भारत 'कॉमनवेल्थ' में रहकर भी संप्रभु कैसे, चीन जैसा रुख हमारा क्यों नहीं? समझिए
भारत कॉमनवेल्थ का हिस्सा है। ब्रिटिश उपनिवेश के अधीन देशों के इस समूह में रहते हुए भारत ने अपनी 'संप्रभुता' कैसे बचाई है, पढ़ें।

ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स। Photo Credit: acmnorepublic/X
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत धमाल मचा रहा है। भारत यह उम्मीद नहीं कर रहा था कि टॉप-5 में जगह बन पाएगी लेकिन भारत चौथे स्थान पर आ गया है। रेसलिंग, बैडमिंटन, हॉकी और क्रिकेट जैसे खेल बाहर हैं लेकिन तब भी दूसरे क्षेत्रों में भारतीय कमाल कर रहे हैं। यह मुकाबला ग्लासगो में हो रहा है। भारत ने अब तक 6 गोल्ड समेत 39 पदक हासिल किया है। कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी ब्रिटेन कर रहा है और ब्रिटेन के राजा अध्यक्ष है। राष्ट्रमंडल देशों की अध्यक्षता ब्रिटेन के किंग करते हैं।
किंग चार्ल्स'राष्ट्रमंडल के प्रमुख'होने के नाते खेलों के सर्वोच्च संरक्षक और प्रतीकात्मक नेता हैं। वह खेल शुरू करने से पहले पारंपरिक 'किंग्स बेटन रिले' को रवाना करते हैं। उद्घाटन समारोह में बेटन से अपना विशेष संदेश पढ़कर औपचारिक रूप से खेलों की शुरुआत की घोषणा करते हैं। दुनिया का एक बड़ा हिस्सा है, जिसे यह खटकता है। लोगों का कहना है कि जो ब्रिटेन के किंग कर रहे हैं, वह मौका, कॉमनवेल्थ के सभी राष्ट्रों के प्रतिनिधि को मिलना चाहिए। इस प्रथा पर भारत ऐतराज नहीं करता है। भारत संप्रभु राष्ट्र है तब भी। ऐसा क्यों है, भारत कॉमनवेल्थ का हिस्सा क्यों है, आइए जानते हैं इन सवालों का जवाब।
यह भी पढ़ें: कॉमनवेल्थ गेम्स का आज आखिरी दिन, किन मेडल इवेंट्स में उतरेंगे भारतीय एथलीट्स?
भारत कॉमनवेल्थ का हिस्सा कैसे बना?
1947 में भारत को आजादी मिली। आजादी मिलने से पहले ही यह एलान हुआ कि भारत एक गणतंत्र होगा। ऐसा गणतंत्र जो संप्रभु होगा, जिसकी अपनी वैश्विक नीतियां होंगी, कोई ब्रिटिश राजा या रानी के प्रति भारत निष्ठावान नहीं होगा। भारत, संप्रभुता तो चाहता था लेकिन कॉमनवेल्थ का सदस्य भी बने रहना चाहता था।
इस समस्या को सुलझाने के लिए 1949 में लंदन में कॉमनवेल्थ देशों के प्रधानमंत्रियों की बैठक हुई। इस बैठक में 22 से 27 अप्रैल तक चर्चा हुई और 'लंदन डिक्लेरेशन' का एलान हुआ। इसमें तय हुआ कि गणतंत्र देश भी कॉमनवेल्थ का हिस्सा बन सकते हैं।
भारत की संप्रभुता फिर भी कैसे बच गई?
'लंदन डिक्लेरेशन' की वजह आयरलैंड और भारत जैसे देशों के गणतंत्र बनने के फैसलों से जुड़ा था। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने एक 10 सूत्रीय फॉर्मूला तैयार किया था, जिसमें अपनी शर्तें साफ लिख दी थीं। संविधान सभा में 8 मार्च 1949 को जवाहर लाल नेहरू ने साफ कहा था कि भारत कुछ महीनों में स्वतंत्र गणतंत्र बनेगा और अपनी विदेश, आंतरिक, राजनीतिक या आर्थिक नीति में किसी भी तरह की निर्भरता स्वीकार नहीं करेगा।
भारत ने एलान किया कि वह गणतंत्र बनेगा। ब्रिटिश राजा को कॉमनवेल्थ के स्वतंत्र देशों के मुक्त संघ का प्रतीक और प्रमुख मानने से भारत को एतराज नहीं रहेगा। बाकी देशों ने भी भारत की इस सदस्यता को स्वीकार कर लिया। इस घोषणा के साथ आधुनिक कॉमनवेल्थ ऑफ नेशंस का जन्म हुआ, जहां सभी देश समान और स्वतंत्र रहते हुए शांति, स्वतंत्रता और प्रगति के लिए साथ काम करते हैं।
भारत की देन है कॉमनवेल्थ का नया स्वरूप?
भारत के प्रस्ताव की तरह ही कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका, पाकिस्तान और सीलोन (अब श्रीलंका) ने भारत के शर्तों के आधार पर ही अपने नियम तय किए। यह डिक्लेरेशन, जवाहर लाल नेहरू के सलाहकार वीके मेनन और ब्रिटेन के कैबिनेट सचिव नॉर्मन ब्रुक की अगुवाई में हुई था। पहले यह 'ब्रिटिश कॉमनवेल्थ' था, अब यह 'कॉमनवेल्थ ऑफ नेशंस' है। अब स्वतंत्र गणराज्य भी इसका हिस्सा हो सकते हैं।
जवाहर लाल नेहरू, प्रधानमंत्री, 16 मई 1949:-
ऐसा हो सकता है कि सदस्य देश, कभी-कभी राष्ट्रमंडल से अलग होने तक का निर्णय लें। आज की दुनिया में जहां इतनी सारी विघटनकारी शक्तियां सक्रिय हैं, जहां हम अक्सर युद्ध के कगार पर होते हैं, मुझे लगता है कि किसी भी संगठन को तोड़ने के लिए प्रोत्साहित करना सुरक्षित नहीं है। इसके बुरे हिस्सों को तोड़ दें। एक सहकारी संगठन को बनाए रखना बेहतर है जो इस दुनिया में भलाई कर सकता है, बजाय इसके कि इसे तोड़ दिया जाए।
यह भी पढ़ें: कॉमनवेल्थ गेम्स: डेकाथलॉन में मेडल जीतने वाले तेजस्विन शंकर की कहानी क्या है?
भारत क्यों कॉमनवेल्थ का हिस्सा है?
जवाहर लाल नेहरू, प्रधानमंत्री, 16 मई 1949:-
हम राष्ट्रमंडल में इसलिए शामिल होते हैं क्योंकि हमें लगता है कि यह हमारे लिए और विश्व में उन उद्देश्यों के लिए लाभदायक है जिन्हें हम आगे बढ़ाना चाहते हैं। राष्ट्रमंडल के अन्य देश चाहते हैं कि हम इसमें बने रहें क्योंकि उन्हें लगता है कि यह उनके लिए लाभदायक है।
संविधान सभा में जवाहर लाल नेहरू ने इस फैसले को व्यवहारिक बताया था। उन्होंने कहा था कि कॉमनवेल्थ में होना, फायदे का सौदा है। दूसरे देश भी चाहते हैं कि भारत इस संगठन का हिस्सा रहे। भारत का रिश्ता, किंग से आजादी के बाद मित्रता और बराबरी का रहा, न की अधीनता का। भारत आजाद है, कभी भी कॉमनवेल्थ से बाहर जा सकता है।
चीन क्यों कॉमनवेल्थ का हिस्सा नहीं है?
चीन, सीधे ब्रिटिश औपनिवेशिक व्यवस्था का हिस्सा नहीं रहा है। कभी राष्ट्रमंडल देशों में शुमार भी नहीं रहा है। हांगकांग, कॉमनवेल्थ का हिस्सा रहा है लेकिन चीन की मुख्यभूमि नहीं। 19वीं और 20वीं सदी में कभी अमेरिका ने चीन के कुछ हिस्सों को कब्जाया, कभी ब्रिटेन ने। जापान, फ्रांस, रूस और जर्मनी जैसे देशों का भी कब्जा चीन पर रहा। कब्जा भी कुछ अहम और व्यापारिक जगहों पर था, जहां से व्यापार फलफूल सके।
चीन लंबे संघर्ष के बाद जापान के नियंत्रण से मुक्त हुआ। 1 अक्टूबर 1949 नए चीनी गणराज्य की नींव पड़ी। चीन, स्थापना के वक्त से ही मजबूत और संप्रभु राष्ट्र था। कॉमनवेल्थ का हिस्सा होना, राजनीतिक विचारधारा के अनुकूल नहीं था। चीन का जुड़ाव ही ब्रिटेन से नहीं रहा तो चीन ने अलग राह चुनी। चीन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य है, BRICS, G20 और SCO जैसे वैश्विक संगठनों का अहम सदस्य है। कॉमनवेल्थ पर उसकी निर्भरता ही नहीं है।
यह भी पढ़ें: ग्लासगो कॉमनवेल्थ 2026 में गोल्ड से चूके जदुमणि सिंह, बॉक्सिंग में जीता सिल्वर
भारत के बने रहे पर सवाल क्यों?
भारत का एक बड़ा राष्ट्रवादी तबका मानता है कि कॉमनवेल्थ देशों के प्रमुख के तौर पर ब्रिटिश सम्राट को मान्यता क्यों दी जाए, जबकि आजाद देश इस संगठन का हिस्सा हैं। भारत के राष्ट्रवादियों का मानना है कि प्रतीकात्मक तौर पर ही किसी को मुखिया क्यों माना जाए, कॉमनवेल्थ की अध्यक्षता भी समय-समय पर अलग-अलग देशों को मिले।
क्यों बने रहने में भारत का फायदा है?
कॉमनवेल्थ देशों में शुमार होने में भारत का घाटा नहीं है। भारत संप्रभु है और अपनी नीतियां खुद तय करता है। भारत, ब्रिटेन की तुलना में सैन्य और अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर कहीं ज्यादा मजबूत है। ग्लोबल फायरपावर इंडेक्स के आंकड़े बताते हैं कि भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है, वहीं ब्रिटेन 6वें पायदान पर है। भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक बना हुआ है।
IMF के अनुमान के अनुसार, 2027 तक भारत दोबारा ब्रिटेन को पीछे छोड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। भारत की नॉमिनल GDP 4.15 ट्रिलियन डॉलर की है, जबकि ब्रिटेन 4.26 ट्रिलियन डॉलर के आसपास है। भारत का कॉमनवेल्थ के लगभग 56 देशों के साथ मजबूत व्यापार है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि राष्ट्रमंडल देशों के साथ कुल व्यापार 130 से 150 बिलियन डॉलर के आसपास है।
और पढ़ें
Copyright ©️ TIF MULTIMEDIA PRIVATE LIMITED | All Rights Reserved | Developed By TIF Technologies
CONTACT US | PRIVACY POLICY | TERMS OF USE | EDITORIAL POLICY | Sitemap




