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दिल्ली जल बोर्ड केस: भ्रष्टाचार मामले में सत्येंद्र जैन को मिली जमानत

19 अगस्त से जेल में रह रहे सत्येंद्र जैन को जमानत मिल गई है। क्या है मामला, क्यों राहत दी गई है, पढ़ें रिपोर्ट।

Satyendra Jain

AAP नेता सत्येंद्र जैन। Photo Credit: Social Media

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दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने गुरुवार को आम आदमी पार्टी (AAP) के नेता सत्येंद्र जैन को दिल्ली जल बोर्ड से जुड़े भ्रष्टाचार मामले में जमानत दे दी है। स्पेशल कोर्ट के जज विनय सिंह ने उनकी जमानत याचिका मंजूर कर ली। सत्येंद्र जैन पहले दिल्ली की आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार में जल मंत्री रह चुके हैं। 

दिल्ली पुलिस की एंटी करप्शन ब्रांच (ACB) ने उन्हें पिछले महीने गिरफ्तार किया था। यह मामला साल 2024 में दर्ज हुआ था। 19 अगस्त को उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था। इस मामले में 5 और लोगों को भी गिरफ्तार किया गया है।

यह भी पढ़ें: जिस कंपनी के चक्कर में जेल गए सत्येंद्र जैन, ISRO और AMUL भी हैं उसके क्लाइंट

दूसरे आरोपी कौन हैं?

IAS अधिकारी और दिल्ली जल बोर्ड के पूर्व सीईओ उदित प्रकाश राय, जल बोर्ड के पूर्व संविदा सलाहकार अंकित श्रीवास्तव, एएन एंटरप्राइजेज के मालिक नागेंद्र यादव, यूरोटेक एनवायरनमेंट प्राइवेट लिमिटेड के मालिक राजा कुमार कुर्रा और श्रीजनहर के मालिक पंकज वर्मा के नाम आरोपियों में शामिल हैं।

सत्येंद्र जैन पर क्या आरोप हैं?

दिल्ली सरकार के विजिलेंस विभाग की शिकायत पर सत्येंद्र जैन के खिलाफ केस दर्ज हुआ था। आरोप है कि दिल्ली जल बोर्ड के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बढ़ाने और अपग्रेड करने के टेंडर में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हुई। टेंडर की शर्तों में हेरफेर और आपराधिक साजिश का आरोप लगाया गया है। 

यह भी पढ़ें: 'पिछला केस भी फर्जी था, यह भी होगा', सत्येंद्र जैन की गिरफ्तार पर भड़के केजरीवाल

किन धाराओं के तहत चल रहा है केस?

सत्येंद्र जैन पर प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट 1988 की धारा 7, 7ए, 9 और 13 के तहत FIR दर्ज की गई है। भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 409, 418 और 120बी के तहत भी उन पर मामले चल रहे हैं।

सत्येंद्र जैन क्यों ACB की रडार पर आए?

आरोप हैं कि टेंडर में ऐसी तकनीकी शर्तें रखी गईं जो सिर्फ यूरोटेक एनवायरनमेंट प्राइवेट लिमिटेड नाम की एक कंपनी के पक्ष में थीं। इससे कंपटीशन ही कम हो गया और एक निजी कंपनी को फायदा पहुंचाया गया। एंटी करप्शन ब्रांच का आरोप है कि निजी लोग सरकारी अधिकारियों और बिचौलियों से लगातार संपर्क में रहे, जिससे टेंडर प्रक्रिया में हेरफेर किया जा सके।

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