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पंजाब यूनिवर्सिटी में ABVP-SOI गठबंधन जीता, क्या पंजाब में साथ आएंगे BJP- अकाली?

ABVP ने पंजाब यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव में दर्ज कर ली है और अकाली दल के स्टूडेंट विंग SOI का उन्हें साथ मिला था। इस जीत के बाद SAD-BJP के पंजाब में साथ आने को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं।

Ankit Bidhan won presidential election in panjab university

ABVP ने पंजाब यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव में दर्ज की जीत, Photo Credit: ANI

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पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ में हुए छात्र संघ चुनाव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने लगातार दूसरी जीत दर्ज की है।  हरियाणा के जींद जिले के अंकित बिढ़ान यूनिवर्सिटी के नए प्रधान बने हैं। ABVP का मुकाबला आम आदमी पार्टी के स्टूडेंट विंग एसोसिएशन ऑफ स्टूडेंट्स फॉर अल्टरनेटिव पॉलिटिक्स (ASAP) और कांग्रेस के स्टूडेंट विंग नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) से था। ABVP ने दोनों को करारी मात दी है और पंजाब यूनिवर्सिटी में लगातार दूसरी बार भगवा ध्वज फहराया है। इस जीत के कई सियासी मायने निकाले जा रहे हैं और इन्हें आगमी पंजाब विधानसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है। 

 

जो हाल बीजेपी का अब तक पंजाब में है वही हाल ABVP का पिछले साल तक पंजाब यूनिवर्सिटी में भी था लेकिन ABVP के गौरववीर सौहल ने पिछले साल जीत दर्ज कर ABVP की पहली बार छात्रसंघ में एंट्री करवाई। इसके बाद ABVP ने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की है। एक छात्र संघ चुनाव को पंजाब से जोड़कर इसलिए भी देखा जा रहा है क्योंकि ABVP बाीजेपी की अघोषित स्टूडेंट विंग है। ABVP की जीत के लिए बीजेपी के नेता मेहनत करते हैं और जीत पर बीजेपी अध्यक्ष से लेकर गृह मंत्री अमित शाह तक तमाम बीजेपी के नेता बधाई देते हैं और नए नवेले प्रधान अंकित Gen-Z के दिलों में पीएम मोदी के लिए अहम स्थान बताते हैं। ऐसे में इस अघोषित रिश्ते के बारे में पूरा देश जानता है। 

 

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सियासी पंडित क्या कह रहे?

पंजाब में बीजेपी लंबे समय तक शिरोमणि अकाली दल (बादल) के साथ गठबंधन में रहा और सरकार भी बनाई लेकिन छोटे भाई की भूमिका में और राजनीतिक गलियारों में दोनों के फिर से एक साथ आने की चर्चा है। जानकारों का कहना है कि जिस तरह अकाली दल के स्टूडेंट विंग स्टूडेंट ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इंडिया (SOI) ने चुनाव से ठीक पहले ABVP को समर्थन दिया इसी तरह कुछ पंजाब की राजनीति में भी हो सकता है। ABVP की जीत में SOI की अहम भूमिका रही और इस गठबंधन की जीत के बाद अब पंजाब में भी बीजेपी और अकाली दल के एक होने की चर्चा शुरू हो गई है। लोग कह रहे हैं कि जिस तरह पंजाब यूनिवर्सिटी में जीत दर्ज की है उसी तरह पंजाब में भी जीत दर्ज करेंगे। 

 

दूसरी अहम बात यह है कि इस चुनाव में आम आदमी पार्टी को सबसे बड़ा झटका लगा है। AAP ने अपने सीनियर नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री और मौजूदा सांसद गुरमीत सिंह मीत हेयर को इन चुनावों की जिम्मेदारी दी थी और तमाम कोशिशों के बावजूद वह अपने स्टूडेंट विंग को नहीं जीता पाए। बीजेपी पंजाब में इसे सीधे तौर पर AAP की हार के रूप में पेश कर रही है। 2022 में मीत हेयर ने ही यूनिवर्सिटी चुनावों की कैंपेन को संभाला था और पहली ही बार में धमाकेदार जीत दर्ज की थी लेकिन इसके बाद काउंसिल में लौट नहीं पाए। पंजाब चुनाव से ठीक पहले पार्टी के लिए यह बड़ा झटका है। 

 

कांग्रेस की बात करें तो कांग्रेस का जो हाल पंजाब में है वही हाल पंजाब यूनिवर्सिटी में भी है। यहां भी कांग्रेस के लिए कहा जाता है कि अगर NSUI के सारे गुट एक हो जाएं तो पंजाब यूनिवर्सिटी में उन्हें कोई नहीं हरा सकता। पंजाब कांग्रेस के बारे में भी यही कहा जाता है।  NSUI के नेता और पार्षद सचिन गालव ने तो सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया कि पंजाब यूनिवर्सिटी में  NSUI के दो गुट हैं लेकिन पीयू की राजनीति कवर करने वाले जानते हैं कि यहां  NSUI के कई गुट हैं। हालांकि, इस बार  NSUI के तमाम गुटों ने एक ही उम्मीदवार का समर्थन किया और एकजुटता दिखाने की कोशिश की।  NSUI के तमाम नेता एक मंच पर कैंपेन करते दिखाई दिए लेकिन फिर भी नतीजा उनके पक्ष में नहीं आया। यह पंजाब कांग्रेस के लिए भी एक बड़ा संकेत है। 

 

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पंथक वोट किस ओर?

पंजाब की राजनीति में पंथक वोट लंबे समय से अकाली दल और पंजाब  यूनिवर्सिटी में उनके स्टूडेंट विंग के साथ रहा है लेकिन पंजाब की तरह ही पंजाब यूनिवर्सिटी की राजनीति भी बदल रही है। पंजाब में अमृतपाल सिंह के उभार के साथ ही पंथक वोट उनके पीछे खड़ा दिखाई दे रहा है और उनकी पार्टी ने अब उन्हें सीएम उम्मीदवार भी बना दिया है। ऐसे में तमाम राजनीतिक दलों के लिए वह बड़ी चुनौती बन चुके हैं। पंजाब यूनिवर्सिटी में उनके दल के नेताओं ने स्टूडेंट ऑर्गेनाइजेशन सथ के उम्मीदवार का समर्थन किया था। सथ पंजाब के अलग-अलग हिस्सों में सिखों से जुड़े मुद्दों को उठाती है और मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा को अपना आदर्श मानती है। ऐसे में यूनिवर्सिटी का पंथक वोट उनके साथ जुड़ा हुआ है लेकिन उनका उम्मीदवार चौथे स्थान पर रहा। ऐसे में सियासी जानकार कह रहे हैं कि अमृतपाल की पार्टी का भी पंजाब में यही हाल होगा और कुछ लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि जो नतीजे यूनिवर्सिटी में आए हैं उसी मोड़ पर पंजाब की राजनीति खड़ी है। 

क्या बीजेपी के लिए शुभ संकेत?

राजनीति जानकार पंजाब यूनिवर्सिटी की जीत को बीजेपी के लिए पंजाब में मौके के तौर पर देख रहे हैं। हालांकि, पंजाब यूनिवर्सिटी और पंजाब की राजनीति को एक साथ जोड़कर नहीं देखा जा सकता है। पहली बात है यूनिवर्सिटी में बड़ी संख्या में हरियाणा और हिमाचल के छात्र भी पढ़ते हैं। इंजीनियरिंग कोर्स में यूपी और बिहार समेत अन्य राज्यों के छात्रों की भी काफी संख्या है यानी सिर्फ पंजाब के राजनीति मूड से जोड़कर इसे नहीं देखा जा सकता। 

 

दूसरा बड़ा फैक्टर यह है कि ABVP के उम्मीदवार अंकित खुद हरियाणा के जींद जिले के रहने वाले हैं और उन्हें हरियाणा के एकमात्र उम्मीदवार के रूप में प्रोजेक्ट किया गया था। यानी उनका पंजाब से सीधे तौर पर कोई खास रिश्ता नहीं है। तीसरा जरूरी फैक्टर मुद्दों का है, जहां पंजाब में अकसर बीजेपी पिछड़ जाती है। यूनिवर्सिटी में छात्रों के हॉस्टल, मेस, फीस जैसे मुद्दे थे लेकिन पंजाब में किसानों के मुद्दे, सिख धर्म, केंद्र से टकराव, बंदी सिखों की रिहाई, पंजाब का पानी, चंडीगढ़ पर अधिकार जैसे तमाम मुद्दे हैं जिनके कारण बीजेपी बैकफुट पर चली जाती है।

 

इसके साथ ही एक बड़ा फैक्टर संगठन भी है। ABVP ने कई सालों तक यूनिवर्सिटी में संगठन पर काम किया और हर डिपार्टमेंट में ABVP की विचारधार से जुड़े कार्यकर्ता हैं जो सिर्फ विचारधारा के कारण पार्टी के साथ जुड़े हैं और संगठन के लिए काम कर रहे हैं लेकिन पंजाब में बीजेपी का संगठन अभी काफी कमजोर है। ऐसे में पंजाब यूनिवर्सिटी के चुनाव को सीधा पंजाब के राजनीतिक मूड से जोड़कर नहीं देखा जा सकता लेकिन यहां यह बात ध्यान में रखनी होगी कि पिछले साल तक पंजाब यूनिवर्सिटी को भी ABVP के लिए अभेद किला कहा जाता था। अब सवाल है कि क्या ABVP के बाद बीजेपी भी पंजाब के अभेज किले को भेद पाएगी?


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