एथेनॉल की तरह CNG, PNG में बायोगैस मिलाने की तैयारी, गोबरधन मिशन की ABCD समझिए
भारत सरकार ने अब CNG-PNG में ब्लेंडिंग का फैसला कर लिया है। इस साल CNG-PNG में 4 प्रतिशत बायोगैस यानी CBG मिलाने का लक्ष्य रखा गया है।

प्रतीकात्मक तस्वीर, Photo Credit: ChatGPT
पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने का मुद्दा देशभर में चर्चा में बना हुआ है। सरकार ने इससे किसी भी तरह के नुकसान से इनकार किया है। अब केंद्रीय कैबिनेट ने एक फैसला लिया है जिसके तहत CNG और PNG में बायोगैस मिलाई जाएगी। शुरुआत 3 प्रतिशत से होगी और 2028-29 तक इसे 5 प्रतिशत तक पहुंचाया जाना है। केंद्र सरकार ने इसके लिए 23,731 करोड़ की लागत वाली गोबरधन योजना को मंजूरी दी है। सरकार का कहना है कि इससे ग्रामीण क्षेत्रों के लोग आत्मनिर्भर बनेंगे, स्वच्छ ऊर्जा मिलेगी और ऊर्जा के मामले में देश आगे बढ़ेगा। साथ ही, ऊर्जा सुरक्षा के मामले में देश के किसान भी साझेदार बन जाएंगे।
इस योजना के तहत कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) का उत्पादन बढ़ाने और उसे CNG-PNG में मिलाने की योजना है। सरकार चाहती है कि गैस के आयात में थोड़ी कमी लाई जा सके और गोबर जैसी चीजों का इस्तेमाल स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन में किया जा सके। इससे पशुपालक, किसान और अन्य छोटे कामगारों को भी मदद मिल सकती है। यही वजह है कि सरकार इससे जुड़े उद्योगों के लिए लोन देने को तैयार है। साथ ही, कचरा प्रबंधन, आय के स्रोत विकसित करने और खाद उत्पादन बढ़ाने पर भी जोर दिया जा सकता है।
क्या है गोबरधन योजना?
जैसा कि योजना के नाम से स्पष्ट है कि गोबर को धन में बदलने जैसा कुछ प्लान है। सरकार का कहना है ऑर्गेनिक संपदा को स्वच्छ ऊर्जा, ग्रामीण संपन्नता और आर्थिक प्रगति के लिए इस्तेमाल किया जाए। कुल मिलाकर ऐसा करना है कि हरा कचरा और गोबर जैसी चीजें जो खराब हो जाती हैं या यूं ही कहीं फेंक दी जाती हैं। उसका इस्तेमाल बायोगैस यानी CBG बनाने में किया जाए। इस गैस का उत्पादन बढ़ाने के लिए किसानों से गोबर खरीदा जा सकता है, हरा कचरा खरीदा जा सकता है, कुछ कारोबारी इससे जुड़े व्यवसाय स्थापित कर सकते हैं।
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सरकार का मानना है कि जब सरकार लोन देगी, CBG का उत्पादन बढ़ाने का लक्ष्य 10 गुना होगा, 200 CBG प्लांट लगेंगे, बनने वाली गैस को CNG-PNG में मिलाने से खपत बढ़ेगी तो स्थानीय स्तर पर लोगों को आर्थिक लाभ होगा और स्वच्छ ऊर्जा को भी बढ़ावा मिलेगा।
कैसे बनती है बायोगैस?
इसके लिए खेती से निकलने वाले कचरे जैसे कि पराली और भूसा, जानवरों के गोबर, सुगर मिलों से निकलने वाले कचरे और अन्य ऑर्गेनिक कचरे का इस्तेमाल होता है। इन कचरों को इकट्ठा करके साफ किया जाता है, बड़े कचरों को काटकर या तोड़कर छोटा किया जाता है। फिर उन्हें एक ऐसे टैंक में डाला जाता है जहां ऑक्सीजन ना हो। वहां मौजूद बैक्टीरिया जब इस कचरे को तोड़ते हैं तो बायोगैस बनती है। यह गैस मुख्य तौर पर मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड का मिश्रण होती है। साथ ही, खाद भी निकलती है।

इसका मतलब है कि गैस बनाने के लिए जो कचरा डाला जाएगा, वह गैस तो बनाएगा ही साथ में अच्छी-खासी खाद भी निकलेगी। आमतौर जो गोबर गैस प्लांट लगाए जाते हैं, वे इसी पर काम करते हैं। घर के पास बनाए गए प्लांट से गैस का इस्तेमाल सीधे किचन में या फिर लाइट जलाने के लिए किया जाता रहा है।
सरकार क्या करेगी?
सरकार ने नेशनल सर्कुलर बायोएनर्जी स्कीम यानी GOBARdhan के लिए 23,731 करोड़ का बजट रखा है। 2026-27 से शुरू होने वाली यह योजना 2035-36 तक चलेगी। आमतौर पर निकलने वाली गोबर या बायोगैस उतनी स्वच्छ नहीं होती है। साथ ही, इसे सीधे घरों में इस्तेमाल किया जाता है। गोबरधन योजना के तहत इस गैस को साफ करके, अपग्रेड किया जा जाएगा और कंप्रेस करके टैंक में भरा जाएगा। इस तरह जो CBG तैयार होगी वह मीथेन से भरपूर होगी और इसे CNG और PNG में मिलाया जा सकेगा।
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इसके लिए लक्ष्य रखा है कि शहरों में गैस की सप्लाई करने वाली कंपनियां 2026-27 में 3 प्रतिशत, 2027-28 में 4 प्रतिशत और 2028-29 में CBG खरीदकर ट्रांसपोर्ट के लिए CNG में और घरेलू इस्तेमाल के लिए PNG में इसका मिश्रण करेंगी। यानी अभी तक यह योजना है कि जिन गाड़ियों में CNG डाली जाती है उनमें इसी साल से 3 प्रतिशत CBG भी मिलाई जाएगी।
सरकार इसके लिए एक ऐसा फ्रेमवर्क लाई है जिसके तहत CBG की कीमतों को 2110 रुपये प्रति मीट्रिक मिलियन ब्रिटिश थर्मल यूनिट (MMBTU) पर स्थिर रखा जाएगा। इसके लिए सरकार भी समर्थन देगी। यह फ्रेमवर्क 10 साल के लिए लागू होगा ताकि ग्राहकों के लिए दाम न बढ़ें और राजस्व का भी घाटा न हो।
प्लांट लगाने वालों को क्या मिलेगा?
सरकार ने स्पष्ट किया है कि ग्रीनफील्ड CBG प्रोजेक्ट लगाने वालों को 2 करोड़ रुपये प्रति टन प्रति दिन तक की आर्थिक मदद की जाएगी। यह मदद सिर्फ प्लांट लगाने तक के लिए नहीं है। कच्चा माल खरीदने, कचरे की साफ-सफाई करने और अन्य काम के लिए भी यह आर्थिक मदद मिलेगी। साथ ही, जो प्रोजेक्ट ब्राउनफील्ड हैं और वे अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाना चाहते हैं तो उन्हें भी आर्थिक मदद दी जाएगी। सरकार का मानना है कि इससे कारोबारियों पर शुरुआती आर्थिक बोझ कम हो जाएगा और लोग इसमें उत्साह से काम शुरू करेंगे।

सरकार की योजना है कि इस तरह के ज्यादा प्लांट लगें ताकि उसे सिटी गैस डिस्ट्रब्यूशन नेटवर्क की पाइपलाइन से सीधे जोड़ा जा सके। ऐसे करने से गैस को भरने, लाने ले जाने और स्टोर करने की जरूरत नहीं होगी और कीमतों को स्थिर रखा जा सकेगा। सरकार ने MSME बेस्ड प्रोजेक्ट्स को आर्थिक सहायता देना, सस्ता लोन उपलब्ध कराने, पहली बार प्लांट लगाने वालों को वरीयता देने और अन्य जरूरतों में मदद करने का वादा किया है।
क्या है लक्ष्य?
पहला लक्ष्य है कि अभी जितनी CBG का उत्पादन हो रहा है, उसे कम से कम 10 गुना बढ़ाया जाएगा। ऐसा करके आयात को कम करने का लक्ष्य है। प्राइवेट प्लेयर इस सेक्टर में उतरें तो सरकारी लागत की आवश्यकता नहीं होगी और उद्यम बढ़ेगा। सरकार आर्थिक मदद देगी तो किसान, पशुपालक और अन्य सहकारी संगठनों को भी मदद मिलेगी। कचरे का निष्पादन होगा, स्वच्छता को बढ़ावा मिलेगा और इससे स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादन बढ़ेगा।
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