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लापरवाही के बाद भी सजा से कैसे बच जाते हैं डॉक्टर?

फिरोजाबाद में इलाज के दौरान अस्पताल की लापरवाही से मरीज की तबीयत बिगड़ जाए या बीमार पड़ जाए तो ऐसे मामलों में डॉक्टरों का क्या होता है, आइए जानते हैं।

Ankit Rathore

अंकित राठौर। Photo Credit: Social Media

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उत्तर प्रदेश के फरीदाबाद जिले के रहने वाले अंकित राठौर 2 जून को लखनऊ के डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पाताल में तबीयत खराब होने के बाद भर्ती हुए थे। डॉक्टर ने उनके इलाज लिए फूड पाइप सर्जरी की। सर्जरी के बाद कुछ दिन उनकी तबीयत स्थिर रही लेकिन कुछ दिनों बाद उनका एक हाथ सुन्न पड़ गया। उन्होंने मेडिकल स्टाफ से इसकी शिकायत की लेकिन लोगों ने इसे अनसुना किया। अब वह अपना हाथ गंवा बैठे हैं।

अंकित राठौर की उम्र अभी 29 साल है। उन्होंने अपने साथ इलाज के दौरान बरती गई लापरवाही पर सरकार को चिट्ठी लिखी है। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से इंसाफ की मांग की है। उनका कहना है कि सही समय पर डॉक्टर ने ध्यान नहीं दिया, जिसकी वजह से हाथ में गैंग्रीन गहराता गया और हाथ काटना पड़ा। गैंग्रीन, एक ऐसी अवस्था है, जब शरीर के किसी अंग में ब्लड फ्लो खत्म हो जाता है या रुक जाता है और ऊतक सड़ जाते हैं। ऐसी स्थिति में शरीर के अंगों को काटना पड़ता है। 

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हाथ क्यों काटना पड़ा?

2 जून को अंकित राठौर डॉ. राम मनोहर लोहिया में भर्ती हुए थे। 8 जून को अंकित की फूड पाइप सर्जरी हुई थी। सर्जरी के तत्काल बाद उनका बायां हाथ सुन्न पड़ गया। अस्पताल के लोगों से उन्होंने शिकायत भी लेकिन किसी ने बात नहीं सुनी। 19 जून तक हाथ में संक्रमण फैल गया और गैंग्रीन हो गया। डॉक्टरों ने इसके लिए खुद को जिम्मेदार नहीं माना। 

डॉक्टरों ने मरीज का ट्रांसफर यह करते हुए कर दिया कि पीजीआई या केजीएमयू में भर्ती हो किया जाए। मरीज का कहना है कि वह बार-बार चक्कर काट रहा था लेकिन किसी ने अस्पताल में उसे भर्ती नहीं किया।

ऐसे मामले में क्या हो सकता है?

एडवोकेट स्निग्धा त्रिपाठी ने कहा, 'पहले, अगर लापरवाही से मौत होती थी तो 2 साल की सजा का प्रावधान था। इलाज के दौरान लापरवाही से होने वाली मौत में भी भारतीय दंड संहिता 304 (ए) लगती थी। मेडिकल टर्म को अलग से जोड़ा नहीं गया था।'

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क्या थी यह धारा?

भारतीय दंड संहिता की धारा 304 (ए) कहती है, 'अगर किसी की लापरवाही से किसी की जान जाती है, जो सीधे तौर पर हत्या नहीं है, उसे 2 साल की सजा और जुर्माने या दोनों से दंडित किया जाएगा।' धारा 304 (ए) से 3 अलग-अलग धाराएं भी जोड़कर देखी जाती हैं। 

  • धारा 336: अगर कोई व्यक्ति इतनी लापरवाही या जल्दबाजी से कोई काम करता है कि उससे किसी की जान या सुरक्षा को खतरा हो जाए  लेकिन किसी को वास्तव में चोट न लगे तो भी यह अपराध है।
    सजा: 3 महीने की कैद, 250 रुपये तक जुर्माना, दोनों
  • धारा 337: अगर लापरवाही या जल्दबाजी से किसी को साधारण चोट लग जाए।
    सजा: अधिकतम 6 महीने कैद या 500 रुपये तक जुर्माना 
  • धारा 338: अगर वैसी ही लापरवाही से किसी को गंभीर चोट लग जाए। जैसे किसी की हड्डू टीटी, अंग खराब हुआ, आंख की रोशनी गई तो अधिकतम 2 साल की कैद हो सकती है, 1 हजार रुपये तक जुर्माना लग सकता है या दोनों लग सकता है।   

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अब क्या बदल गया है?

एडवोकेट स्निग्धा ने कहा, 'भारतीय न्याय संहिता की धारा 106 लापरवाही से होने वाली मौत से संबंधित है। अगर कोई व्यक्ति अपनी लापरवाही से किसी की मौत की वजह बनता है लेकिन वह हत्या करने की इरादा नहीं रखता तो उसे 5 साल तक की जेल हो सकती है और जुर्माना हो सकता है। अगर ये गलती कोई रजिस्टर्ड डॉक्टर मेडिकल प्रोसीजर करते समय करता है तो सजा कम होकर 2 साल तक जेल और जुर्माना हो सकती है।'

ऐसे मामलों में बच क्यों जाते हैं डॉक्टर?

एडवोकेट स्निग्धा त्रिपाठी ने बताया, 'भारत में डॉक्टरों की लापरवाही पर आसानी से सजा न मिलने की एक वजह कानूनी सुरक्षा भी है। भारतीय दंड संहिता की धारा 88 और 92 के तहत पहले यह माना जाता था कि अगर कोई रजिस्टर्ड डॉक्टर मरीज की भलाई के इरादे से इलाज करता है तो इलाज असफल होने पर उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। IPC की धारा 88 अब BNS की धारा 26 है। धारा 92 अब धारा 30 है। इन धाराओं की परिभाषा इतनी व्यापक है कि डॉक्टरों को राहत मिल जाती है।'

एडवोकेट स्निग्धा ने कहा, 'दोषी होने पर नेशनल मेडिकल कमीश या स्टेट मेडिकल काउंसिल डॉक्टर के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकती है। डॉक्टर का लाइसेंस रद्द हो की जा सकती है।  कुछ मामलों में लाइसेंस को कुछ महीनों या साल के लिए निलंबित किया जा सकता है।'

क्यों सजा दिलाना मुश्किल हो जाता है?

एडवोकेट स्निग्धा ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि हर अनहोनी या इलाज के असफल होने को लापरवाही नहीं माना जाता। डॉक्टरों पर आपराधिक केस दर्ज करने से पहले एक मेडिकल बोर्ड या एक्सपर्ट डॉक्टरों की कमेटी से राय लेना जरूरी होता है, जिससे यह साबित हो सके कि लापरवाही वाकई गंभीर थी। आम तौर पर लंबी मुकदमेबाजी और साबित कर पाने की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि मरीज खुद ऊब जाते हैं। लापरवाही होने के बाद भी उसे साबित कर पाने की जिम्मेदारी पीड़ित पक्ष की होती है। पीड़ित पक्ष, इसी मामले में चूक जाते हैं। 

 

सामान्य लापरवाही के मामलों में भी अपराध सिद्ध होने पर BNS की धारा 106 के मुताबिक अधिकतम सजा 2 साल की हो सकती है। इसे साबित कर पाना और मुश्किल है। उपभोक्ता फोरम में अस्पताल के खिलाफ केस दर्ज किया जा सकता है। 

 

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सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या था?

 जैकब मैथ्यू बनाम पंजाब राज्य (2005) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि किसी डॉक्टर को लापरवाही के लिए तभी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है जब वह एक सामान्य मेडिकल प्रोफेशनल के मानक से नीचे गिर जाए। कोर्ट ने कहा कि अगर देखभाल में कोई कमी है, मौत या किसी अप्रिय स्थिति में लापरवाही के पर्याप्त सबूत नहीं हैं तो इसलिए उसे दोषी नहीं माना जा सकता कि उसे बेहतर इलाज दिया जा सकता है।


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