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इस्तीफा देने पर क्यों मजबूर हुए धर्मेंद्र प्रधान, कैसे सरकार को झुकना पड़ा?

छात्र शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर अड़े थे। सरकार ने सोनम वांगचुक का अनशन तुड़वाया। सीजेपी के साथ सक्रिय बातचीत की। मगर आंदोलन नहीं थमा। उलटा देशभर में बढ़ते समर्थन ने सरकार को गंभीर कदम उठाने पर मजूबर किया।

Dharmendra Pradhan

बीजेपी नेता धर्मेंद्र प्रधान।

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छात्रों के भारी विरोध के बीच शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया है। जंतर-मंतर में छात्रों के बीच खुशी की लहर है। कॉकरोच जनता पार्टी ने भी इस्तीफे पर खुशी जाहिर की और छात्र एकता जिंदाबाद कहा। उधर, धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पत्र में लिखा, 'देश और छात्र हित में अपने पद से इस्तीफा दिया है।

 

पिछले 10 दिन के घटनाक्रम से मैं दुखी था।' सबसे बड़ा सवाल यह है कि दबाव में अक्सर न झुकने वाली मोदी सरकार को अबकी बार क्यों झुकना पड़ा? सरकार पर कितना दबाव बढ़ गया। क्या सरकार के पास इस्तीफे के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचा था? आइये समझते हैं पूरा मामला...

 

यह भी पढ़ें: 'झुकती है दुनिया, झुकाने वाला...', धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर अभिजीत दीपके

 

कहा जाता है कि मोदी सरकार में इस्तीफे नहीं होते हैं। यह सरकार किसी दबाव में झुकती नहीं है। दावा किया जा रहा है कि 12 साल में कोई इस्तीफा नहीं हुआ। पहली बार मोदी सरकार को झुकना पड़ा और धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफा लेना पड़ा। हालांकि यह तथ्य दुरुस्त नहीं है। 17 अक्टूबर 2018 को एमजे अकबर ने मंत्री पद से इस्तीफा दिया था। उन्होंने यह इस्तीफा #MeToo अभियान के बाद दिया था। उन पर कई महिला पत्रकारों के यौन उत्पीड़न का आरोप लगा था।

 

सबसे बड़ा सवाल यह है कि धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देने पर मजबूर क्यों होना पड़ा? अगर देना था तो पहले भी दे सकते थे। मामला इतना बिगड़ने के बाद आखिर 49 दिनों बाद सरकार को क्यों झुकना पड़ा। मामला कहां से बिगड़ा?

क्या सोनम वांगचुक को हटाना पड़ा भारी?

दरअसल, 6 जून को कॉकरोच जनता पार्टी का जंतर-मंतर में प्रदर्शन शुरू हुआ। पहले कम भीड़ जुटी। 28 जून को सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने आंदोलन का अपना समर्थन दिया। अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की। करीब 20 दिन बाद यानी 18 जून को दिल्ली पुलिस ने सोनम वांगचुक को जबरन धरनास्थल से हटाया। उन्हें सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया। यही घटना सबसे सबसे निर्णायक बनी। देश में मैसेज गया कि सोनम वांकचुक के साथ गलत किया गया। बड़ी संख्या में लोग उनके समर्थन में जंतर-मंतर पहुंचने लगे।

पुलिस कार्रवाई ने गुस्से को और बढ़ाया

दो दिन बाद यानी 20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी ने 'संसद चलो' मार्च शुरू हुआ। हालांकि यह मार्च उग्र हो गया। छात्रों और पुलिस की बीच हिंसक झड़प हुई। कई छात्रों पर लाठियां भांजी गईं। छात्राओं को पीटा गया। सोशल मीडिया पर वायरल इन वीडियो ने आग में घी का काम किया। आंदोलन थमने की जगह उल्टा उग्र होने लगा। इसी घटना के बाद सरकार पर और दबाव बढ़ा। पुलिस को भी नरमी बरतने की सलाह दी गई। 

देशभर में फैलते आंदोलन से चिंतित थी सरकार

जंतर-मंतर के बाद छात्रों का आंदोलन दिल्ली के अलावा अन्य शहरों में बढ़ने लगा। मुंबई में भारी हंगामा हुआ। बिहार में उग्र प्रदर्शनों ने सरकार की चिंता को और बढ़ा दिया। यहां तक कि छोटे-छोटे शहरों में भी प्रदर्शन का दायरा बढ़ने लगा था। छात्रों के अलावा अन्य संगठन और लोगों की भागीदारी ने भी चिंता बढ़ाई। 

सिर्फ इस्तीफा ही विकल्प

कॉकरोच जनता पार्टी और छात्रों ने सरकार के सामने सिर्फ इस्तीफे को ही विकल्प रखा। सरकार ने पिछले आठ दिनों में छात्रों के धैर्य का परीक्षण किया। मगर आंदोलन घटने की जगह उग्र होने लगा। आंदोलनकारी ने साफ कर दिया कि बिना इस्तीफे के कुछ भी मंजूर नहीं।

 

सूत्रों के हवाले से खबर चलाई गई कि धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा नहीं देंगे। इसके बाद भी जब आंदोलन पर कोई असर नहीं पड़ा और एक और संसद मार्च के ऐलान ने सरकार धर्मेंद्र का इस्तीफा लेने पर विवश किया। 18 जुलाई तक अड़ियल रवैया अपनाने वाली सरकार ने 20 जुलाई के बाद गंभीर विचार विमर्श शुरू किया। सरकार किसी भी हाल में आंदोलन को और बढ़ाना नहीं चाहती थी।

नेतृत्वविहीन आंदोलन ने भी बढ़ाई टेंशन

प्रदर्शन की अगुवाई भले ही कॉकरोच जनता पार्टी कर रही है, लेकिन पूरे प्रदर्शन को काबू करने वाला कोई सार्वमान्य नेता नहीं था। किसी एक नेता का छात्रों पर कंट्रोल नहीं है। अलग-अलग गुट जंतर-मंतर में मौजूद हैं। इस घटनाक्रम ने भी सरकार को झुकने पर मजबूर किया, क्योंकि छात्रों की आड़ में असामाजिक तत्व कोई फायदा उठा सकते हैं। सरकार नहीं चाहती है कि दिल्ली के बेहद संवेदनशील क्षेत्र में कानून-व्यवस्था की कोई बड़ी चुनौती खड़ी हो।

 

यह भी पढ़ें: बिहार में उग्र हुआ छात्रों का आंदोलन, कहीं गाड़ी फूंकी तो कहीं पथराव हुआ

श्रीलंका से नेपाल तक का उदाहरण

पिछले दो साल में श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में भीड़ और छात्रों के आंदोलन ने सरकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती खड़ी की। वहां होने वाली अराजकता सभी ने देखी है। सरकार भी इस तथ्य से अनभिज्ञ नहीं है। जंतर-मंतर में कुछ प्रदर्शनकारियों ने बांग्लादेश और श्रीलंका बनाने की खुली धमकी दी।

 

ऐसे में देशविरोधी तत्व छात्रों के आंदोलन का लाभ उठा सकते थे। इसका जिक्र धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पत्र में भी किया। उन्होंने कहा, 'देश की युवाशक्ति को भ्रम के कुचक्र में फंसने नहीं देंगे, यही मेरा संकल्प है। जंतर-मंतर पर और देश में जो स्थिति बनी है, इस स्थिति का राष्ट्र विरोधी ताकतें लाभ ना उठाएं, देश की एकता बनी रहे, भारत के एक भी विद्यार्थी का भविष्य कानूनी पेचीदगियों में ना उलझे, हमारे बच्चे अपना समय पढ़ाई में लगाएं, करियर बनाने पर फोकस करें, इसी बात पर विचार करते हुए मैंने अपना त्यागपत्र माननीय प्रधानमंत्री जी को भेज दिया है।'


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