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रोहित वेमुला बिल: कर्नाटक से हिमाचल तक कवायद, सबकुछ जो जानना जरूरी है

कर्नाटक सरकार रोहित वेमुला विधेयक पेश कर सकती है। क्या है यह बिल, विवाद क्या है, देश में दलित संरक्षण के लिए बने कानूनों की स्थिति क्या है, पूरी कहानी विस्तार से समझिए।

Rohit Vemula

रोहित वेमुला की मौत के बाद देशभर के कॉलेजों में आंदोलन हुए थे। (Photo Credit: PTI)

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कर्नाटक सरकार जल्द ही रोहित वेमुला बिल 2025 पेश कर सकती है। इसे रोहित वेमुला (प्रिवेंशन ऑफ एक्सूजन ऑर इनजस्टिस) (राइटर टू एजुकेशन एंड डिग्निटी) बिल 2025 का नाम दिया गया है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कांग्रेस शासित तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्रियों को रोहित वेमुका एक्ट लागू करने की अपील की है। करीब 2 महीने पहले उन्होंने शैक्षणिक संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव को खत्म करने की वकालत की की थी।

राहुल गांधी ने कहा कि हाशिए पर खड़े छात्रों के संरक्षण की पहल की जाए। जो लोग, सामाजिक तौर पर पिछड़े, वंचित छात्रों के साथ भेदभाव करें, उन्हें कड़ी सजा मिले। रोहित वेमुला बिल को कांग्रेस दलित और वंचित समुदायों के छात्रों की सुरक्षा से जोड़कर देख रही है। कांग्रेस नेतृत्व ने इस प्रस्तावित कानून को लागू करने के लिए राज्यों से त्वरित कार्रवाई की उम्मीद जताई है। शैक्षणिक संस्थानों में समानता और न्याय को बढ़ावा देने वाले इस बिल की अब चर्चा हो रही है। 

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क्या है ये और क्यों हो रहा है विवाद?

कर्नाटक सरकार जल्द ही 'रोहित वेमुला बिल, 2025' पेश करने जा रही है। यह विधेयक उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए लाया जा रहा है। इसे आगामी मानसून सत्र में विधानसभा में पेश किया जाएगा। 

बिल का मकसद क्या है?

यह बिल अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और अल्पसंख्यकों के लिए शिक्षा और सम्मान का अधिकार की बात करता है। यह सार्वजनिक, निजी और डीम्ड विश्वविद्यालयों में भेदभाव रोकने के लिए है।

सजा क्या होगी? 

जो लोग, शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव करेंगे, इसमें शामिल होने वालों को गैर-जमानती अपराध के तहत सजा दी जाएगी। पहली बार अपराध करने पर 1 साल की जेल और 10,000 रुपये जुर्माना देना होगा। पीड़ित को 1 लाख रुपये तक मुआवजा देना होगा। 

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दोबारा अपराध सजा क्या होगी?

3 साल की जेल होगी और ₹1 लाख जुर्माना देना पड़ेगा। अगर कोई शिक्षण संस्थान, जाति, धर्म या लिंग के आधार पर भेदभाव करेगा तो सजा के तौर पर वित्तीय अनुदान बंद कर दिया जाएगा।  

रोहित वेमुला एक्ट क्यों नाम पड़ा?

रोहित वेमुला हैदराबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर रहे थे। वह दलित वर्ग से आते थे और पीएचडी की पढ़ाई कर रहे थे। साल 2016 में उन्होंने खुदकुशी कर ली थी। अपने सुसाइड नोट में उन्होंने जातिगत भेदभाव का आरोप लगाया था। उनकी मौत के बाद देशभर के विश्वविद्यालयों में दलित और पिछड़े छात्रों ने नाराजगी जताई थी। दलित छात्रों के साथ भेदभाव पर बहस छिड़ी थी। जगह-जगह विरोध प्रदर्शन किए जा रहे थे। 

चर्चा में क्यों है रोहित वेमुला बिल? 

राहुल गांधी ने इस साल अप्रैल में कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को पत्र लिखकर इस बिल को लाने की अपील की थी। यह कांग्रेस के कर्नाटक विधानसभा चुनाव के घोषणापत्र में भी वादा था।
 

क्यों बिल पर बीजेपी-कांग्रेस में भिडंत हो गई है?

बिल को लेकर पड़ोसी राज्य तेलंगाना में राजनीतिक तनाव बढ़ गया है। बीजेपी के तेलंगाना अध्यक्ष एन रामचंदर राव ने तेलंगाना के उपमुख्यमंत्री मल्लू भट्टी विक्रम को कानूनी नोटिस भेजा है। मल्लू भट्टी विक्रम ने आरोप लगाया था कि एन रामचंदर राव भी रोहित वेमुला की आत्महत्या के लिए जिम्मेदार थे। अब रामचंदर राव ने तीन दिन में बिना शर्त माफी मांगने की मांग की है। उन्होंने कहा कि वह 25 लाख रुपये की मानहानि का मुकदमा कर देंगे। तेलंगाना पुलिस ने पिछले साल अपनी क्लोजर रिपोर्ट में उन्हें और अन्य कई को बरी कर दिया था।

कांग्रेस और बीजेपी का क्या कहना है?

कांग्रेस ने 1 जुलाई को एन रामचंदर राव को तेलंगाना बीजेपी अध्यक्ष बनाए जाने की आलोचना की थी। कांग्रेस का कहना है कि बीजेपी यह कदम उठाकर दलितों और आदिवासियों के खिलाफ काम करने वालों इनाम दे रही है। 11 जुलाई को उपमुख्यमंत्री विक्रम ने 2016 की घटना का जिक्र करते हुए कहा कि रामचंदर राव ने समर्थकों के साथ विश्वविद्यालय जाकर अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के दलित छात्रों के खिलाफ कार्रवाई के लिए दबाव बनाया था। 

वहीं, बीजेपी रामंचर राव का बचाव कर रही है। कांग्रेस पर झूठे और दुर्भावनापूर्ण आरोप लगाने का इल्जाम लगा रही है। रामंचदर राव सीनियर वकील हैं, एबीवीपी के सदस्य रह चुकेहैं। उन्होंने कहा है कि यह सभी आरोप राजनीतिक साजिश का हिस्सा हैं। 

 

भारत में दलितों के खिलाफ अत्याचार की स्थिति क्या है?
2018 42,793
2019 45,935
2020 50,291
2021 50,900
2022 57,582
Source: NCRB



भारत में दलितों के खिलाफ भेदभाव रोकने के कानून क्या हैं?

संवैधानिक स्थिति: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15 कहता है कि धर्म, मूल, वंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता है। 14 कहता है कि कानून सबके लिए बराबर होगा। अनुच्छेद 17 में अस्पृश्यता का जिक्र है। अगर कोई छुआ-छूत करता है तो यह संविधान इसकी इजाजत नहीं देता है। बराबरी व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। अनुच्छेद 21 प्राण और दैहिक स्वतंत्रता से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी धाराओं की तर्कसंगत व्याख्या की है और कहा है कि यह सभी धाराएं, एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं।

 

संविधान ने सरकार को अनुच्छेद 16(4) के तहत अधिकार दिया है कि सामाजिक तौर पर पिछड़े वर्गों के लिए सरकार नियुक्तियां कर सकती है, पद दे सकती है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 लागू है। दलित वर्गों के संरक्षण के लिए यह कानून लागू है। अलग-अलग अपराधों के लिए इस कानून में प्रावधान हैं। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग भी है। 


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