logo

मूड

ट्रेंडिंग:

खेती, बिजली और मोबाइल कैसे प्रभावित कर रहे पक्षियों की संख्या?

बीते कुछ सालों में पक्षियों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। इंसानी गतिविधियां और उनके लिए जरूरी सुविधाएं पक्षियों के लिए मुसीबत का सबसे बड़ा सबब बन गई हैं।

Decline of Bird population

संकेतिक तस्वीर Photo Credit: Gemini

शेयर करें

google_follow_us

संबंधित खबरें

Advertisement

पहले सुबह की शुरुआत चिड़ियों की मीठी आवाज़ से होती थी लेकिन अब कई जगहों पर पक्षी पहले की तरह नहीं दिखाई देते। गौरैया, मैना, बुलबुल जैसे स्थानीय पक्षियों की संख्या धीरे-धीरे कम होती जा रही है। यह स्थिति लोगों और पर्यावरण दोनों के लिए चिंता का विषय बन गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, पेड़ों की कटाई, बढ़ता प्रदूषण, खेती में ज्यादा कीटनाशकों का इस्तेमाल और तेजी से बढ़ता शहरीकरण पक्षियों की संख्या कम होने के मुख्य कारण हैं। पेड़ कम होने से पक्षियों को घोंसला बनाने की जगह नहीं मिलती और कीटनाशकों के कारण उनका भोजन भी कम हो जाता है। इससे उनके लिए जीवित रहना मुश्किल होता जा रहा है।

 

प्राकृतिक आवासों की कमी का मतलब है कि पक्षियों के रहने, घोंसला बनाने और भोजन खोजने की जगहें लगातार कम होती जा रही हैं। पहले गांवों और शहरों में बहुत सारे पेड़, बगीचे, खेत, तालाब और खुले स्थान होते थे, जहां पक्षी आसानी से रहते थे। लेकिन अब तेजी से पेड़ों की कटाई, नई इमारतों, सड़कों और कॉलोनियों के निर्माण के कारण उनके प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं।

 

जब पेड़ काट दिए जाते हैं, तो पक्षियों को घोंसला बनाने के लिए सुरक्षित जगह नहीं मिलती। कई पक्षी अपने अंडे नहीं दे पाते या उन्हें अपने बच्चों को सुरक्षित रखने में कठिनाई होती है। इसी कारण पक्षियों को अपना स्थान छोड़कर दूसरी जगह जाना पड़ता है। कई पक्षी नए वातावरण में जीवित नहीं रह पाते, जिससे उनकी संख्या धीरे-धीरे घटने लगती है।

 

यह भी पढ़ें: फोन चोरी हो जाए या खो जाए तो सबसे पहले करें ये काम, कम होगा नुकसान

रासायनिक प्रदूषण

रासायनिक प्रदूषण स्थानीय पक्षियों की घटती संख्या का एक बड़ा कारण है। आजकल खेती में फसलों को कीड़ों से बचाने के लिए बड़ी मात्रा में कीटनाशकों और अन्य रासायनिक दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है। इन रसायनों का असर केवल कीड़ों पर ही नहीं, बल्कि पक्षियों पर भी पड़ता है। कई पक्षी कीड़े-मकोड़ों को खाकर अपना पेट भरते हैं। जब कीटनाशकों के कारण ये कीड़े मर जाते हैं या उनमें जहरीले रसायन मौजूद होते हैं, तो उन्हें खाने वाले पक्षियों के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है। इससे पक्षी बीमार पड़ सकते हैं और कई बार उनकी मौत भी हो जाती है।

 

इसके अलावा, खेतों और कारखानों से निकलने वाले रसायन नदियों, तालाबों और अन्य जल स्रोतों तक पहुंच जाते हैं। जब पक्षी यह दूषित पानी पीते हैं तो उनके शरीर पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इससे उनकी संख्या धीरे-धीरे कम होने लगती है। इसीलिए विशेषज्ञ खेती में रसायनों का कम उपयोग करने, जैविक खेती को बढ़ावा देने और पर्यावरण को स्वच्छ रखने की सलाह देते हैं, ताकि स्थानीय पक्षियों का संरक्षण किया जा सके।

 

यह भी पढ़ें: जींद के बाद और कहां-कहां चल सकती है हाइड्रोजन वाली ट्रेन? देखें संभावित रूट

मोबाइल टावर और बिजली की तारें

मोबाइल टावरों की बढ़ती संख्या और बिजली की खुली तारें भी पक्षियों के लिए खतरा बन सकती हैं। कई बार पक्षी बिजली की तारों से टकरा जाते हैं या करंट लगने से उनकी मौत हो जाती है। वहीं, कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि मोबाइल टावरों से निकलने वाली रेडियो तरंगें कुछ पक्षियों के व्यवहार और दिशा पहचानने की क्षमता को प्रभावित कर सकती हैं। हालांकि, इस विषय पर अभी भी वैज्ञानिक जांच कर रहे है।

 

स्थानीय पक्षियों की घटती संख्या केवल पर्यावरण की नहीं, बल्कि हम सभी की चिंता का विषय है। यदि समय रहते पेड़ों की रक्षा, प्रदूषण कम करने और पक्षियों के लिए सुरक्षित वातावरण बनाने जैसे कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में और अन्य कई पक्षी हमारे आसपास से गायब हो सकते हैं। इसलिए हर व्यक्ति को पेड़ लगाना, पक्षियों के लिए पानी, दाना रखना और प्रकृति की रक्षा करना अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए।

Related Topic:#National News

और पढ़ें