दिल्ली की एक अदालत ने सुकेश चंद्रशेखर को खुद को जज बताकर गलत फायदा उठाने के मामले में दोषी ठहरा दिया है। सुरेश पर साल 2017 के एक भ्रष्टाचार मामले में जमानत हासिल करने के लिए खुद को सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज के तौर पर पेश करने का आरोप था। कोर्ट ने उनकी इस हरकत को न्यायिक प्रक्रिया की स्वतंत्रता और पवित्रता के लिए सीधा हमला बताया। चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट हर्षिता मिश्रा ने चंद्रशेखर को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 170, 189 और 507 के तहत दोषी माना है और कोर्ट अगली सुनवाई में 27 अगस्त को उसको सजा सुनाएगा।
यह मामला 28 अप्रैल 2017 की एक फोन कॉल से जुड़ा है। उस समय सुकेश चंद्रशेखर भ्रष्टाचार के मामले में पुलिस हिरासत में था। इस दौरान उसने पुलिस कांस्टेबल मनजीत का मोबाइल फोन हासिल किया और उसी फोन से भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रहीं तत्कालीन जज पूनम चौधरी के आधिकारिक लैंडलाइन और मोबाइल नंबर पर संपर्क किया।
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खुद को बताया था जज
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, चंद्रशेखर ने फोन पर पहले खुद को उस समय सुप्रीम कोर्ट के एक जज का निजी सचिव बताया था। इसके बाद उसने खुद को वही सुप्रीम कोर्ट जज बताकर बात की। आरोप था कि उसने जज पूनम चौधरी पर सुकेश को जल्द से जल्द जमानत देने के लिए दबाव बनाने की कोशिश की। इतना ही नहीं, उसने कथित तौर पर ऐसा नहीं करने पर उनके करियर पर गलत असर पड़ने की धमकी दी।
20 अगस्त के अपने आदेश में कोर्ट ने कहा कि यह मामला सामान्य ठगी या किसी व्यक्ति की पहचान की नकल करने वाले मामले से अलग है। कोर्ट के अनुसार, यहां आरोपी ने देश की सर्वोच्च अदालत के अधिकार और प्रतिष्ठा का इस्तेमाल करके एक अन्य न्यायिक अधिकारी को प्रभावित करने की कोशिश की।
कोर्ट ने दिखाई सख्ती
कोर्ट ने कहा कि चंद्रशेखर ने जानबूझकर खुद को सुप्रीम कोर्ट का जज बताया, क्योंकि वह जानता था कि जज के पद का प्रभाव उसकी अपनी पहचान से कहीं ज्यादा होगा। कोर्ट के मुताबिक, जज बनकर बात करना सिर्फ दिखावा नहीं था, बल्कि जमानत हासिल करने के लिए दबाव बनाने की उसकी कोशिश का अहम हिस्सा था। कोर्ट ने साफ कहा कि न्याय पाने का रास्ता कानून और सही प्रक्रिया से होकर जाता है, किसी जज की पहचान का गलत इस्तेमाल, धमकी या झूठे प्रभाव के जरिए न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित नहीं किया जा सकता।
तीन धाराओं में दोषी
कोर्ट ने चंद्रशेखर को IPC की धारा 170 के तहत सरकारी कर्मचारी बनकर पेश होने, धारा 189 के तहत सरकारी कर्मचारी को नुकसान पहुंचाने की धमकी देने और धारा 507 के तहत गुमनाम तरीके से आपराधिक धमकी देने का दोषी माना। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने साबित किया कि चंद्रशेखर ने जानबूझकर खुद को सुप्रीम कोर्ट का जज बताया और न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश की।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कोई आरोपी फोन पर खुद को किसी बड़े संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के रूप में पेश करके किसी जज के फैसले को प्रभावित नहीं कर सकता। मामलों का फैसला कानून और सबूतों के आधार पर होता है, न कि ऐसे फोन कॉल के आधार पर, जिनमें किसी प्रभावशाली व्यक्ति की पहचान या आवाज होने का दावा किया जाए।
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कांस्टेबल की भूमिका की होगी जांच
इस फैसले के साथ कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को कांस्टेबल मनजीत की भूमिका की दोबारा जांच करने का निर्देश दिया है। पुलिस को यह पता लगाने को कहा गया है कि चंद्रशेखर को मनजीत का मोबाइल फोन कैसे मिला, उस समय फोन लॉक था या नहीं, उसका पासवर्ड किन लोगों को पता था और फोन के इस्तेमाल की जानकारी मिलने के बाद इसकी सूचना तुरंत पुलिस को क्यों नहीं दी गई। अब इस मामले में अगली अहम सुनवाई 27 अगस्त को होगी, जब कोर्ट आरोपी को सजा सुनाएगा।