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सिखों में नहीं कोई जाति, फिर जट्ट सिख और दलित सिख कहां से आए?

सिख धर्म के मूल सिद्धांत जाति व्यवस्था को स्वीकार नहीं करते। गुरु ग्रंथ साहिब में विनम्रता, समानता और सभी मनुष्यों को एक समान मानने का संदेश दिया गया है लेकिन आज इसकी सच्चाई कुछ अलग कहानी बता रही है।

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सांकेतिक तस्वीर, Photo Credit: AI

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सिखों में नहीं कोई जाति, फिर जट्ट सिख और दलित सिख कहां से आए? जानिए पूरी कहानी

 

सिख धर्म की शुरुआत 15वीं शताब्दी में गुरु नानक देव जी ने समानता, मानवता और जाति-पांति के भेदभाव को खत्म करने के संदेश के साथ की थी। गुरु नानक देव जी ने अपने उपदेशों में स्पष्ट कहा कि इंसान की पहचान उसकी जाति से नहीं, बल्कि उसके कर्म और आचरण से होती है। इसके बाद सभी सिख गुरुओं ने भी जातिगत भेदभाव का विरोध किया। लंगर की परंपरा, संगत में एक साथ बैठकर भोजन करना और खालसा पंथ की स्थापना जैसे कदम इसी सोच को मजबूत करने के लिए उठाए गए। जाति व्यवस्था के खिलाफ सिख धर्म के हर एक गुरु ने काम किया। सिख धर्म अपने मूल सिद्धांतों में पूरी तरह से जाति प्रथा को खारिज करता है लेकिन आज की कड़वी सच्चाई कुछ अलग है। 

 

सिख धर्म की शिक्षाओं और सिद्धांतों में भले ही जाति का कोई स्थान नहीं है लेकिन आज सिख समाज में जाति व्यवस्था बहुत अंदर तक घर कर चुकी है। जानकारों का मानना है कि जातिय भेदभाव इतना ज्यादा है कि अलग-अलग जातियों के अपने अलग-अलग गु्रुद्वारे भी हैं। सिख धर्म जिसकी स्थापना ही समानता, मानवता और जाति-पांति के भेदभाव को खत्म करने के संदेश के साथ की गई थी आखिर उसमें जाति व्यवस्था कैसे मजबूत हुई?

 

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मूल सिद्धांत के खिलाफ

सिख धर्म के मूल सिद्धांत जाति व्यवस्था को स्वीकार नहीं करते। गुरु ग्रंथ साहिब में विनम्रता, समानता और सभी मनुष्यों को एक समान मानने का संदेश दिया गया है। गुरु गोबिंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना के समय अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमि से आए पांच प्यारों को एक समान स्थान दिया। इसका उद्देश्य जातिगत भेदभाव को समाप्त करना था। यही कारण है कि सिख धर्म की धार्मिक शिक्षाओं में ऊंच-नीच या छुआछूत के लिए कोई स्थान नहीं माना जाता। 

गुरु नानक ने किया था विरोध

गुरु नानक देव जी ने अपने समय में फैली जाति व्यवस्था, ऊंच-नीच और छुआछूत का कड़ा विरोध किया। गुरु नानक देव जी ने सभी जातियों को जोड़ एक साथ भोजन बनवाया और खिलाया था और इसका एक किस्सा काफी मशहूर है। करतारपुर में नानक जी संगत में आए लोगों के साथ भोजन करने बैठे थे। भोजन परोस दिया गया था, लेकिन नानक जी ने कहा कि जिन्होंने भोजन बनाया है और जिन्होंने यहां झाड़ू लगाई वे तो अभी आए नहीं। वे अलग भोजन क्यों करेंगे? गुरु नानक ने कहा था कि ईश्वर ने सबको समान बनाया है। सब साथ भोजन करेंगे। उन्होंने संगत को समझाया कि छुआछूत छोड़ सब एक साथ, एक ही पंगत में भोजन करें। यहीं से गुरु के लंगर की प्रथा सिख धर्म में शुरू हुई थी। 

 

गुरु नानक ने कहा था, 'जाति जनमु नह पूछीऐ, सच घर लेहु बताइ' यानी किसी व्यक्ति की जाति या जन्म के बारे में पूछने के बजाय यह देखना चाहिए कि उसने सत्य और धर्म के मार्ग पर कितना जीवन जिया है। वहीं 'सा जाति सा पति है जेहे करम कमाइ' में गुरु नानक बताते हैं कि मनुष्य की वास्तविक पहचान उसके अच्छे कर्म हैं, न कि उसकी सामाजिक या पारिवारिक पृष्ठभूमि। इसी तरह 'विचि सनाती सेवक होइ, नानक पाणीआं पहिरे सोइ' के माध्यम से गुरु नानक यह कहते हैं कि यदि तथाकथित नीची जाति का कोई व्यक्ति भी सच्चा, विनम्र और प्रभु का भक्त है, तो वे स्वयं उसके चरणों की धूल बनने को तैयार हैं। इस तरह गुरु नानक देव जी ने अपनी बाणी में जाति प्रथा का कई बार विरोध किया है। 

कहां से मिली जातिगत पहचान?

सिख धर्म कोई ज्यादा पुराना धर्म नहीं है। इस धर्म की शुरुआत गुरु नानक देव जी ने 15वीं शताब्दी में की थी। इस धर्म में अलग-अलग जातियों के लोगों ने गुरु नानक और अन्य सिख गुरुओं से प्रभाविक होकर आस्था जताई थी। इतिहासकारों के अनुसार, सिख धर्म में आने वाले लोग अलग-अलग सामाजिक और पेशागत समुदायों से थे। इनमें जाट, खत्री, अरोड़ा, रामगढ़िया, मजहबी, रविदासिया, राजपूत, सैनी और अन्य कई समुदाय शामिल थे। सिख धर्म भले ही जातिगत भेदभाव के खिलाभ बना हो लेकिन समय के साथ इस धर्म में शामिल होने वाले समुदायों की पुरानी सामाजिक पहचान पूरी तरह खत्म नहीं हुई। 

सिख धर्म में शामिल होने के बावजूद लोगों की जातिगत पहचान उनसे साथ रही। वही पहचान आगे चलकर जट्ट सिख, रामगढ़िया सिख, मजहबी सिख या दलित सिख  के रूप में प्रचलित हुई। यानी यह सिख धर्म की कोई जाति नहीं है बल्कि उन परिवारों और समुदायों की पहचान है जो उनके बैकग्राउंड को दिखाती है। यह ऐसे लोग है जिन्होंने अलग-अलग जातियों से सिख धर्म को अपनाया था। 

जट्ट सिख कौन होते हैं?

जट्ट सिख उन परिवारों को कहा जाता है जिनकी सामाजिक पृष्ठभूमि जाट समुदाय से जुड़ी रही और जिन्होंने अलग-अलग दौर में सिख धर्म अपनाया। इस समुदाय को आज भी हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के हिस्सों में स्थित जाटों के साथ जोड़कर देखा जाता है। इतिहासकारों के अनुसार, गुरु अर्जन देव जी और बाद के गुरुओं के समय बड़ी संख्या में जाट समुदाय के लोगों ने सिख धर्म स्वीकार किया। पंजाब (अविभाजित पंजाब) के कृषि प्रधान क्षेत्रों में उनकी संख्या अधिक होने के कारण समय के साथ उनकी सामाजिक और राजनीतिक भूमिका भी मजबूत हुई। यही कारण है कि आज भी पंजाब की राजनीति में जट्ट सिख समुदाय का दबदबा बना हुआ है। 

 

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दलित सिख किसे कहा जाता है?

दलित सिख शब्द आमतौर पर उन अनुसूचित जाति समुदायों के लिए इस्तेमाल किया जाता है जिन्होंने सिख धर्म अपनाया था। इनमें मजहबी सिख, रविदासिया और रामदासिया जैसे समुदाय शामिल हैं। धार्मिक रूप से इन्हें भी अन्य सभी सिखों के समान माना जाता है, लेकिन सामाजिक स्तर पर कई क्षेत्रों में भेदभाव और अलग पहचान के उदाहरण समय-समय पर सामने आते रहे हैं। इस पर कई रिसर्च भी हो चुकी हैं और सिख समाज इसकी अनुमति भी नहीं देता। हालांकि, आज भी कड़वी सच्चाई यह है कि सिखों में जातिगत भेदभाव देखने को मिलता है। पंजाब और अन्य क्षेत्रों के सामाजिक ढांचे में ऐतिहासिक कारणों से जातिगत पहचान पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकी है। 


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