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PAK क्यों चाहता कन्वेंशनल वेपन्स पर कंट्रोल, भारत-इजरायल विरोध में क्यों?

संयुक्त राष्ट्र में पारंपरिक हथियारों पर नियंत्रण के पाकिस्तान के प्रस्ताव का भारत ने विरोध किया है। जानें क्यों भारत ने इसे अपनी सुरक्षा के लिए खतरा माना।

Shahbaz Sharif

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ। (Photo Credit: Social Media)

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पाकिस्तान हमेशा भारत पर हथियारों की होड़ को बढ़ावा देन का आरोप लगाता रहा है। भारत के हर मिसाइल टेस्ट के बाद यही रोना रोता है। इसकी वजह यह है कि पाकिस्तान चाहकर भी हथियारों के मामले में भारत का मुकाबला नहीं कर सकता है। हालांकि वह संतुलन बनाने की कोशिश जरूर करता है लेकिन पिछले कुछ दशकों में भारत ने सैन्य साजो-सामान पर भारी भरकम निवेश किया है। तेजी के साथ नौसैनिक बेड़ो को बढ़ाया है। 

 

इस्लामाबाद को अगर भारत का मुकाबला करना है तो भारी भरकम बजट की जरूरत होगी, जबकि देश उधारी के पैसे पर चल रहा है। ऐसे में पाकिस्तान ने एक गजब की तरकीब निकाली। बेलारूस के साथ मिलकर 'जनरल एंड कम्प्लीट डिसआर्मामेंट: कन्वेंशनल आर्म्स कंट्रोल एट द रीजनल एंड सब-रीजनल लेवल' नाम से एक प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र महासभा में पेश किया। इस प्रस्ताव में क्षेत्रीय और उप क्षेत्रीय स्तर पर पारंपरिक हथियारों पर नियंत्रण की वकालत की गई है, ताकि देशों के बीच हथियारों की होड़ न मचे। 

 

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संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान समर्थित ड्रॉफ्ट प्रस्ताव के समर्थन में 180 वोट पड़े। भारत और इजरायल ने प्रस्ताव का विरोध किया। हालांकि प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र महासभा की फर्स्ट कमेटी से मंजूरी मिल गई है। सभी के मन में सवाल उठ रहा है कि सिर्फ भारत और इजरायल ने ही विरोध क्यों किया, इसके पीछे क्या वजह रही होगी, उससे समझने से पहले यह जान लेते हैं कि पारंपरिक हथियार क्या हैं?

क्या होते हैं पारंपरिक हथियार?

सामूहिक विनाश के हथियार जैसे परमाणु बम, रासायनिक बम और जैविक हथियार को छोड़कर संघर्षों में इस्तेमाल होने वाले बम, गोला-बारूद, तोपखाना, टैंक, फाइटर जेट, बख्तरबंद लड़ाकू वाहन, युद्धपोत और अटैक हेलीकॉप्टर, भाला, बरछी, तलवार-कुल्हाड़ी सब पारंपरिक हथियारों का हिस्सा है। यूएन के मुताबिक संघर्षों में सबसे अधिक पारंपरिक हथियारों का इस्तेमाल होता है। सिपरी की रिपोर्ट के मुताबिक हथियारों के 10 सबसे बड़े खरीदार देशों में से छह एशिया और प्रशांत क्षेत्र से हैं। 

भारत और इजरायल ने क्यों विरोध क्या? 

दरअसल, पाकिस्तान और बेलारूस इस प्रस्ताव के माध्यम से चाहते हैं कि क्षेत्र के आधार पर देशों पर पारंपारिक हथियारों की सीमा तय कर दी जाए। भारत का तर्क है कि हथियारों का मामला एक वैश्विक मुद्दा है। इसे क्षेत्र के आधार पर नहीं सुलझाया जा सकता है। यह प्रस्ताव देशों के सुरक्षा हितों को उनके आसपास के माहौल के आधार पर व्याख्या करने पर जोर देता है। जबकि भारत का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों को एक भौगोलिक सीमा के तहत नहीं देखा जा सकता है।

ऐसे समझिए मामले को

मान लीजिए पाकिस्तान के पारंपरिक हथियारों को ध्यान में रखकर भारत पर एक सीमा तय कर दी जाती है, लेकिन यह भारत के हितों के साथ अन्याय होगा, क्योंकि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के सामने सिर्फ पाकिस्तान ही चुनौती नहीं है। पाकिस्तान से बड़ा चीन प्रतिद्वंद्वी बनकर उभरा है। पारंपरिक हथियारों की दौड़ में भी बीजिंग बहुत आगे है। ऐसे में भारत को चीन के मुकाबले अपनी सेना को मजबूत करना लाजिमी है। सिर्फ पाकिस्तान के नजरिये से भारत के हितों को देखना उचित नहीं है। भारत एक उभरती शक्ति है। क्षेत्रीय सुरक्षा में उसका अपना अहम स्थान है। यही कारण है कि भारत ने प्रस्ताव का पुरजोर विरोध किया।

 

भारत की तरह इजरायल की भी यही चिंता है कि उसके सामने चौतरफा चुनौतियां हैं। यह सभी चुनौतियां उसके अस्तित्व से जुड़ी हैं। तकनीक और आधुनिक हथियारों के दम पर ही इजरायल का अस्तिव बचा है। अगर इजरायल के हथियारों पर ही सीमा लगा दी जाए तो तेल अवीव का अपने दुश्मनों का सामना करना तो छोड़ो, जीना मुश्किल हो जाएगा।

बेलारूस क्यों समर्थन में?

अब एक सवाल यह उठता है कि बेलारूस प्रस्ताव का समर्थन क्यों कर रहा है? उसका जवाब यह है कि रूस के साथ बेलारूस के बेहद अच्छे संबंध है। अगर यूरोप और रूस में जंग भड़कती है तो इसका खामियाजा बेलारूस को भी झेलना होगा। पारंपरकि हथियारों के मामले में रूस और बेलारूस मिलकर यूरोप का मुकाबला नहीं कर सकते हैं। यूरोप बड़े पैमाने पर पारंपरिक हथियारों का निर्माण करता है। बेलारूस नहीं चाहता है कि उसके पड़ोसी यूक्रेन और पौलेंड जैसे देशों को यह हथियार मिले।

 

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पाकिस्तान के हित में प्रस्ताव

पाकिस्तान समर्थित प्रस्ताव में मिलिट्री फोर्स का लेवल कम रखने की भी वकालत की गई है, ताकि क्षेत्रीय सिक्योरिटी को मजबूत किया जा सके। इसमें तर्क दिया गया कि अक्सर पड़ोसी देशों के बीच संघर्ष के कारण दुनिया को संकट झेलना पड़ता है। इसका सबसे विवादित पहलू यह है कि अधिक मिलिट्री क्षमता वाले देशों पर ज्यादा जिम्मेदारी थोपना। मतलब यह हुआ कि पाकिस्तान की तुलना में भारत को हथियार सीमा का पालन करने का नैतिक दबाव अधिक होगा। प्रकृति से ही यह प्रस्ताव पाकिस्तान के पक्ष और भारत के खिलाफ लगता है। 

यूएन में भारत ने क्या कहा?

संयुक्त राष्ट्र में भारत के परमानेंट मिशन के फर्स्ट सेक्रेटरी अनमोल शेर बेदी ने कहा कि सुरक्षा चिंताओं को क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय सीमा तक सीमित नहीं किया जा सकता है। पारंपरिक हथियारों पर नियंत्रण एक वैश्विक मुद्दा है। भारत ने हथियारों पर नियंत्रण के लिए क्षेत्रीय समझौते के फ्रेमवर्क पर आपत्ति जताई। भारत ने कहा, 'ये चिंताएं... जैसा कि सब जानते हैं, कुछ खास इलाकों और सब-रीजन से कहीं अधिक हैं। इससे भी जरूरी बात यह है कि किसी इलाके या सब-रीजन में बैलेंस बनाए रखने का विचार वास्तविकता से परे लगता है।'

 


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