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‘द इंडिया स्टोरी’ फिल्म ने उठाए पेस्टिसाइड पर सवाल, फल-सब्जियों में कितना जहर?

फिल्म द इंडिया स्टोरी रिलीज के बाद और फिर पैराक्वाट के बैन पर पेस्टिसाइड के खतरे पर सवाल उठने लगे, 2026 के सरकारी आंकड़ों में फल-सब्जियों के 3.1 फीसदी नमूनों में कीटनाशक अवशेष तय सीमा से ज़्यादा मिले हैं।

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सांकेतिक तस्वीर, Photo Credit-ChatGPT

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बॉलीवुड एक्टर्स काजल अग्रवाल और श्रेयस तलपड़े की फिल्म ‘द इंडिया स्टोरी: स्लो पॉइजन इन प्रोग्रेस’ पिछले कई महीनों से चर्चा में है। फिल्म का नाम सामने आने के बाद से ही सवाल उठने लगे थे। रिलीज से पहले फिल्म को कानूनी विवादों का सामना करना पड़ा, वहीं फिल्म पर सेंसर बोर्ड की कैंची भी खूब चली।CBFC के 25 बदलावों के बाद 24 जुलाई को रिलीज हुई। अब फिल्म ओटीटी प्लेटफॉर्म पर भी आ चुकी है। सोशल मीडिया पर इस फिल्म और इसमें दिखाए गए मुद्दे को लेकर लोगों की अलग-अलग राय सामने आ रही है।  

 

चेतन डीके के निर्देशन में बनी इस फिल्म ने कीटनाशक खेती और उससे होने वाले दुष्प्रभावों जैसे गंभीर मुद्दे पर बहस छेड़ दी है। यह एक सामाजिक और कोर्टरूम ड्रामा फिल्म है। जब आप फिल्म देखेंगे तो आभास होगा कि भारत में लोगों की थाली तक कैसे पेस्टिसाइड पहुंच रहा है और लोगों को गंभीर बीमारियां दे रहा है। श्रेयस तलपड़े ने इस फिल्म के बारे में बात करते हुए एक इंटरव्यू में बताया था कि फिल्म पर काम करने के बाद उन्होंने दूध और पनीर का सेवन कम कर दिया।

मुझे एहसास हुआ कि हम जो दूध पीते हैं, जो पनीर खरीदते हैं और खाने की कई दूसरी चीजें अक्सर मिलावटी होती हैं। यह बात मेरे दिमाग में बनी रही। यह आसान मैथ है, डिमांड बहुत ज्यादा है, और सप्लाई लिमिटेड है। आज हर कोई ऑर्गेनिक खाना बेचने का दावा करता है लेकिन क्या हम सच में सवाल करते हैं कि यह कहां से आता है? हममें से ज्यादातर लोग सिर्फ लेबल पर भरोसा करते हैं। श्रेयस तलपड़े, एक्टर 

इस फिल्म में तलपड़े ने पूर्व आर्मी ऑफिसर मेजर योगेश पाटिल का रोल किया है, जो अपनी छोटी बेटी को कैंसर से खोने के बाद एक ताकतवर पेस्टिसाइड ग्रुप से भिड़ते हैं। एक पक्के इरादे वाले वकील के साथ मिलकर, वह खेती में केमिकल करप्शन के जाल को उजागर करने निकल पड़ते हैं। कहानी भले ही मनगढ़ंत हो, लेकिन श्रेयस का मानना ​​है कि वे जिन डरों को दिखाते हैं, वे बिल्कुल असली हैं। 

 

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कानूनी विवादों में कैसे उलझी फिल्म? 

फिल्म के टीजर में पेस्टिसाइड, खाद्य सुरक्षा और कैंसर को लेकर किए गए दावों पर विवाद शुरू हुआ। जून 2026 में मुंबई के वकील हिरण्य पांडे ने भुवेश सोढ़ा की ओर से फिल्म के मेकर्स को कानूनी नोटिस भेजा। इसमें फिल्म के दावों के वैज्ञानिक आधार पर सवाल उठाए गए। इसके बाद एग्रो केम फेडरेशन ऑफ इंडिया (ACFI) ने भी CBFC को पत्र लिखकर टीजर में पेस्टिसाइड और स्वास्थ्य से जुड़े दावों की जांच की मांग की। 

 

मेकर्स ने नोटिस का जवाब दिया और निर्देशक चेतन डीके ने कहा कि फिल्म का मकसद पेस्टिसाइड के गलत इस्तेमाल और उसके संभावित स्वास्थ्य प्रभावों पर सवाल उठाना है। फिल्म के पोस्टर में कुछ आंकड़े भी बताए गए थे, जिनको लेकर भी सवाल खड़े हुए।  

 

इस फिल्म में पंजाब की चर्चित ‘कैंसर ट्रेन’ का भी जिक्र किया गया है। यह नाम बठिंडा से राजस्थान के बीकानेर तक चलने वाली ट्रेन के लिए इस्तेमाल होता है, जिसमें कैंसर के इलाज के लिए जाने वाले मरीज बड़ी संख्या में सफर करते रहे हैं। फिल्म में इसे पंजाब में लंबे समय से पेस्टिसाइड के इस्तेमाल और इससे कैंसर के बढ़ते मामलों से जोड़कर दिखाया गया।

इस बीच सरकार ने एक पेस्टिसाइड पर लगाया बैन 

फिल्म को लेकर विवाद के बीच दूसरी ओर केंद्र सरकार ने पैराक्वाट डाइक्लोराइड पर बड़ा फैसला लिया, जुलाई में सरकार ने इस कीटनाशक पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का ड्राफ्ट आदेश जारी किया था। हालांकि, यह फिल्म से जुड़ा नहीं था लेकिन दोनोंं ही मुद्दे लगातार सामने आए तो पेस्टिसाइड को लेकर चर्चा और बढ़ी।  बाद में 22 सितंबर 2026 को सरकार ने इसका रजिस्ट्रेशन प्रतिबंधित कर दिया और पहले से जारी सभी रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट रद्द कर दिए। सरकार ने इसके इस्तेमाल से इंसानों और जानवरों को होने वाले स्वास्थ्य जोखिम का हवाला दिया था। 

 

विशेषज्ञों ने इसके गंभीर स्वास्थ्य प्रभाव, जहरीलेपन से होने वाली घटनाओं और मौतों को लेकर चिंता जताई थी। इसके जहर का कोई खास एंटीडोट भी उपलब्ध नहीं है। भारत से पहले दुनिया के 70 से ज्यादा देशों में इस रसायन पर प्रतिबंध या सख्त पाबंदियां लागू हैं। भारत में भी इसके निर्माण, आयात, बिक्री और इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई। 

पेस्टिसाइड के लिए नया कानून बनाने की भी है तैयारी

पेस्टिसाइड को लेकर सरकार नया कानून बनाने की तैयारी कर रही है। 30 दिसंबर 2025 को बिल का ड्राफ्ट मंत्रालयों और राज्यों को भेजा गया था, इसके लिए 7 जनवरी 2026 को इसे सार्वजनिक कर लोगों और हितधारकों से सुझाव मांगे गए।  और 4 फरवरी 2026 तक सुझाव लेने की प्रक्रिया चली। बाद में मिले सुझावों के आधार पर Pesticides Management Bill, 2026 का ड्राफ्ट तैयार किया गया। मार्च 2026 में कृषि मंत्री ने भी नए पेस्टिसाइड कानून की बात कही थी। हालांकि, जुलाई-अगस्त के मानसून सत्र में यह बिल संसद में पेश नहीं हुआ। 

 

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भारत के लिए कितनी बड़ी समस्या पेस्टिसाइड? 

11 अगस्त को सरकार ने लोकसभा में 2023 से 2026 का डेटा रखा। 23 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से फल-सब्जियों के 70,652 नमूने जांचे गए। इनमें से 2,223 यानी 3.1 प्रतिशत में कीटनाशक तय सीमा (MRL) से ज्यादा मिला। करीब फीसदी नमूने सीमा के अंदर रहे। यहां MRL का मतलब कीटनाशक सही तरीके से इस्तेमाल हो तो खाने में जितना अवशेष कानूनी रूप से चल सकता है, वही सीमा है।

 

किन राज्यों में ज़्यादा गड़बड़ी?

  • हरियाणा में 6.4% (2,371 में से 152)
  • आंध्र प्रदेश में 6.4% (2,104 में से 134)
  • तेलंगाना में 5.9% (8,198 में से 486)
  • महाराष्ट्र में 4.9% (5,295 में से 260)
  • दिल्ली: 4.3% (447 में से 19)। 

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, कुल गड़बड़ नमूनों का करीब आधा हिस्सा तीन राज्यों से है, तेलंगाना में 486, कर्नाटक में 334 और महाराष्ट्र में 260 है। वहीं सबसे कम पंजाब में 0.8% (6,580 में से 55), पश्चिम बंगाल में 0.3% (1,585 में से 5) रहा, ओडिशा और झारखंड में एक भी नमूना सीमा से ऊपर नहीं निकला। यहां पंजाब के आंकड़े पर गौर करना इसलिए जरूरी है क्योंकि फिल्म में पंजाब की 'कैंसर ट्रेन' का जिक्र है, पर इस डेटा में पंजाब का रिकॉर्ड बेहतर है।


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