भारत में आमतौर पर फांसी की सजा जल्दी नहीं दी जाती। यह सजा सिर्फ बहुत ही दुर्लभ मामलों में सुनाई जाती है लेकिन अगर निचली अदालतों की बात करें, तो वहां फांसी की सजा के मामले हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की तुलना में कहीं ज्यादा देखने को मिलते हैं। इसी से जुड़ी एक रिपोर्ट में पिछले दस सालों के आंकड़ों का अध्ययन किया गया है। यह रिपोर्ट भारतीय न्याय व्यवस्था की एक चौंकाने वाली तस्वीर दिखाती है। ‘स्क्वायर सर्कल क्लिनिक’ की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक में निचली अदालतों ने 1,310 लोगों को फांसी की सजा सुनाई। हालांकि, इनमें से केवल 70 मामलों में ही हाई कोर्ट ने इस सजा को सही माना।
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जब ये मामले सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे, तो उन 70 मामलों में से किसी भी एक में फांसी की सजा को सही नहीं ठहराया गया। यह रिपोर्ट इशारा करती है कि निचली अदालतों में सजा सुनाते वक्त कानूनी प्रक्रियाओं और निष्पक्ष जांच में बड़ी कमियां रह जाती हैं।
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रिपोर्ट में किए गए खुलासे
साल 2025 के अंत तक भारत की जेलों में 574 कैदी ऐसे थे जिन्हें फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है। यह 2016 के बाद का सबसे बड़ा आंकड़ा है। हालांकि ऊपरी अदालतें इन सजाओं को लगातार रद्द कर रही हैं या उम्रकैद में बदल रही हैं। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट्स में मौत की सजा देने का सिलसिला थमा नहीं है।
रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 10 सालों में 364 लोग ऐसे थे जिन्हें पहले फांसी की सजा मिली थी लेकिन बाद में वे पूरी तरह बेगुनाह पाए गए और बरी हो गए। साल 2025 में तो आलम यह था कि सुप्रीम कोर्ट ने जितने भी केस सुने, उनमें से आधे से ज्यादा (50%) में आरोपियों को बरी कर दिया। हाई कोर्ट में भी 90% मामलों में फांसी की सजा को या तो बदल दिया गया या केस को दोबारा जांच के लिए भेजा गया।
क्यों हो रही है इतनी बड़ी चूक?
सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में साफ कहा था कि किसी को फांसी देने से पहले उसकी मानसिक स्थिति, जेल में व्यवहार और पारिवारिक पृष्ठभूमि की रिपोर्ट देखना जरूरी है। रिपोर्ट कहती है कि 2025 में 95% मामलों में ट्रायल कोर्ट्स ने इन नियमों की अनदेखी की। कई मामलों में तो जिस दिन आरोपी को दोषी पाया गया, उसी दिन उसे फांसी की सजा भी सुना दी गई, जिससे बचाव पक्ष को अपनी बात रखने का पूरा मौका ही नहीं मिला।
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कानून सख्त पर न्याय में सावधानी
एक तरफ संसद और राज्य सरकारें नए कानूनों के जरिए फांसी के दायरे को बढ़ा रही हैं, वहीं दूसरी तरफ बड़े जज इस सजा को देने में अब बहुत सावधानी बरत रहे हैं। रिपोर्ट में एक और चिंता जताई गई है, जिसमें 'बिना रिहाई वाली उम्रकैद' का जिक्र किया गया है। जज फांसी की सजा को ऐसी उम्रकैद में बदल रहे हैं जिसमें इंसान कभी जेल से बाहर नहीं आ सकता। रिपोर्ट के अनुसार, यह सजा भी इंसान से उसकी 'उम्मीद' छीन लेती है और इसके लिए भी कड़े नियमों की जरूरत है।
कहां हैं सबसे ज्यादा मामले?
आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश में फांसी की सजा पाए कैदियों की संख्या सबसे ज्यादा है। इसके बाद गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र, केरल और कर्नाटक का नंबर आता है। मौत की सजा पाने वालों में लगभग 4% महिलाएं हैं। ज्यादातर मामले हत्या या यौन अपराधों से जुड़े हुए हैं।