क्षेत्र की आदिवासी नेता हैं और वहां उनकी लोकप्रियता को पार्टी भुनाना चाहती है।
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सोची समझी रणनीति
दोनों पार्टियों का यह फैसला महज संयोग नहीं है। छत्तीसगढ़ में बीजेपी सरकार 'महतारी वंदन योजना' जैसी योजनाओं से महिलाओं को लुभा रही है। इस साल को 'मातृशक्ति' या 'महतारी गौरव वर्ष' के रूप में मनाने की घोषणा की गई है। कांग्रेस भी महिला मतदाताओं की संख्या (पुरुषों से ज्यादा) को देखते हुए इस वोट बैंक पर सेंध लगाना चाहती है। एक्सर्ट्स के मुताबिक कांग्रेस के पास आंतरिक घमासान सुलझाने और बीजेपी को जवाब देने के लिए फूलोदेवी नेताम से बेहतर विकल्प नहीं था। चुनावी साल में महिलाओं को राज्यसभा भेजने का फैसला वोटों में दिखेगा, क्योंकि यहां महिला मतदाता ज्यादा हैं। बीजेपी के पीछे भी यही सोच है कि 'महतारी गौरव वर्ष' को धरातल पर साबित करने के लिए महिला उम्मीदवार से बेहतर कुछ नहीं।
क्या जातिगत समीकरण है कारण?
हालांकि, सवाल यह उठता है कि क्या सिर्फ जातिगत समीकरणों की वजह से पवन खेड़ा, पवन सिंह, आनंद शर्मा और राजीव शुक्ला जैसे वरिष्ठ नेता टिकट पाने से चूक गए? विश्लेषण यही इशारा करता है। छत्तीसगढ़ की सियासत में कुर्मी, आदिवासी और ओबीसी समीकरण निर्णायक हैं। बीजेपी ने लक्ष्मी वर्मा को चुनकर मनवा कुर्मी समाज को साधा, जो भूपेश बघेल (कांग्रेस) के कुर्मी वर्ग को काउंटर करने का तरीका भी है। वहीं कांग्रेस ने बस्तर के आदिवासी वोटर्स को मजबूत करने के लिए फूलोदेवी नेताम पर भरोसा जताया।
क्यों नहीं मिला टिकट?
पवन खेड़ा कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं, मीडिया में काफी मुखर रहते हैं लेकिन वह छत्तीसगढ़ के स्थानीय जातिगत गठजोड़ में फिट नहीं बैठते। आनंद शर्मा वरिष्ठ नेता हैं, अनुभवी, लेकिन हिमाचल या अन्य क्षेत्रों से जुड़े माने जाते हैं, जहां भी इसी तरह स्थानीय समीकरण हावी हुए। राजीव शुक्ला को 2022 में छत्तीसगढ़ से मौका मिला था (बाहरी के रूप में) लेकिन इस बार पार्टी ने 'आउटसाइडर' की बजाय स्थानीय आदिवासी चेहरा चुना ताकि बस्तर में पैठ मजबूत हो। भोजपुरी स्टार पवन सिंह बीजेपी से जुड़े और बिहार में खास चेहरे के रूप में जाने जाते हैं लेकिन वहां भी जातिगत गणित (कुशवाहा आदि) ने उन्हें पीछे धकेल दिया।
आदिवासी वोट भी साधने की कोशिश
भारतीय राजनीति में जाति हमेशा से 'बड़ा फैक्टर' रही है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में जहां आदिवासी बहुल क्षेत्र (बस्तर) और कुर्मी-ओबीसी प्रभाव (रायपुर-दुर्ग) है, पार्टियां वोट बैंक की गणित से ऊपर नहीं उठ पा रहीं। वरिष्ठता, अनुभव या मीडिया में फेस वैल्यू से ज्यादा 'विनेबिलिटी' और 'सोशल इंजीनियरिंग' मायने रखती है। कांग्रेस ने आदिवासी वोटों को साधने की कोशिश की तो बीजेपी ने भी संगठन की जमीनी कार्यकर्ता को तरजीह दी ताकि महिला और कुर्मी दोनों वर्ग साधे जा सकें।
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यह फैसला 2026-27 के विधानसभा चुनावों के लिए भी एक तरह का संकेत है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि वोट की गणित में जातिगत फैक्टर सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। चूंकि पवन खेड़ा और आनंद शर्मा जैसे नेता संभवतः इस जातिगत स्लॉट में फिट नहीं बैठते इसीलिए उनको नहीं चुना गया।